हॉर्न-प्रिय बिहार को कान चाहिए!

Published at :18 Jul 2014 4:51 AM (IST)
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हॉर्न-प्रिय बिहार को कान चाहिए!

।। रवीश कुमार ।। वरिष्ठ पत्रकार बिहार सरकार को चाहिए कि हॉर्न बजाने को मान्यता दे दे. हॉर्न टैक्स लगाये, जिससे राजस्व में वृद्धि हो. इसे प्रोत्साहित करने के लिए बिहार में हॉर्न दिवस मनाना चाहिए. इस दिन बिहार बंद हो और हर व्यक्ति जहां है जैसा है के आधार पर दिन भर हॉर्न बजाये. […]

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।। रवीश कुमार ।।

वरिष्ठ पत्रकार

बिहार सरकार को चाहिए कि हॉर्न बजाने को मान्यता दे दे. हॉर्न टैक्स लगाये, जिससे राजस्व में वृद्धि हो. इसे प्रोत्साहित करने के लिए बिहार में हॉर्न दिवस मनाना चाहिए. इस दिन बिहार बंद हो और हर व्यक्ति जहां है जैसा है के आधार पर दिन भर हॉर्न बजाये.

कोई है, जो बिहार को बिना हॉर्न के रहना सीखा सकता है. कोई है जो बुद्ध के इस विहार में बिना हॉर्न गाड़ियां विचरण करने लगें. वैसे तो इस मामले में पूरे भारत का रिकॉर्ड खराब है, लेकिन बिहार तो लगता है जैसे हॉर्न बजाने को उत्सव में बदल चुका है. यहां की सड़कों पर चलिये, तो लोग इस कदर हॉर्न बजाते मिल जायेंगे, जैसे किसी म्यूजिक क्लास से लौट रहे हों. काश कि मैं किसी ह्वेनसांग की तरह लिख पाता कि जब मैं साल 2014 के जुलाई मास में पटना शहर में भ्रमण कर रहा था, तब देखा कि पटना दुनिया का अकेला शहर है, जहां के लोगों ने हॉर्न बजाने की कला को नागर-कला (अर्बन आर्ट) में बदल दिया है. आश्चर्य है कि अपनी कला का लोहा मनवानेवाले सुबोध गुप्ता की नजर भी बिहार के इस हॉर्न-कला पर नहीं पड़ी है. उम्मीद है कि सौ साल बाद जब कोई विद्वान पटना का अध्ययन कर रहा होगा, तब वह इस शहर को हॉर्न-हेरिटेज सिटी घोषित कराने की मांग करेगा.

जिस मुल्क में मंदिर-मसजिद के ऊपर लाउडस्पीकर लगाने को लेकर दंगे हो जाते हैं, उसी मुल्क के एक राज्य बिहार में हॉर्न बजाने को लेकर भयंकर किस्म की सहनशीलता देखी जाती है. पूरा शहर इस कदर हॉर्न पर टूट पड़ा है जैसे किसी सब्जी मंडी में अचानक प्याज पांच रुपये किलो हो गया हो. कार से लेकर बाइक तक में हॉर्न बजाने की सुविधा न हो, तो ट्रैफिक में फंसे बिहार के लोग अपनी गाड़ी से उतर कर पैदल चलने लग जायें. उन्हें पता है कि अगली कार के पास विकल्प नहीं है, मगर अगली-पिछली दोनों कारों में हॉर्न से ही सखी-संवाद होता है. किसी सड़क पर पीछे से आती कार से हॉर्न की ध्वनि ऐसे निकलती है, जैसे गाड़ीवान कह रहा हो, हट-हट. सामने सड़क खाली भी हो, तो भी अगली कार वाला हॉर्न से ही जवाब देता है, चल-चल.

