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ज्येष्ठ पूर्णिमा : नागार्जुन का जन्मदिन

Updated at : 17 Jun 2019 5:52 AM (IST)
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ज्येष्ठ पूर्णिमा : नागार्जुन का जन्मदिन

रविभूषण वरिष्ठ साहित्यकार ravibhushan1408@gmail.com आज ज्येष्ठ पूर्णिमा है. बाबा नागार्जुन का जन्मदिन. उनकी याद बार-बार आती है. आज के दिन कुछ और अधिक. उन पर बहुत कुछ लिखा और कहा गाय है, पर मुझे बार-बार ऐसा लगता रहा है कि कुछ छूट गया है या जिस पर हमारा ध्यान अधिक होना चाहिए, उधर नहीं गया […]

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रविभूषण
वरिष्ठ साहित्यकार
ravibhushan1408@gmail.com
आज ज्येष्ठ पूर्णिमा है. बाबा नागार्जुन का जन्मदिन. उनकी याद बार-बार आती है. आज के दिन कुछ और अधिक. उन पर बहुत कुछ लिखा और कहा गाय है, पर मुझे बार-बार ऐसा लगता रहा है कि कुछ छूट गया है या जिस पर हमारा ध्यान अधिक होना चाहिए, उधर नहीं गया है.
उनका रचना-समय 68 वर्ष का है- 1929 से 1997 तक. वे सदैव उनके कवि रहे हैं, जिन्होंने ‘एक-एक दाने की खातिर सौ-सौ पापड़ बेले.’
उनकी 917 कविताओं को, जिनमें हिंदी की 694, मैथिली की 155, बंगला की 50 और संस्कृत की 18 कविताएं हैं, बार-बार पढ़ने के बाद ऐसा क्यों लगता है कि ये कविताएं हमसे कई बार के पाठ की मांग करती हैं. ये मेरी दृष्टि में स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े भारतीय राजनीतिक कवि हैं.
राजनीतिक कविताओं को टेढ़ी नजर से देखनेवाले आज भी कम नहीं हैं, जबकि राजनीति ही सब कुछ है. अरस्तू ने ‘राजनीति’ को ‘मानवीय संबंधों का दर्शन’ माना है और ब्रेख्त (10 फरवरी, 1898- 14 अगस्त, 1956) तो राजनीतिक रूप से अशिक्षित व्यक्ति को सर्वाधिक अशिक्षित कहते हैं, जो न सुनता है, न बोलता है और न राजनीतिक घटनाओं में भाग लेता है. वह जीवन का मूल्य नहीं जानता. उसे सेम, मछली, आटा, भाड़ा-किराया, जूतों और दवाओं की कीमत नहीं मालूम, जो सब राजनीतिक निर्णयों पर निर्भर करती हैं.
राजनीतिक अशिक्षित इतना मंदबुद्धि और मूर्ख है कि वह घमंडी यह कहते हुए अपनी छाती फुलाता है कि उसे राजनीति से घृणा है. यह मूर्ख नहीं जानता कि उसके राजनीतिक अज्ञान से वेश्याएं, परित्यक्त बच्चे और सभी चोरों में सबसे खराब बुरे राजनीतिज्ञ, भ्रष्टाचारी और राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चाटुकार जन्म लेते हैं.
अपनी पहली प्रकाशित कविता ‘शोक-श्रद्धांजलि’ (1929) में अपने देश की दशा देख कर उनका दिल दहल उठा था- ‘हौं पुनि देख दशा निज देशक/ जानथि ईश्वर कोढ़ फटै अछि.’ नागार्जुन की कविता की सम्यक पहचान के लिए 1929 से 1997 तक के भारत की सम्यक पहचान आवश्यक है.
