हालात बदलने निकले मतदाता

झारखंड में विधानसभा चुनाव का प्रथम चरण छिटपुट घटनाओं को छोड़ सकुशल संपन्न हुआ. छतरपुर विस क्षेत्र के नौडीहा थाने के तहत कुहकुह के क्लस्टर पर नक्सली हमले का जवानों द्वारा मुंहतोड़ जवाब देना तथा मनिका विस क्षेत्र के महुआटांड़ के प्राथमिक विद्यालय में बम बरामदगी सुरक्षा तंत्र की मुस्तैदी के प्रति आश्वस्त कराते हैं. […]
झारखंड में विधानसभा चुनाव का प्रथम चरण छिटपुट घटनाओं को छोड़ सकुशल संपन्न हुआ. छतरपुर विस क्षेत्र के नौडीहा थाने के तहत कुहकुह के क्लस्टर पर नक्सली हमले का जवानों द्वारा मुंहतोड़ जवाब देना तथा मनिका विस क्षेत्र के महुआटांड़ के प्राथमिक विद्यालय में बम बरामदगी सुरक्षा तंत्र की मुस्तैदी के प्रति आश्वस्त कराते हैं.
प्रथम चरण में झारखंड की जिन 13 सीटों के लिए मतदान हुए वे नक्सल प्रभावित क्षेत्र में आती हैं. वहां हुआ 62 प्रतिशत मतदान, मतदाताओं के निर्भीक आचरण को दिखाता है. इससे पता चलता है कि मतदाताओं को नक्सलियों के वोट बहिष्कार की कोई परवाह नहीं. ये वो इलाके हैं जहां 2005 तथा 2009 के विधान सभा चुनावों में क्रमश: 54 प्रतिशत तथा 56 प्रतिशत मतदान हुआ था. मतदान प्रतिशत में सुधार से यह भी पता चलता है कि यह जन-उभार जनतंत्र के इस पर्व को बेहद उम्मीद भरी निगाहों से देखनेवाले लोगों का है.
जनतंत्र के पायों से उन्हें अब भी उम्मीद है. वोट बहिष्कार से किनाराकशी का यह रुख झारखंड में ही नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर में हुए 71 प्रतिशत मतदान में भी दिखा. दरअसल मतदाताओं के रुख का यह अखिल भारतीय स्वरूप सिर्फ नये मतदाताओं का नहीं, बल्कि यथास्थितिवाद के खिलाफ ऊब और क्षोभ का प्रदर्शन भी है. मतदान की यह सफलता न सिर्फ चुनाव आयोग की कारगर पहल और सुरक्षा तंत्र की मुस्तैदी का उदाहरण है, बल्कि चुनाव से हताश-निराश वर्ग की सक्रियता का भी उदाहरण है.
दरअसल मतदाताओं का यह रुख उन बड़ी राष्ट्रीय व क्षेत्रीय पार्टियों के लिए सीख से भरा है, जो सत्ता पर वर्चस्व की भूख से न केवल व्याकुल हैं, बल्कि उन्हें अपनी कामयाबी से यह गुरूर हो चला है कि सियासी बिसात पर उनकी चालों का कोई जवाब नहीं. लोग उनकी मरीचिकाओं के पीछे भटकते भी रहे हैं. पर जनतंत्र के इस संदेश को आगे बढ़ाने के लिए बढ़े मतदान प्रतिशत के साथ उभरे सामाजिक वर्ग को अपनी जिम्मेवारियों का अहसास होना जरूरी है. मतदाताओं के इस उभार में जो पार्टियां लाभान्वित नहीं होती हैं, उन्हें जन मानस के संदेश को पढ़ लेना चाहिए. इस उभार से लाभान्वित पक्ष के लिए जरूरी है कि चुनाव बाद भी वह जनता के इस राजनीतिक उभार को हल्के में न ले.
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