चुनाव से पहले और बाद की ‘घर वापसी’

Published at :12 Dec 2014 12:27 AM (IST)
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चुनाव से पहले और बाद की ‘घर वापसी’

पंडित जी ने सुबह-सुबह दरवाजे पर दस्तक दी. चेहरा खिला हुआ था. पूछने का इंतजार किये बिना ही बोले- पांच हजार लोगों की घर वापसी हो रही है. मुङो लगा भाजपा सरकार ‘घर वापसी’ के अपने चुनावी वादे को अमलीजामा पहनाने की दिशा में दूसरा बड़ा कदम उठाने जा रही है. पार्टी ने चुनाव घोषणापत्र […]

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पंडित जी ने सुबह-सुबह दरवाजे पर दस्तक दी. चेहरा खिला हुआ था. पूछने का इंतजार किये बिना ही बोले- पांच हजार लोगों की घर वापसी हो रही है. मुङो लगा भाजपा सरकार ‘घर वापसी’ के अपने चुनावी वादे को अमलीजामा पहनाने की दिशा में दूसरा बड़ा कदम उठाने जा रही है.

पार्टी ने चुनाव घोषणापत्र में ‘सम्मान के साथ घर वापसी’ को अहम स्थान दिया था और सरकार ने इसके लिए बजट में 500 करोड़ रुपये की व्यवस्था कर पहला बड़ा कदम जुलाई में ही उठा लिया था. लेकिन, मेरा अनुमान धरा रह गया, जब पंडित जी ने एक अखबार की खबर का शीर्षक सुनाया- क्रिसमस पर पांच हजार अल्पसंख्यकों की ‘घर वापसी’ करायेगा संघ. मैंने तो कश्मीरी पंडितों की घर वापसी का गलत अनुमान लगा लिया था, जबकि पंडित जी खुश थे कि चार हजार इसाई और एक हजार मुसलमानों की हिंदू धर्म में कथित वापसी के लिए अलीगढ़ में तैयारी चल रही है.

इसके मुख्य अतिथि होंगे भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ. पंडित जी उत्साह से बोले, इन लोगों को गरीबी से मुक्ति दिलायेगा धर्म परिवर्तन. मेरी पत्नी चाय ला चुकी थी. मुङो लगा, सीधे-सीधे विरोध जताना पंडित जी की चाय की चुस्की को फीका कर सकता है. इसलिए बात को घुमाते हुए पूछा, आपने रात में टीवी न्यूज देखा था? बोले, नहीं, कुछ खास था? खास तो नहीं, बस आगरा में जिन लोगों की पिछले दिनों जबरन ‘घर वापसी’ हुई थी, उनकी जिंदगी के अंधेरे में एक न्यूज चैनल के कैमरे की रोशनी पहुंच रही थी.

उनमें से कुछ परिवार पहले हिंदू थे और पेट की आग बुझाने के लिए कूड़ा बीनते थे. जब उन्हें इससे मुक्ति के सपने दिखाये गये तो वे मुसलमान बन गये. उनका नसीब फिर भी नहीं बदला. मुसलमान होकर भी वे कूड़ा ही बीनते रहे और उम्मीद है कि ‘घर वापसी’ के बाद भी यही करेंगे. उन्हें न तो कुरान का पता है और न ही गीता या रामायण का. पता है तो बस यह कि कूड़ा कहां मिलता है. पंडित जी ने तेवर बदले. पूछा, पहले यह बताइये कि खबर दिखानेवाले रिपोर्टर का धर्म क्या था? मैंने कहा, पंडित जी, जो रिपोर्टर कर्म को ही पूजा मानता हो, उसके लिए सभी धर्म अपने होते हैं.

उसकी पहचान उसके धर्म से नहीं, कर्म से होती है. पंडित जी की चुप्पी बता रही थी कि वे माकूल जवाब तलाश रहे हैं. सो मैंने बात जारी रखी- जे बी प्राट ने अपनी पुस्तक ‘द रिलीजियस कंसशनेस’ में धर्म परिवर्तन को मानवीय विवशता की देन कहा है. जब तक यह विवशता बनी रहेगी, कुछ लोग इससे मुक्ति के लिए कभी इस तो कभी उस धर्म के ठेकेदारों के झांसे में आते ही रहेंगे. होना तो चाहिए था कि राज्यसत्ता अपना धर्म निभाती और ऐसी मानवीय विवशता को खत्म करने का ठोस प्रयास करती. तब चुनाव से पहले और बाद की ‘घर वापसी’ का मतलब भी अलग-अलग नहीं होता. पंडित जी को कोई जरूरी काम याद आ गया, इसलिए बैठक यहीं खत्म हो गयी.

रंजन राजन

प्रभात खबर, दिल्ली

ranjan.rajan@prabhatkhabar.in

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