किसी भी भारतीय कवि ने दो प्रधानमंत्रियों- नेहरू और इंदिरा गांधी पर इतनी कविताएं नहीं लिखीं. आज जब चारों ओर झूठ का बोलबाला है, इस कवि ने 1944 में मैथिली में कविता लिखी थी- ‘अहां बड़ड फूसि बजदू छी’ और वह भी ‘ढाकी के ढाकी’ (टोकरी के टोकरी). नागार्जुन को ‘आधुनिक कबीर’ कहा गया है, पर उन्होंने तुलसी बाबा के साथ रहने पर कविता वैतरणी पार करने की बात कही है- ‘तुलसी बाबा साथ रहइ त/ पार करब/ कविता बइतरनी.’ स्वतंत्र भारत की निर्लज्ज राजनीति से वे परेशान थे. उनकी एक बंगला कविता है- ‘निर्लज्ज नाटक’ (1978)- ‘राजनीति होयेछे संप्रति निर्लज्ज नाटक.’ यह निर्लजता चालीस वर्ष में और अधिक बढ़ी है.
लेनिन पर उन्होंने संस्कृत में भी कविता लिखी. और ‘हिंसा महिमा’ पर भी- ‘हिंसे देवि नमस्तुस्यं/ महाकाल सहोदरे.’ शायद डॉलर पर संस्कृत में कविता केवल उन्होंने ही लिखी- ‘डालरा:’. हिंदी, मैथिली, संस्कृत सभी भाषाओं में उन्होंने देश-दशा पर कविताएं लिखी हैं. जिस जेएनयू पर बाद में हमले किये गये, उसे नागार्जुन ने ‘शानदार’ कहा था- ‘असले जायगाहि एइ भारी चमत्कार/ जेएनयू जेएनयू जेएनयू.’
नागार्जुन हिंदी के अकेले कवि हैं, जिन्होंने अपनी कविताओं में कई बार अपने को ‘जनकवि’ कहा है. जनकवि होने के कारण ही उन्होंने सच कहा, कटु-तिक्त कहा, खरा कहा, व्यंग्य किया और सत्ताधारियों एवं शासकों की नीयत पर सवाल खड़े किये. किसी भी भारतीय कवि ने कांग्रेस को अपनी कविताओं में एेसी खरी-खोटी नहीं सुनायी. जनकवि से पहले उन्होंने अपने को ‘एक मित्र को पत्र’ (1946) कविता में अपने को ‘महाकवि’ कहा है. बाद में ‘महाकवि’ से उन्हें बड़ा ‘जनकवि’ लगा.
वे कभी नहीं हकलाये- ‘जनकवि हूं, मैं क्यों हकलाऊं?’ नागार्जुन के लिए गांधी, भगत सिंह और लेनिन तीनों महत्वपूर्ण थे. अंग्रेजों ने इस देश में शासन करने के लिए जो सत्ता-संरचना निर्मित की थी, वह आजादी के बाद भी यथावत बनी रही. नागार्जुन इस संरचना को तोड़कर एक नयी संरचना के निर्माण के पक्ष में थे.
इसी कारण वे तेलंगाना, नक्सल आंदोलन और संपूर्ण क्रांति की ओर मुड़े. संघर्ष प्रतिरोध और क्रांति के पक्ष में वे सदैव रहे. ब्रिटिश साम्राज्यवाद के साथ ही उन्होंने अमेरिकी साम्राज्यवाद का भी विरोध किया. क्या भारत का कोई अर्थशास्त्री 1948 में भारतीय ब्रिटिश और अमेरिकी पूंजी के उस गंठजोड़ पर नागार्जुन की तरह मुख था?
‘लाल भवानी’ कविता में कवि ने लिखा- ‘अंग्रेजी, अमेरिकी जोंकें, देशी जोंकें एक हुईं/ नेताओं की नीयत बदली, भारत माता टेक हुई.’ नौकरशाही के ‘रद्दी ढांचे’ पर उन्होंने प्रहार किया. नागार्जुन ‘सिस्टम’ का साथ देनेवाले नहीं, उसे ध्वस्त करनेवाले कवि हैं. आज देशभक्तों की बाढ़ आयी हुई है. नागार्जुन ने 1948 में लिखा- ‘देशभक्ति की सनद मिल रही है, आये दिन शैतानों को.’ गोडसे को आज जो भी राष्ट्रभक्त मान ले, उसकी मूर्तियां स्थापित करे, नागार्जुन ने उसे ‘स्थिर स्वार्थों का प्रहरी’ जागरूक और ‘मानवता का महाशत्रु’ कहा था, ‘संप्रदायवादी दैत्यों के निकट खोह’ दिखाये थे.
नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और मुक्तिबोध ने जिस प्रकार अमेरिका की आलोचना की है, उसे देख-समझ कर हिंदी आलोचना एक नये मार्ग पर बढ़ सकती है. यह बता सकती है कि हमारे कवियों की समझ गृह नीति, अर्थनीति और विदेश नीति में नेताओं की तुलना में कैसी थी.
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