मकसद, भविष्य गढ़ना!
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :02 Oct 2014 3:55 AM (IST)
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।। हरिवंश ।। अब और नहीं मत छुपाओ, आवाज उठाओ बच्चों के खिलाफ हर दिन हिंसा होती है. चाहे वह पारंपरिक रूप में हो या अनुशासन के रूप में. इसे आज ही समाप्त किया जाना चाहिए. बच्चों के खिलाफ हिंसा की समाप्ति के लिए झारखंड में एक अभियान ‘‘अब और नहीं. मत छुपाओ, आवाज उठाओ’’, […]
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।। हरिवंश ।।
अब और नहीं मत छुपाओ, आवाज उठाओ
बच्चों के खिलाफ हर दिन हिंसा होती है. चाहे वह पारंपरिक रूप में हो या अनुशासन के रूप में. इसे आज ही समाप्त किया जाना चाहिए. बच्चों के खिलाफ हिंसा की समाप्ति के लिए झारखंड में एक अभियान ‘‘अब और नहीं. मत छुपाओ, आवाज उठाओ’’, की शुरुआत की गयी है.
इस अभियान का मकसद, भविष्य गढ़ने से है. ‘बच्चों को हिंसा से बचाने’ की जागरूकता, कोशिश या अभियान एक नयी बेहतर दुनिया बनाने की बुनियादी शर्त है. इस प्रयास में शामिल हैं, झारखंड पुलिस, यूनिसेफ व प्रभात खबर.आज समाज और व्यवस्था, दोनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि बेहतर इंसान कौन गढ़ या बना सकता है? महज सरकारी व्यवस्था या कानूनों के बल श्रेष्ठ समाज की परिकल्पना पूरी नहीं होनेवाली, यह स्थापित तथ्य है. पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे कलाम ने हाल ही में एक जगह टिप्पणी की कि क्या सरकारें या संस्थाएं बेहतर मनुष्य बना सकती हैं?
फिर कहा, मेरा उत्तर है कि नहीं, और बिल्कुल नहीं. यह प्रक्रिया शुरू होती है, घरों से व स्कूलों से. डॉ कलाम के इस सुझाव में समाज को भी जोड़ देना चाहिए. यानी घर, स्कूल व समाज में बच्चों के प्रति एक नयी चेतना, मानवीय परिकल्पना और सोच हो, तो हालात बदल सकते हैं. इस अभियान की यही कोशिश है.
उपलब्ध आंकड़े-तथ्य बताते हैं कि भारत में बच्चों पर हर क्रूर अत्याचार हो रहे हैं. उनकी हत्याएं होती हैं. किशोर लड़कियों पर शारीरिक अत्याचार होते हैं. बच्चियों के साथ आजीवन यौन उत्पीड़न होता है. लड़कियों के खिलाफ क्रूरता करेनवाले अधिकतर करीबी ही होते हैं. हाल ही में दुनिया की प्रख्यात संस्था यूनिसेफ ने बच्चों के खिलाफ इस हिंसा पर तथ्यवार विश्लेषण कराया है. आंकड़ों के माध्यम से दुनिया के 190 देशों में बच्चों के प्रति हिंसक व्यवहार और सामाजिक परिचलन को इस रिपोर्ट में समझने की कोशिश है. सबसे दुखद पहलू यह है कि ऐसी अधिकतर वारदातें उनलोगों द्वारा ही की जाती हैं, जिनका दायित्व बच्चों को सुरक्षा देना है. देखभाल करना है. यह एक सामाजिक रोग है.
कानून अपना काम करे. पर, इससे भी महत्वपूर्ण है कि इस मानवीय ढंग से बरताव करें. बच्चे ही, इस सृष्टि के भविष्य हैं. बचपन से ही उन्हें, सुरक्षा का बेहतर माहौल मिले, भावनात्मक रूप से वे मजबूत हों. उनमें हीन भावना न आये. वे समाज के उत्पीड़न से बचे, समाज-परिवार का यही बुनियादी फर्ज हो, इस अभियान का स्वर या मकसद है.
यह एक पवित्र व सात्विक कोशिश है. हर इंसान का धर्म है कि वह इस अभियान का हिस्सा बने. खुद बदले और आसपास ऐसा माहौल बनाये कि हम सब बदलें. सिर्फ नया माहौल बनने लगे, हम पायेंगे, हमारे समाज-धरती व परिवार के बच्चे एक नयी उड़ान भर रहे हैं. नयी दुनिया बना रहे हैं. मनुष्य होने की गरिमा को एक नयी ऊंचाई दे रहे हैं.
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