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धुएं से उठते नोट

Updated at : 04 Nov 2019 5:33 AM (IST)
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धुएं से उठते नोट

आलोक पुराणिक वरिष्ठ व्यंग्यकार puranika@gmail.com दिल्ली समेत तमाम शहरों में प्रदूषण बहुत खतरनाक स्तर तक जा पहुंचा है. स्मार्ट सिटी के कंसेप्ट से चले थे, अब सांस-फ्रेंडली शहर बनाये रखने में आफत हो गयी है. सिटी स्मार्ट ना हुए, तो क्या जो इस धूल-धक्कड़ से बच जाये, उसे स्मार्ट बंदा मान लिया जाये. वो वाला […]

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आलोक पुराणिक
वरिष्ठ व्यंग्यकार
puranika@gmail.com
दिल्ली समेत तमाम शहरों में प्रदूषण बहुत खतरनाक स्तर तक जा पहुंचा है. स्मार्ट सिटी के कंसेप्ट से चले थे, अब सांस-फ्रेंडली शहर बनाये रखने में आफत हो गयी है. सिटी स्मार्ट ना हुए, तो क्या जो इस धूल-धक्कड़ से बच जाये, उसे स्मार्ट बंदा मान लिया जाये.
वो वाला पॉल्यूशन मास्क पहनिये, पहनना बहुतै जरूरी है. लीजिये, लीजिये. वो पॉल्यूशन मास्क बेच गये. वो वाला एयर प्योरीफायर लीजिये, बहुतै जरूरी है, ले लीजिये- वरना दम घुट जायेगा. वो एयर प्योरीफायर बेचकर निकल लिये.
ऊ वाला टाॅनिक ले लीजिये बाॅडी में ताकत आ जायेगी, पॉल्यूशन से लड़ने की, निकालिए रकम. वह खास च्यवनप्राश तो बनाया ही गया है पॉल्यूशन से रक्षा के लिए, लीजिये फौरन लीजिये. ऐसे ही तमाम तरह के आइटम बेचे जा रहे हैं.
समस्या किसी की होती है, किसी के लिए रोजगार हो जाता है. किसी की सेल धड़ाधड़ बढ़ जाती है. दिल्ली समेत तमाम शहरों में प्रदूषण खतरनाक स्तर पर जा चुका है.
खतरनाक से परम खतरनाक हो जायेगा, तो क्या हो जायेगा. कुछ ना होगा. कोई ऑर्केस्ट्रा कंपनी पॉल्यूशन पर फोकस कोई संगीत सम्मेलन स्पांसर कर देगी. कुछ गायक लोग प्रदूषण पर रैप सांग दे मारेंगे. दस-बीस शो बन जायेंगे प्रदूषण से मरते लोगों पर. रोजगार मिल जायेगा कई एक्सपर्ट लोगों को.
गजब तो ई है कि पॉल्यूशन के धुएं में खांसता हुआ आम आदमी पूछता है कि मुंबई में सरकार किसकी बनेगी? अबे जिसकी भी बने, धुएं से तुझे कोई ना बचायेगा. कुछ दिन पहले मुंबई की बारिश में बदहाल व्यवस्था में एक डॉक्टर खुले मेनहोल में डूबकर मर गयी. नगर निगम, राज्य सरकार किसी की भी हों, कोई फर्क ना पड़ता. डॉक्टर मर गयी, कोई खबर ना बनी. सारी खबर यह है कि सरकार किसकी बनेगी. सरकार जिसकी भी बनेगी, वह पब्लिक को बनायेगी, पर सड़क-नालियां कायदे से नहीं बनायेगी.
कमाल मुल्क है. समस्या होती है, तो पब्लिक के सामने नाच-गाकर हल निकालने की कोशिश की जाती है. पानी खराब है, एकैदम खराब है, तो भ्रष्ट नगर निगम अधिकारियों, भ्रष्ट नगर पालिका अधिकारियों, भ्रष्ट मंत्रियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. कोई चैनल पानी पर सेमिनार करवा देगा, जिसे कोई वाटर प्योरीफायर कंपनी स्पांसर कर देगी. बस!
साफ पानी पीना चाहिए, यह सबको पता है, पर नेताओं और अफसरों के चलते पानी साफ बने कैसे रहे, यह सवाल कोई ना उठाता. बस पब्लिक को समझ जाना चाहिए कि वो वाला वाटर प्योरीफायर वो वाला आरओ सिस्टम लेना चाहिए. धुएं से कारोबारियों के लिए नोट निकल रहे हैं. गंदे पानी से भी कई कारोबारियों के लिए नोट बन रहे हैं. पब्लिक का क्या है, वह धुएं में खुद गिर जाये या गंदा पानी पीकर डूब जाये.
जब तक पॉल्यूशन में खांसता बंदा सवाल ना पूछेगा कि धुएं या गंदे पानी के लिए जिम्मेदार कौन है, तब तक वोट सिर्फ खांसने और मरने के लिए ही होंगे और नेता मस्त रहेंगे.
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