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लोकतंत्र का महापर्व

Updated at : 20 May 2019 2:56 AM (IST)
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लोकतंत्र का महापर्व

अंतिम चरण के मतदान के साथ ही दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सबसे अहम हिस्सा पूरा हुआ है और अब नतीजों का इंतजार है. हमारा देश उन गिने-चुने देशों में है, जहां औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के बाद से सार्वभौम मताधिकार के सिद्धांत पर आधारित गणतांत्रिक व्यवस्था चली आ रही है. भारत में […]

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अंतिम चरण के मतदान के साथ ही दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सबसे अहम हिस्सा पूरा हुआ है और अब नतीजों का इंतजार है. हमारा देश उन गिने-चुने देशों में है, जहां औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के बाद से सार्वभौम मताधिकार के सिद्धांत पर आधारित गणतांत्रिक व्यवस्था चली आ रही है.

भारत में पंजीकृत मतदाताओं की मौजूदा संख्या लगभग 90 करोड़ है, जिनमें से अधिकतर ने मतदान प्रक्रिया में भाग लिया है. छिटपुट हिंसा और गड़बड़ियों को छोड़ दें, तो सात चरणों की यह प्रक्रिया शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुई है.
निश्चित रूप से चुनाव आयोग, सुरक्षाबलों, राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों और मतदाताओं के लिए यह संतोष का विषय है. एक ओर जहां इस चुनाव की सफलता गौरव का विषय है, वहीं इसके अनुभवों से सीख लेते हुए हमें इसे उत्तरोत्तर कारगर और मजबूत बनाने की कवायद पर भी ध्यान देना चाहिए. प्रचार अभियान और मतदान में महिलाओं और युवाओं की बढ़ती भागीदारी एक स्वागतयोग्य पहलू है, परंतु उम्मीदवारी में इनकी हिस्सेदारी बढ़ाने के बारे में विभिन्न दलों को विचार करना चाहिए.
आबादी के लिहाज से इन दोनों की तादाद बहुत बड़ी है. हमारी राजनीति धनबल और बाहुबल के ग्रहण से लंबे समय से ग्रस्त रही है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि इसमें कमी भी आ रही है, किंतु प्रचार के दौरान बेतहाशा खर्च और मतदाताओं को लुभाने के लिए पैसा, सामान व शराब बांटने की शिकायतें चिंताजनक है.
गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे उम्मीदवारों का चुनावी मैदान में होना भी एक बड़ा सवाल है. पार्टियों और प्रत्याशियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तथा परस्पर टीका-टिप्पणी चुनाव का जरूरी आयाम है. इससे उम्मीदवारों के बारे में समझ बनाने में मतदाताओं को बड़ी मदद मिलती है. प्रचार के दौरान ऐसे कई मौके आये, जब बहस में नेताओं ने भाषायी और व्यावहारिक मर्यादा को लांघते हुए बयानबाजी की.
देश को नेतृत्व देनेवाले व्यक्तियों और पार्टियों को ऐसे बर्ताव से बाज आना चाहिए. पारदर्शिता और प्रशासनिक निष्पक्षता के बिना चुनाव जैसी लोकतांत्रिक कार्यवाही को समुचित ढंग से पूरा नहीं किया जा सकता है. निर्वाचन आयोग, अधिकारियों तथा राजनीतिक दलों को आपसी समझ-बूझ से ऐसे नियम और निर्देश तय करने चाहिए, जहां पक्षपात का प्रश्न ही पैदा न हो सके.
ध्यान रहे, हमारे देश की बहुत बड़ी आबादी गरीब और निम्न आय वर्ग से है. मतदान में इसकी भागीदारी भी बढ़ चढ़कर होती है. ऐसे में मतदाता सूची में इस तबके के लोगों के नाम शामिल करने से लेकर उन्हें मर्जी से मतदान करने तक की सुविधा मुहैया कराना बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए.
इस वर्ष गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा था कि लोकतंत्र में आम चुनाव एक पवित्र कर्मकांड के समान है. हर मत दूसरे मतदाता को प्रोत्साहित करता है और हर मत लोकतंत्र को शक्तिशाली बनाता है. महामहिम के इस विचार को आदर्श मानते हुए हमें चुनावी प्रक्रिया को लगातार बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए.
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