एक सांस की कीमत तुम क्या जानो
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :27 Nov 2019 7:02 AM (IST)
विज्ञापन

नाजमा खान पत्रकार nazmakhan786@gmail.com अंग्रेजी में एक लाइन है, ‘अर्थ हैज म्यूजिक फॉर दोज हू लिसन’ (कायनात का अपना एक संगीत है, उनके लिए जो इसे सुन सकते हैं). यह लाइन उस मंजर को देखते हुए मेरे कान में गूंज रही थी. चांदनी रात और सामने बर्फ से ढके हिमालय पर एक खास कोण से […]
विज्ञापन
नाजमा खान
पत्रकार
nazmakhan786@gmail.com
अंग्रेजी में एक लाइन है, ‘अर्थ हैज म्यूजिक फॉर दोज हू लिसन’ (कायनात का अपना एक संगीत है, उनके लिए जो इसे सुन सकते हैं). यह लाइन उस मंजर को देखते हुए मेरे कान में गूंज रही थी. चांदनी रात और सामने बर्फ से ढके हिमालय पर एक खास कोण से पड़ रही चांदनी. उस वक्त मेरी जो कैफियत थी, उसे सम्मोहित जैसे शब्द में पिरोया ही नहीं जा सकता.
चांद-सितारों से भरे आसमान की खामोशी को गिटार से निकल रही धुन तोड़कर एक ऐसे माहौल से जोड़ रही थी, जिसे सुकून कहा जा सकता है. मेरे होटल के कुछ मुसाफिर हिमालय के प्रसाद का सेवन कर सुकून की तलाश में थे और कुछ बालकनी में कुर्सी लगाये बात कर रहे थे. ठंड बढ़ रही थी. मैं सर्दी की वजह से जम रही थी या सामने दिख रही कुदरत की खूबसूरती ने मुझ पर कोई जादू कर दिया था, मैं बता नहीं सकती.
हमारे सफर का यह एक पड़ाव था. अगले दिन वहां से चलते हुए मैंने महसूस किया कि जो मंजर मेरे लिए बेहद खास था, वही मंजर हिमाचल प्रदेश में पार्वती वैली के उस गांव के लोगों के लिए बिल्कुल आम था.
अगले पड़ाव की तरफ बढ़ते हुए लग रहा था कि गाड़ी से सफर करना इन पहाड़ों की खूबसूरती के साथ नाइंसाफी है. दिल्ली में पानी के लिए नल को घंटों निहारनेवाली मैं पहाड़ों की नदियों के हरे-नीले पानी को घंटों बहते देखती रहती हूं. जिन चट्टानों को नदी ने तराश कर नन्हें पत्थरों में तब्दील कर दिया है, उन पत्थरों को साथ ले आती हूं और उन पर लिखती हूं कि किसको गंगा किनारे से उठाया था और किसको लहरों के बीच से खींच लिया था.
हालांकि, इन पत्थरों में कोई फर्क नहीं दिखता है. कुछ ऐसा ही हाल पहाड़ों की हवा के साथ भी है. मैं पहाड़ों पर जाती हूं, तो दिल खोलकर सांस अपने अंदर खींचने लगती हूं और मन में कहती हूं- ‘एक सांस की कीमत तुम क्या जानो रमेश बाबू!’ दिल्ली वालों के लिए साफ हवा अब एक लग्जरी बन चुकी है, जो सबकी पहुंच से दूर होती जा रही है.
खैर, कोई पहाड़ों पर सुकून की तलाश में जाता है, तो कोई खुद की तलाश में. जाने क्यों मैं उन चीजों की तरफ खिंची चली जाती हूं, जिन पर शायद दूसरों का ध्यान न जाता हो. मैं सफर में उन औरतों को देखकर हैरान हो जाती हूं, जो अपने सिर से बंधे कपड़े में भारी सिलेंडर को उठाये मुस्कुराते हुए चली जाती हैं.
औरतें एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी पर फसल काटने जाती हैं और इस सफर के दौरान उनके मुलायम और नाजुक हाथों के बीच लगातार मलाना की पत्तियां रगड़ खाती रहती हैं, जो शाम को घर की आमदनी का जरिया बनती हैं. मैं दंग रह जाती हूं, जब एक 70 साल की बुजुर्ग आहिस्ता-आहिस्ता मुझसे ज्यादा मजबूती से अपना सफर पूरा कर लेती है. ये औरतें मुझे मुझसे ज्यादा मजबूत लगती हैं, जिन्हें शायद मुश्किल जिंदगी को मजबूती के साथ जीने की नेमत मिली है. जिंदगी में जब मैं हताश होती हूं, तो पहाड़ों का रुख करती हूं, ताकि इनकी मुश्किल जिंदगी से कुछ सीख सकूं.
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
विज्ञापन
लेखक के बारे में
By Prabhat Khabar Digital Desk
यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।
Tags
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए
विज्ञापन




