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आतंक के विरुद्ध खड़ा होना जरूरी

Updated at : 01 Oct 2019 7:18 AM (IST)
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आतंक के विरुद्ध खड़ा होना जरूरी

आकार पटेल लेखक एवं स्तंभकार aakar.patel@gmail.com चेग्वेरा अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी थे. शिक्षा से वे एक डॉक्टर थे, जिन्हें आज पूरी दुनिया के करोड़ों लोगों द्वारा एक क्रांतिकारी के रूप में पूजा जाता है. वर्ष 1959 में 31 की उम्र में चे भारत के दौरे पर आये, तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू से उनके आवास पर मिले और उनके […]

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आकार पटेल
लेखक एवं स्तंभकार
aakar.patel@gmail.com
चेग्वेरा अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी थे. शिक्षा से वे एक डॉक्टर थे, जिन्हें आज पूरी दुनिया के करोड़ों लोगों द्वारा एक क्रांतिकारी के रूप में पूजा जाता है.
वर्ष 1959 में 31 की उम्र में चे भारत के दौरे पर आये, तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू से उनके आवास पर मिले और उनके साथ भोजन किया. उन्होंने ‘बोलीवियन डायरी’ तथा ‘दि मोटरसाइकिल डायरीज’ नामक दो असाधारण पुस्तकें लिखीं. दूसरी पुस्तक पर वर्ष 2004 में एक पुरस्कृत फिल्म भी बनी.
मगर चे की ख्याति अपने उद्देश्यों के लिए हिंसा का सहारा लेने से स्फूर्त हुई. मूलतः वे अर्जेंटीना के रहनेवाले थे, जो क्यूबा में बटिस्टा सरकार के विरुद्ध क्यूबाई क्रांतिकारी नेता फिदेल कास्त्रो द्वारा चलाये जा रहे गृहयुद्ध में कास्त्रो का साथ देने क्यूबा चले गये. बाद में, वे बोलीविया में बरिएंटोस सरकार के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध का संचालन करने गये और वहीं 1967 में 39 वर्ष की उम्र में बोलीविया के सैनिकों द्वारा मारे गये.
इसी तरह, जॉर्ज ऑरवेल भी एक अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी थे, जिनका जन्म बिहार के मोतिहारी में हुआ था. एक पुलिस अधिकारी के रूप में अपने संक्षिप्त सेवाकाल के बाद उन्होंने कई किताबें लिखीं, जिन्होंने उन्हें इतिहास के सर्वाधिक प्रभावशाली लेखकों में एक बना दिया.
‘एनिमल फार्म’ और ‘1984’ उनकी प्रख्यात पुस्तकों में शामिल हैं. समय के साथ अधिकतर आधुनिक लेखक अप्रासंगिक होते गये, मगर ऑरवेल कुछ वैसे लेखकों में हैं, जिनकी दशकों बाद भी सराहना की जाती है.
ऑरवेल को हिंसा से परहेज न था. वे एक ब्रिटिश नागरिक थे, जिन्होंने 1937 में स्पेन जाकर जनरल फ्रांको के विरुद्ध चल रहे गृहयुद्ध में शिरकत की. इस युद्ध के अनुभवों के आधार पर ऑरवेल ने ‘होमेज टू केटलोनिआ’ नामक एक पुस्तक लिखी, जिसमें उन्होंने किसी व्यक्ति पर बम फेंक कर उसकी हत्या करने की घटना का जिक्र किया.
अब मैं इन दो व्यक्तियों के जिक्र की असली वजह पर आना चाहूंगा. शुक्रवार को प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र आमसभा को अपने संक्षिप्त संबोधन के क्रम में निम्नलिखित बात कही: ‘संयुक्त राष्ट्र शांति सेना के मिशनों में जिस देश के सर्वाधिक सैनिकों ने अपना बलिदान किया, वह भारत है. हम उस देश के रहनेवाले हैं, जिसने विश्व को युद्ध नहीं बुद्ध का शांति संदेश दिया.
और यही वजह है कि आतंकवाद की बुराई के प्रति विश्व को सावधान करने की हमारी आवाज में इतनी संजीदगी और गुस्सा है. हमारा यकीन है कि यह किसी एक राष्ट्र के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया तथा मानवता के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में एक है. आतंकवाद के मुद्दे पर हममें सर्वसम्मति का अभाव उन सिद्धांतों का ही क्षरण करता है, जो संयुक्त राष्ट्र के सृजन के आधार हैं.
