सावन के पहले सोमवार की सुबह

Published at :15 Jul 2014 3:54 AM (IST)
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सावन के पहले सोमवार की सुबह

।। सत्य प्रकाश चौधरी ।। प्रभात खबर, रांची रुसवा साहब पान की तलब में भकुआये से चले आ रहे हैं. उनकी आंखें बता रही हैं कि जनाब ने फीफा कप रात में फीकी चाय सुड़क-सुड़क कर देखा है. उनके कुरते पर बारिश के कुछ छींटे नजर आ रहे हैं. ऐसी बारिश के, जिसे शिवपालगंज-वाले चिरैयामूतन […]

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।। सत्य प्रकाश चौधरी ।।

प्रभात खबर, रांची

रुसवा साहब पान की तलब में भकुआये से चले आ रहे हैं. उनकी आंखें बता रही हैं कि जनाब ने फीफा कप रात में फीकी चाय सुड़क-सुड़क कर देखा है. उनके कुरते पर बारिश के कुछ छींटे नजर आ रहे हैं. ऐसी बारिश के, जिसे शिवपालगंज-वाले चिरैयामूतन बरसात कहते हैं. सावन का पहला सोमवार है, इसलिए हर तरफ माहौल बम-बम नजर आ रहा है. पप्पू पनवाड़ी केसरिया गंजी और घुटन्ना पहन कर दुकान पर बैठे हैं.

भर सावन उनकी यही पोशाक रहेगी, क्योंकि इस दौरान वह पप्पू पनवाड़ी से प्रमोट होकर ‘पप्पू बम’ बन जाते हैं. उन्हें हर ग्राहक ‘बम’ दिखता है. और तो और, दुकान के सामने दोपहर में लेटे रहनेवाले काले कुत्ते को भी वह ‘भैरव बम’ कह कर पुकारते हैं. पप्पू ने हर साल की तरह इस बार भी सावन में दो साउंड बाक्स लगा रखे हैं. पिछले साल उन्होंने जिस गाने को जम कर बजाया था, वह था- ये गणोश के डैडी, भंगिया हमसे न पिसाई. लेकिन, पार्वती जी इस बार जता रही हैं कि सिल-बट्टा की जगह मिक्सर मिल जाने पर उन्हें भांग पीसने से गुरेज नहीं है (लगता है, नरेंद्र मोदी की तरह वह भी तकनीक के इस्तेमाल से बदलाव लाना चाह रही हैं).

इसी भाव को प्रगट करता गीत लियादी न ये भोला मिक्सर मशीन.. पप्पू इस बार पीकर-फाड़ (इसे कुछ पी कर फाड़ना न समङों, बल्कि उनका तात्पर्य स्पीकर-फाड़ से है) आवाज में बजा रहे हैं. पप्पू पहले यह सब इंतजाम अपने पैसे से करते थे, लेकिन पिछले दिनों जब वह ‘आपी’ बने और अपनी दुकान का नामकरण ‘आप’ की दुकान किया, तब से वह हर काम जन-सहयोग से करने में यकीन रखने लगे हैं. सो, इस बार उन्होंने चौराहे के दुकानदारों से चंदा करके साउंड बाक्स लगवाया है.

गाने की बुलंद आवाज से मुकाबला न करने की समझदारी दिखाते हुए रुसवा साहब ने इशारे से बताया कि कितने पान लगाने हैं. रुसवा साहब ने एक पान कल्ले में सरकाया और बाकी को कुरते की जेब में. तभी हमारा आमना-सामना हुआ. मैंने उन्हें सलाम पेश किया, तो उन्हें मजबूरन पीक से भरा मुंह खाली करना पड़ा. खैर, उन्होंने संक्षिप्त सा जवाबी सलाम करके सवाल दागा, ‘‘तुम अखबारनवीस हो या घास खोदते हो?’’ मैंने थोड़ा बुरा मानते हुए पूछा, ‘‘क्या मतलब?’’ उन्होंने मेरे बुरा मानने की परवाह न करते हुए फरमाया, ‘‘अखबारनवीस क्या होता है, यह वैदिक जी सीखो.

सड़क से लेकर संसद तक में उनके नाम की चर्चा है.. और तुम अभी तक वही मजूदर, किसान, सूखा, मनरेगा, आरटीआइ, बीपीएल वगैरह की खबरों के चक्कर में पड़े रहते हो. फीकी और बेमजा.’’ मैंने जवाब दिया, ‘‘आपकी बात तो सही है, पर सोचिए कि अगर वैदिक जी की जगह आप हाफिज सईद से मिल आते, तो क्या होता? शिवसेना, हिंदू सेना और न जाने कौन-कौन सेनावाले आपका घर घेर लेते.’’ रुसवा साहब लाजवाब हो गये.

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