हुनर विकास के सरकारी हाथी

21वीं सदी को ज्ञान और हुनर का युग कहा जाता है. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नॉलेज बेस्ड इकोनॉमी या ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की बात करते थे. मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत में हुनर के विकास (स्किल डेवलपमेंट) से बड़ी आबादी को रोजगार देने और अर्थव्यवस्था को विकसित करने की बात लगातार कह रहे हैं. लेकिन […]
21वीं सदी को ज्ञान और हुनर का युग कहा जाता है. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नॉलेज बेस्ड इकोनॉमी या ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की बात करते थे. मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत में हुनर के विकास (स्किल डेवलपमेंट) से बड़ी आबादी को रोजगार देने और अर्थव्यवस्था को विकसित करने की बात लगातार कह रहे हैं.
लेकिन इसकी जमीन पर क्या दशा है, यह देखना हो तो झारखंड चले आइए. राज्य में हुनर विकास के दो प्रमुख जरिये हैं, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आइटीआइ) और पॉलिटेक्निक. दूरदराज के जिलों की तो जाने दीजिए, राजधानी रांची में इन दोनों संस्थानों का बुरा हाल है. राजधानी का पॉलिटेक्निक गोशाला से बदतर हालत में दिखता है. कोई बुनियादी सुविधा नहीं है.
शिक्षक ों-प्रशिक्षकों का घोर अभाव है. बिना उपकरणों की प्रयोगशालाओं से छात्र क्या खाक सीखेंगे! आइटीआइ की स्थिति भी अलग नहीं है. राज्य के किसी आइटीआइ में अभी स्टेनोग्राफी की पढ़ाई नहीं हो रही है. इस साल भी इस ट्रेड में दाखिला नहीं लिया गया, क्योंकि कोई पढ़ानेवाला (इंस्ट्रक्टर) नहीं है. 14 सालों में राज्य में कई सरकारें बदलीं, लेकिन युवाओं के रोजगार से सीधे-सीधे ताल्लुक रखनेवाले इन संस्थानों की सुध किसी ने नहीं ली. बस थोड़ा-बहुत पैसा देकर सरकारी जिम्मेदारी पूरी कर ली गयी. जो पैसा दिया गया, उससे काम क्या हुआ, यह खबर लेनेवाला कोई नहीं है. मिसाल के तौर पर, रांची पॉलिटेक्निक को विश्व बैंक के एक कार्यक्रम के तहत मोटी रकम मिली, लेकिन उससे कोई काम हुआ नजर नहीं आता. साफ है कि यह पैसा खा-पका लिया गया.
आइटीआइ और पॉलिटेक्निक से निकलने के बाद छात्रों को नौकरी मिली या नहीं मिली, इससे किसी को कोई मतलब नहीं. इन्हीं सबका नतीजा है कि आज अपने देश में डिग्रीधारी बढ़ रहे हैं, लेकिन वे नौकरी पाने के काबिल नहीं. एक तरफ लोग इंजीनियरिंग से लेकर प्रबंधन तक की डिग्रियां लिये मारे-मारे फिर रहे हैं, तो दूसरी तरफ अच्छे ड्राइवर, बावर्ची, फिटर, वेल्डर, इलेक्ट्रीशियन वगैरह नहीं मिल रहे. जो मिल रहे हैं, उनमें से ज्यादातर ने किसी संस्थान से नहीं, बल्कि अपने ‘उस्ताद’ से काम सीखा है. फिर ऐसे संस्थानों का फायदा क्या?
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