भाजपा का सकारात्मक यू-टर्न

Published at :04 Dec 2014 1:34 AM (IST)
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भाजपा का सकारात्मक यू-टर्न

बंगाल की खाड़ी में आर्थिक विकास के नये रास्ते खुल रहे हैं, जिससे दोनों देशों को फायदा होगा. परंतु, मोदी यदि बांग्लादेश के साथ संबंधों का नया अध्याय लिखना चाहते हैं, तो अवैध बांग्लादेशियों को लेकर तीखे बयानों से सत्ता पक्ष को परहेज करना होगा. मोदी सरकार केवल आर्थिक उदारीकरण के मामले में ही नहीं, […]

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बंगाल की खाड़ी में आर्थिक विकास के नये रास्ते खुल रहे हैं, जिससे दोनों देशों को फायदा होगा. परंतु, मोदी यदि बांग्लादेश के साथ संबंधों का नया अध्याय लिखना चाहते हैं, तो अवैध बांग्लादेशियों को लेकर तीखे बयानों से सत्ता पक्ष को परहेज करना होगा.
मोदी सरकार केवल आर्थिक उदारीकरण के मामले में ही नहीं, विदेश नीति और रक्षा नीति में भी पिछली यूपीए सरकार के नक्शे-कदम पर है. फर्क केवल तौर-तरीकों का है. व्यक्तिगत रूप से नरेंद्र मोदी का अंदाज मनमोहन सिंह के मुकाबले आक्रामक है. कांग्रेस ने ‘छह महीने पार, यू-टर्न सरकार’ शीर्षक से एक पुस्तिका जारी की है, जिसमें मोदी सरकार की 25 ‘पलटियों’ का जिक्र है. इनमें विदेश नीति से जुड़े दो मसले महत्वपूर्ण हैं. सिविल न्यूक्लियर डैमेज एक्ट, जिसे लेकर भाजपा ने खूब हंगामा किया गया था, अब मोदी जी इसे नरम करना चाहते हैं, ताकि नाभिकीय तकनीक लाने में अड़चनें खड़ी न हों.
नरेंद्र मोदी ने हाल में गुवाहाटी में कहा कि बांग्लादेश के साथ हम ‘लैंड स्वैपिंग डील’ कर रहे हैं. अरुण जेटली ने यूपीए सरकार के दौर में इसे देश-विरोधी बताया था. अब मोदी ने नरम रुख अख्तियार करते हुए भूमि सीमा समझौता (लैंड बाउंडरी एग्रीमेंट/ एलबीए) को पूरी तरह लागू करने की इच्छा व्यक्त कर यह स्पष्ट किया है कि संकीर्ण राजनीतिक बयानबाजियों को वे राष्ट्रीय हितों पर हावी नहीं होने देंगे. इस समझौते के तहत भारत और बांग्लादेश के बीच 162 छोटे टुकड़ों (अंत:-क्षेत्रों) की अदला-बदली होनी है, जो विभाजन के समय की चूक से एक-दूसरे के क्षेत्र में रह गये हैं. 1974 के इंदिरा गांधी-शेख मुजीब समझौते में इस दोष को दूर करने पर सहमति हो गयी थी. बांग्लादेश की संसद ने इसकी तभी पुष्टि कर दी थी, पर भारतीय संसद अभी तक नहीं कर पायी थी.
सितंबर, 2011 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एलबीए पर दस्तखत किये थे.

चूंकि इसे लागू करने के लिए संविधान संशोधन की जरूरत होती, इसलिए 119वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया. लेकिन, भाजपा के कड़े रुख के कारण यह विधेयक पास नहीं हो सका और मामला संसद की एक स्थायी समिति को सौंप दिया गया. बहरहाल, मोदी के वक्तव्य के बाद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली स्थायी समिति ने अपनी सिफारिशें भी सवार्नुमति से पास कर दीं. स्थायी समिति भी इस समझौते को लागू करने के पक्ष में है. 2011 में हुए एलबीए और तीस्ता जल समझौते को लागू करने में नाकाम रहने के कारण बांग्लादेश की अवामी लीग सरकार को शर्मिदा होना पड़ रहा था, जो भारत के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रही थी. तीस्ता समझौता तृणमूल कांग्रेस की हठ का शिकार हुआ और एलबीए भाजपा के विरोध का.

