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द्विपक्षीय रिश्ते बढ़ाए भारत

Updated at : 06 Nov 2019 6:34 AM (IST)
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द्विपक्षीय रिश्ते बढ़ाए भारत

शशांक पूर्व विदेश सचिव delhi@prabhatkhabar.in आसियान शिखर सम्मेलन में भाग लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थाईलैंड से स्वदेश वापस लौट आये हैं. इस शिखर सम्मेलन का आयोजन दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन द्वारा की जाती है, जिसमें दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के विभिन्न मसलों पर चर्चा होती है. आसियान में भारतीय प्रधानमंत्री की ऑस्ट्रेलिया और वियतनाम के […]

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शशांक
पूर्व विदेश सचिव
delhi@prabhatkhabar.in
आसियान शिखर सम्मेलन में भाग लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थाईलैंड से स्वदेश वापस लौट आये हैं. इस शिखर सम्मेलन का आयोजन दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन द्वारा की जाती है, जिसमें दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के विभिन्न मसलों पर चर्चा होती है.
आसियान में भारतीय प्रधानमंत्री की ऑस्ट्रेलिया और वियतनाम के अपने समकक्षों के साथ कई महत्वपूर्ण बिंदुआें पर चर्चा हुई. इस यात्रा के महत्वपूर्ण पहलुओं में खुद थाईलैंड से बातचीत भी थी, क्योंकि भारत और थाईलैंड के आपसी रिश्ते बहुत मजबूत हैं. दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान की भी बात हुई है, जो रिश्तों की प्रगाढ़ता का द्योतक है.
इस बातचीत का सिरा भविष्य की तरफ ले जाया गया है, ताकि आगामी वर्षों में दोनों देशों के बीच आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनयिक रिश्तों में नये आयाम स्थापित किये जा सकें. सांस्कृतिक आदान-प्रदान का बड़ा फायदा है, क्योंकि इस रास्ते चल कर भी देश अपनी तमाम आर्थिक, राजनीतिक, कूटनीतिक सफलताएं हासिल कर सकते हैं.
इस यात्रा की एक और महत्वपूर्ण बात यह भी है कि क्वॉड के चार सदस्य देशों- भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया- के बीच बैठकों का एक दौर चला, जहां इन देशों के विदेश मंत्रियों और शीर्ष अधिकारियों के बीच संचार, आर्थिक साझेदारी और साइबर सुरक्षा आदि कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर बातचीत हुई. हालांकि, दस देशों के समूह आसियान के साथ व्यापार और आर्थिक मसलों पर जो बातचीत हुई है, भारत के लिए वह एक नये तरह की यात्रा की ओर कदम बढ़ाना है.
क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीइपी) में भारत शामिल नहीं हो रहा है. इस संबंध में भारतीय प्रधानमंत्री ने यह कहा है कि यह समझौता भारत के बाकी मसलों और चिंताओं का कोई ठोस समाधान नहीं करता है, क्योंकि भारत व्यापक क्षेत्रीय एकीकरण के साथ ही मुक्त व्यापार के पक्ष में है.
हालांकि, भारत के इस कदम को लेकर यह बात सामने आयी है कि भारत ने आखिरी क्षण में अपनी बात रखी थी, जिसे मानना आरसीइपी समझौते के लिए उचित नहीं था. जो भी हो, प्रधानमंत्री ने कुछ सोच-समझ कर ही यह निर्णय लिया होगा. भारत का यह तर्क सही है कि इससे हमारा नुकसान हो सकता है, खासकर चीन के साथ व्यापार को लेकर जो कुछ चल रहा है, उसे देखते हुए यह कदम ठीक जान पड़ता है.
हालांकि, बातचीत के सिरों में एक सिरा खुला भी रखा गया कि आनेवाले समय में भारत की मांगों को समूह के सदस्य मान लेंगे और तब शायद समझौते में भारत शामिल हो जाये. लेकिन, यह अभी भविष्य के गर्भ में है और इस संबंध में अभी से कुछ कहना उचित नहीं होगा.