बिहार की सड़कों पर पायी जानेवाली हॉर्न-सहनशीलता किसी भी तरह प्रदूषण नहीं है. प्रदूषण तो वे फैला रहे हैं, जो हॉर्न के खिलाफ अभियान छेड़े हुए हैं. पटना क्लब की दीवार पर ऐसा ही एक बोर्ड लगा है. यहां के हॉर्न-प्रिय नागरिक उचित ही ध्यान नहीं देते और बोर्ड के सामने से भी हार्न बजाते हुए गुजरते हैं. सोचता हूं कि कैसे इस ध्वनि ऊर्जा का इस्तेमाल राष्ट्र-प्रगति में किया जा सकता है. मैंने यहां हॉर्न की कुछ श्रेणियां बनायी है. लहरिया हॉर्न, बांसुरी हॉर्न, हारमोनिया हॉर्न, बमकल (क्रोधित) हॉर्न, आनंदित हॉर्न, ए सखी सुनो न हॉर्न, केंकीयाइल हॉर्न (कुत्ता भौंक वाला), चल गुड्डू सिनेमा हॉर्न, फुंफकार हॉर्न, विधायक हॉर्न, थानेदार हॉर्न, गुंडा हॉर्न आदि.

इसी में एक कैटगरी है देखावन और सुनावन हॉर्न की. इसका मकसद होता है अपने हॉर्न को सुनाना और साथ ही सड़क पर चलनेवाले सरकार की तरह बेखबर यात्रा ियों का ध्यान खींचना. सदाबहार हॉर्न वह है, जिसके बजने का संबंध सड़क के खाली या जाम होने से नहीं है. हॉर्न ध्वनि को आप पश्चिमी संगीत के लिहाज से भी बांट सकते हैं- रॉक हॉर्न, जैज हॉर्न, ट्रम्पेट हॉर्न, हिप-हौप हॉर्न. पटना के लोग जिस कलात्मक तरीके से प्रेशर हॉर्न का प्रयोग करते हैं, उसे देख कर एआर रहमान भी शरमा जायें.

मैं सही में सुबह उठ कर इस हॉर्न के आरोह-अवरोह को सुनने लगा. हर हॉर्न की अपनी एक देहभाषा होती है. कुछ तो बस आगाह कर विलुप्त हो जाते हैं, मगर कुछ देर तक गूंजते रहते हैं. कुछ हॉर्न बेहद हल्के होते हैं जैसे किसी ने कस के चिकोटी काटी हो, लेकिन अगला मचल कर तुरंत शांत हो गया हो. गलियों में बजनेवाले कुछ हॉर्न फेरी वाले की तरह सुनायी पड़ते हैं. कई बार तो ऐसे बजते हैं, जैसे निश्चित न हो कि कोई ग्राहक जागा भी है. हॉर्न ध्वनि में शीघ्रता से भी आप उसकी भाषा पकड़ सकते हैं. कई बार लगता है कि गाड़ीवान पतंग लूट कर खुशी के मारे भागा जा रहा है, तो कोई इतनी जल्दी में है कि बिना लोटा लिये खेतों की तरफ भागने का रास्ता मांग रहा हो. कुछ की भाषा चिढ़ाने की होती है. कई हॉर्न हड़बड़िया होते हैं, तो कुछ अभ्यास मैच की तरह बजते हैं.

पटना के लोग बिना हॉर्न के नहीं रह सकते. हॉर्न का सामाजिक और मनोवैज्ञानिक विेषण होना चाहिए कि क्यों हर कोई हॉर्न बजा रहा है. अगर कोई कार कंपनी पटना में अपनी बिक्री बढ़ाना चाहती है, तो उसे हर कार में हॉर्न के पांच-दस विकल्प देने चाहिए. सिर्फ गाड़ीवान ही क्यों हॉर्न बजाये. कार की हर सीट पर बैठे लोगों को हॉर्न बजाने का समान अवसर मिलना चाहिए. आखिर हॉर्न न बजाने का यहां विरोध क्यों हो रहा है? इस शहर को हॉर्न बजाने की बीमारी लग गयी है. एक ही तरीका नजर आता है कि बिहार सरकार हॉर्न बजाने को मान्यता दे दे और हॉर्न टैक्स लगाये, जिससे राजस्व में वृद्धि हो. इसे प्रोत्साहित करने के लिए बिहार में हॉर्न दिवस मनाना चाहिए. इस दिन बिहार बंद हो और हर व्यक्ति जहां है जैसा है के आधार पर दिन भर हॉर्न बजाये. बिहार को अपना राजकीय चिह्न् भी हॉर्न कर देना चाहिए.. हद है!

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