प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़

आज जिस समाज में हम रह रहे हैं उसमें मानवता नाम की कोई चीज नहीं रह गयी है. अगर आप उम्मीद करते हैं कि अनजान जगह पर कोई आपकी मदद कर दे, तो शायद ही ऐसे लोग मिलेंगे, जो बिना किसी स्वार्थ के मदद कर दे. आज का समाज बहुत ही व्यस्त हो गया है. […]
आज जिस समाज में हम रह रहे हैं उसमें मानवता नाम की कोई चीज नहीं रह गयी है. अगर आप उम्मीद करते हैं कि अनजान जगह पर कोई आपकी मदद कर दे, तो शायद ही ऐसे लोग मिलेंगे, जो बिना किसी स्वार्थ के मदद कर दे. आज का समाज बहुत ही व्यस्त हो गया है. यहां अपनों के लिए समय नहीं है, आप तो फिर भी गैर हैं. प्रतिस्पर्धा की दौड़ अंधी हो गयी है. हर कोई बस आगे निकलने की होड़ में लगा हुआ है.
वह हर कीमत पर आगे रहने की आकांक्षा रखता है. उदाहरण के तौर पर अगर आप गाड़ी या साइकिल से जा रहे हैं, तो आपको कोई भी आगे बढ़ने नहीं देगा. सभी आपको ओवर टेक करने में लगे मिलेंगे, भले इसके चलते रास्ता ही जाम क्यों न हो जाये. आगे निकलने की होड़ में कितनी ही दुर्घटनाएं हो रहीं हैं. प्रशासन से उम्मीद है कि लोगों को जागरूक करने की पहल करेंगे.
पालूराम हेंब्रम, सलगाझारी
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