मोदी सरकार भारत-बांग्लादेश संबंधों को नया आयाम दे रही है. अब उसे तीस्ता समझौता लागू करके बांग्लादेश की वाजिब चिंताओं को दूर करना चाहिए. दोनों देश नदी-जल समझौता करके चीन पर दबाव बना सकते हैं. चीन ब्रrापुत्र नदी पर बांध बना रहा है. ऐसे में मोदी सरकार के पास बांग्लादेश के साथ रिश्तों को बेहतर बनाने का एक सुंदर मौका है. दोनों देश सड़क मार्ग से आवागमन बढ़ा रहे हैं. भारत अपने पूर्वोत्तर को रेलमार्ग से जोड़ देना चाहता है. साथ ही म्यांमार के रास्ते दक्षिण पूर्व एशिया और दक्षिणी चीन से जुड़ने की भी योजनाएं हैं.
हाल ही में भारत और बांग्लादेश ने परमाणु तकनीक के क्षेत्र में सहयोग पर बात शुरू की है. किसी पड़ोसी देश के साथ भारत पहली बार नाभिकीय सहयोग पर बात कर रहा है. भारत-बांग्लादेश सलाहकार समिति की बैठक में पिछले दिनों इस मसले पर चर्चा हुई थी. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और बांग्लादेश के विदेश मंत्री महमूद अली की संयुक्त-अध्यक्षता में सलाहकार समिति की दिल्ली में हुई बैठक में विभिन्न क्षेत्रों में आपसी रिश्तों को गहरा बनाने के लिए कई साझा कार्यक्रमों पर सहमति हुई. भारत ने बांग्लादेश से पूछा है कि वह किस तरह का परमाणु सहयोग चाहेगा. बांग्लादेश के साथ चीन ने परमाणु सहयोग के क्षेत्र में 2005 में समझौता किया था. रूस के साथ भी उसका समझौता है.
भारत और बांग्लादेश के बीच तकरीबन चार दशक से चले आ रहे समुद्री सीमा विवाद के इस साल जुलाई में खत्म होने के बाद इस बात पर रोशनी पड़ी है कि इस क्षेत्र में आर्थिक विकास के लिए विवादों का निपटारा कितना जरूरी है. संयुक्त राष्ट्र के हेग स्थित न्यायाधिकरण ने विवादित क्षेत्र का लगभग 80 फीसदी हिस्सा बांग्लादेश को देने का फैसला किया है. तकरीबन 25,000 वर्ग किमी के विवादित समुद्री क्षेत्र में से तकरीबन 20,000 वर्ग किमी क्षेत्र पर ट्रिब्यूनल ने बांग्लादेश का क्षेत्रधिकार स्वीकार किया. इसके पहले 2012 में बांग्लादेश-म्यांमार के बीच भी इसी प्रकार का निपटारा हुआ था. अब बंगाल की खाड़ी से जुड़े तीनों देश सागर के आर्थिक दोहन के लिए मिल कर काम कर सकेंगे. माना जाता है कि बांग्लादेश के क्षेत्र में तकरीबन 200 ट्रिलियन क्यूबिक फीट प्राकृतिक गैस का भंडार है. यह दुनिया के सबसे बड़े गैस भंडारों में से एक है. 2006 में भारत ने अपने क्षेत्र में लगभग 100 ट्रिलियन घन फुट प्राकृतिक गैस होने का पता लगाया था. यह भंडार कृष्णा-कावेरी बेसिन में उपलब्ध गैस का लगभग दोगुना है. हालांकि इस क्षेत्र का बड़ा हिस्सा बांग्लादेश के पास है, पर प्राकृतिक गैस जमीन के भीतर है. जो पहले दोहन करेगा, वह फायदे में रहेगा, क्योंकि प्राकृतिक गैस का जमीन के भीतर स्नेत क्या है, इसे पहचाना नहीं जा सकता. बांग्लादेश के पास गहरे सागर में तेल की खोज की तकनीक नहीं है. भारत के पास यह तकनीक है. इसलिए यह काम तीनों देश मिल कर भी कर सकते हैं.
पिछले हफ्ते बांग्लादेश ने ऊर्जा के क्षेत्र में भारतीय पेशकश को तरजीह दी है. बिजली आपूर्ति के मुद्दे पर चीन बांग्लादेश को अपनी ओर लाना चाहता था, लेकिन बांग्लादेश ने फैसला किया है कि वह भारत, नेपाल व भूटान के साथ चतुभरुज बनायेगा, जो तेल-गैस क्षेत्र में आपस में सहयोग करेंगे. नरेंद्र मोदी ने ओएनजीसी त्रिपुरा कंपनी लिमिटेड पावर प्लांट की दूसरी इकाई का लोकार्पण करते वक्त कहा कि इस प्लांट की बिजली बांग्लादेश को भी दी जायेगी. बांग्लादेश ने प्लांट के लिए मशीनों को लाने का रास्ता दिया, जिसे भारत के रास्ते लाने में महीनों लग जाते.
बांग्लादेश गेल की कोलकाता पाइपलाइन, एलएनजी टर्मिनल और समुद्री सीमा में नये ब्लॉक पर काम चाहता है. पेट्रोलियम सचिव सौरभ चंद्रा ने कहा कि हम बांग्लादेश के साथ डीजल पाइपलाइन पर शोध कर रहे हैं. 200 करोड़ रुपये की लागत से सिलीगुड़ी-नुमालीगढ़ (असम) से पार्वतीपुर (बांग्लादेश) तक पाइपलाइन पड़ेगी. इस तरह बंगाल की खाड़ी में आर्थिक विकास के नये रास्ते खुल रहे हैं, जिससे दोनों देशों को फायदा होगा. बांग्लादेश अपने लिए उपग्रह की बात भी सोच रहा है. इसमें भी भारतीय सहयोग संभव है. लेकिन, मोदी सचमुच बांग्लादेश के साथ संबंधों का नया अध्याय लिखना चाहते हैं, तो अवैध बांग्लादेशियों को लेकर तीखे बयानों से सत्ता पक्ष को परहेज करना होगा.
प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार
pjoshi23@gmail.com
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