भारत जब तक पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हो जाता, तब तक वह अपने इस कदम पर बना रहेगा और दक्षिण एशिया में अपनी मजबूत स्थिति को बरकरार रखने के लिए दूसरे महत्वपूर्ण उपायों के साथ आगे बढ़ता रहेगा. भारत इस बात को देखेगा कि आगे आनेवाले दिनों में आरसीइपी से बाकी देशों को क्या सफलता हासिल होती है. उसके मद्देनजर ही वह अपनी रणनीति में बदलाव करेगा.
आरसीइपी समझौते से भले ही भारत ने कदम वापस खींच लिये हैं, लेकिन बाकी देशों के साथ वह द्विपक्षीय व्यापार करता रहेगा, जैसा कि न्यूजीलैंड के साथ कर रहा है. आरसीइपी समझौते की बात जब शुरू हुई थी, तभी से उसके विरोध में भारत के किसान संगठन, कुछ औद्योगिक इकाइयां और डेयरी उत्पादक खड़े होने लगे थे. इस व्यापक विरोध के बीच इस समझौते में शामिल होना उचित नहीं था, इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ने कठोर निर्णय लिया. हालांकि, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में हम बहुत आगे बढ़ गये हैं, लेकिन फिर भी आसियान देशों में भारत से तीन-चार देश ही नीचे हैं, बाकी सारे देश आगे हैं.
ऐसे में यह लग रहा था कि फायदा उन्हीं अमीर मजबूत देशों को मिलता, भारत को नहीं. हालांकि, भारत अब आरसीइपी से अब बाहर आ गया है, तो इसका भी कुछ नुकसान भारत को होगा, क्योंकि बाहर के जो देश हमारे यहां निवेश करना चाहते हैं, या जो देश यह सोचते हैं कि भारत के इन्फ्रास्ट्रक्चर का फायदा उसे मिल सकता है, वे देश अब इस फैसले के बाद भारत में निवेश नहीं करेंगे. ऐसे में भारत को अपने पुराने व्यापारिक दोस्तों के साथ ही मुक्त व्यापार को आगे बढ़ाना होगा. अब हमें अपने डेयरी उत्पादों के बाजार को द्विपक्षीय स्तर पर ही आगे ले जाना होगा.
मेरा यह मानना है कि आरसीइपी से बाहर होने के बाद अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक संबंधों में भारत की स्थिति थोड़ी कमजोर होगी, जिसे अन्य नजदीकी देशों के साथ द्विपक्षीय स्तर पर अपने व्यापार को बढ़ावा देकर ही मजबूत करना होगा. दूसरी कोशिश यह हो सकती है कि जिन देशों में भारत को फायदा हो सकता है, मसलन अफ्रीका, मॉरीशस, आदि वहां-वहां व्यापार को बढ़ाया जा सकता है, ताकि आरसीइपी से बाहर होने के बाद होनेवाले नुकसान की भरपाई की जा सके.
फिलहाल, अब चीन के हाथ में गेंद चली गयी है और वह एशिया पैसेफिक और इंडो पैसेफिक में अब तेजी से अपने व्यापार को आगे बढ़ायेगा. चीन को सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि बाकी देशों में उसके प्रसार के साथ उसकी अर्थव्यवस्था का विस्तार होगा. सबसे अहम बात यह है कि दक्षिण एशिया के जो देश हमारे साथ व्यापार कर रहे थे, अब चीन उन्हें अपनी ओर खींचने की कोशिश करेगा और जाहिर है कि इससे उसे फायदा होगा. दक्षिण एशिया के उन देशों को भी चीन से फायदा मिलेगा, क्योंकि चीन के सस्ते उत्पादों से दुनिया अटी पड़ी है.
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन और भारत के बीच के व्यापार में चीन के मुकाबले में भारत का व्यापार घाटा ज्यादा है, इसलिए इस घाटे को कम करने के बारे में भारत को सोचना है. आसियान भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा है, लेकिन इस बार जो हालात बने हैं, अब ऐसा नहीं है.
दक्षिण एशिया में अपने पांव पसार कर ही अपनी स्थिति मजबूत बनायी जा सकती है. आज अंदरूनी हालात ऐसे हैं कि कोई साथ चलने को तैयार नहीं है, और आरसीइपी से बाहर होने के बाद तो मोदी सरकार को नुकसान हो सकता है. इसके लिए सबसे पहले देश के अंदर किसानों और डेयरी उद्यमों के साथ बात करनी होगी. हमारे यहां उत्पादन बहुत होता है, इसलिए सरकार को इस बारे में सोचना चाहिए.
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