ये कैसे-कैसे लोग जला रहे रावण!

Published at :02 Oct 2014 4:34 AM (IST)
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ये कैसे-कैसे लोग जला रहे रावण!

विश्वत सेन प्रभात खबर, रांची रावण को खलनायक मान हम उसके पुतले बरसों से जला रहे हैं, पर कलियुगी खलनायक उस पर भारी पड़ते दिखायी दे रहे हैं. बचपन से ही सुनते आये हैं कि राम-रावण की लड़ाई बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है. त्रेतायुगीन समाज में रावण को खलनायक माना गया, क्योंकि […]

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विश्वत सेन

प्रभात खबर, रांची

रावण को खलनायक मान हम उसके पुतले बरसों से जला रहे हैं, पर कलियुगी खलनायक उस पर भारी पड़ते दिखायी दे रहे हैं. बचपन से ही सुनते आये हैं कि राम-रावण की लड़ाई बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है. त्रेतायुगीन समाज में रावण को खलनायक माना गया, क्योंकि उस समय के समाज में सत्य का बोलबाला था. दुराचारियों, परस्त्रीगामियों, व्यभिचारियों, भ्रष्टाचारियों, हत्यारों, घोटालेबाजों, पैंतरेबाजों, घाघों, गली-कूचे के छुटभैया नेताओं, जनता को उल्लू बनानेवाले राजनेताओं, पैसे के लिए कुछ भी कर गुजरनेवाले अभिनेताओं आदि की कमी थी.

लेकिन आज सद्पुरुषों की कमी है और उपरोक्त टाइप के लोगों की भरमार. अहंकार रावण का सबसे बड़ा शत्रु साबित हुआ, लेकिन वह दुराचारी नहीं था. इसमें भी कोई दो राय नहीं कि वह बहुत बड़ा विद्वान और तपस्वी था. ताज्जुब तब होता है, जब हमारे देश में कलियुगी सतोगुणी व्यक्तियों द्वारा रावण के पुतले को जलाया जाता है.

हर साल रावण के लाखों पुतले जलाने वाले स्वयंभू सतोगुणी लोगों में रावण से बढ़ कर अहंकार भरा हुआ है. उनमें ऐसी बुराइयां भी कूट-कूट कर भरी हुई हैं जो रावण को छू तक न गयी थीं. कहा गया है कि किसी को पहला पत्थर वो मारे जिसने कोई पाप न किया हो. बुराइयों का पुतला खुद हैं और जला रहे हैं रावण को. दूसरे को उपदेश देने से पहले खुद को सुधारें. महात्मा गांधी ने गुड़ खाने से बच्चे को मना करने के लिए पहले खुद की आदत में सुधार किया था. जब उन्होंने खुद में सुधार कर लिया, तब जाकर बच्चे को समझाया कि ज्यादा गुड़ खाना अच्छी बात नहीं है. आज जो लोग रावण को जलाते हैं, क्या वे अपने अंदर के रावण को समाप्त करने का प्रयास करते हैं. एक तरफ वे रावण के पुतले को जलाते हैं और दूसरी ओर पुतला जलाने के लिए मोहल्ले से इकट्ठा किये गये धन से दारू -मुर्गा उड़ाते हैं.

त्योहारों का मौसम आते ही गली-मोहल्लों में जबरन चंदा लेनेवाले उमड़ पड़ते हैं. लेकिन क्या कभी किसी ने यह पूछने की जुर्रत की कि वे उस पैसे का कहां और कैसे प्रयोग करते हैं? जुर्रत कोई करे भी कैसे, रामभक्त होने की खाल ओढ़े लफंगे सवाल करनेवालों की ‘खातिरदारी’ के लिए तैयार बैठे रहते हैं. आज रावण का पुतला धार्मिक आस्था से कम और व्यवसाय से ज्यादा जुड़ा है. हजारों रुपये के पटाखों से लैसे पुतलों की कीमत लाखों तक पहुंच जाती है और इसी के साथ मोटी हो जाती है उन सतोगुणी लोगों की जेबें, जो बुराई का दहन करने के लिए समाज के लोगों का मजमा लगाते हैं. आज हालात ऐसे बन गये हैं कि ऐसा एक आदमी खोजना मुश्किल हो जायेगा जो सचमुच में रावण को जलाने लायक हो. रावण को ऐसे लोग जला रहे हैं जो चाल-चरित्र में उससे कहीं नीचे हैं.

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