और इसी वजह से मुझे पूरा विश्वास है कि मानवता के हित में पूरी दुनिया का एकजुट हो आतंकवाद के विरुद्ध खड़ा होना अत्यंत आवश्यक है.’ प्रधानमंत्री ने बिल्कुल सही कहा कि आतंकवाद के मुद्दे पर विश्व में कोई सर्वसम्मति नहीं है. प्रश्न है कि ऐसा क्यों है? इसलिए कि आतंकवाद क्या है और आतंकवादी कौन है, इस संबंध में कोई भी सर्वस्वीकार्य परिभाषा अस्तित्व में ही नहीं है.
कांग्रेस द्वारा दिया गया भारत का पहला आतंकवाद विरोधी कानून, टाडा, एक आतंकवादी के संबंध में यह कहता था: ‘जो भी विधि द्वारा संस्थापित सरकार को भयाक्रांत करने अथवा जनता या उसके किसी हिस्से को आतंकित करने अथवा जनता के किसी हिस्से को अलग-थलग करने या जनता के विभिन्न हिस्सों के बीच सद्भावना पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के इरादे से बमों, डायनामाइट या अन्य विस्फोटक अथवा ज्वलनशील वस्तुओं या आग्नेयास्त्रों अथवा अन्य घातक हथियारों या विषों अथवा हानिकारक गैसों या अन्य रसायनों अथवा अन्य खतरनाक प्रकृति के पदार्थों (जैविक या अन्य) का इस प्रकार इस्तेमाल कर, ताकि किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की हत्या की या चोट पहुंचायी या किसी संपत्ति, आपूर्तियों अथवा खास समुदाय के जीवन हेतु आवश्यक सेवाओं को क्षति पहुंचायी या उसकी संभावना पैदा की जा सके, एक आतंकवादी कृत्य घटित करता है.’
भारत यह मानता है कि कोई ऐसा व्यक्ति जो संपत्ति को विनष्ट करता या आपूर्तियों को बाधित करता है, वह बम अथवा रासायनिक हथियार का प्रयोग करने जैसा ही अपराध करता है.
भाजपा द्वारा दिये गये हमारे दूसरे आतंक-विरोधी कानून पोटा ने आतंकवाद को किसी ऐसे कृत्य के रूप में परिभाषित किया, जिसे ‘भारत की एकता, सुरक्षा या संप्रभुता पर जोखिम अथवा जनता अथवा उसके किसी हिस्से में आतंक पैदा करने के इरादे से अंजाम दिया गया हो.’
इस तरह की अति-व्यापक तथा अस्पष्ट परिभाषाओं ने भ्रम पैदा करने के अलावा भारत को इन मामलों में विश्व में सर्वाधिक न्यून दोषसिद्धि दरों के देशों में शुमार कराया है. टाडा की दोषसिद्धि दर जहां एक प्रतिशत थी, वहीं पोटा के मामले में यह उससे भी कम रही. कोशिश इस बात की होनी चाहिए थी कि इस परिभाषा को और तीक्ष्ण बनाया जा सके, पर भारत में ऐसी चीजों पर गौर नहीं किया जाता.
यहां निहत्थे लोगों द्वारा हथियारबंद लोगों पर या हथियारबंद लोगों द्वारा निहत्थे लोगों पर और उग्रवादियों द्वारा सेना के किलेबंद शिविरों पर किये गये हमलों को भी आतंकवादी कृत्य करार दिया जा सकता है. अहम मुद्दा यह होता है कि हमलावर कौन है. अल्पसंख्यकों को आतंकित करने के इरादे से जब लोगों के एक समूह द्वारा उन पर हमले किया जाते हैं, तो उन्हें दंगाई या अंग्रेजी में ‘लिंचर्स’ कहते हैं. एक ही तरह से किये गये एक जैसे दो अपराध को यहां दो भिन्न नाम दिये जा सकते हैं.
इस मामले में भारत अकेला नहीं है. ऐसे दो उदाहरणों में जिनमें कोई अकेला व्यक्ति दर्जनों निहत्थे व्यक्तियों को मौत के घाट उतार देता है, अमेरिकी राष्ट्रपति उसे ‘आतंकवादी’, ‘अकेला बंदूकधारी व्यक्ति’ या ‘मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति’ की संज्ञा सिर्फ इस आधार पर दे सकते हैं कि वह किस धर्म का अनुयायी है.
आज भारत के द्वारा प्रयुक्त परिभाषा के अंतर्गत चे ग्वेरा तथा जॉर्ज ऑरवेल दोनों आतंकवादी कहे जायेंगे. मगर भगत सिंह, जिन्होंने एक पुलिस अधिकारी की हत्या की तथा दिल्ली की असेंबली में बम फोड़ा, एक शहीद माने जाते हैं. यदि विश्व इस बात पर एकमत नहीं हो सका है कि कौन आतंकवादी है और कौन नहीं है, तो इस भ्रम में भारत का भी योगदान है.
(अनुवाद: विजय नंदन)
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