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नयी सरकार की आर्थिक चुनौतियां

Updated at : 15 May 2019 6:54 AM (IST)
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नयी सरकार की आर्थिक चुनौतियां

अजीत रानाडे सीनियर फेलो, तक्षशिला इंस्टीट्यूशन editor@thebillionpress.org केंद्रीय वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामले विभाग द्वारा जारी नवीनतम मासिक आर्थिक रिपोर्ट में कुछ चिंताजनक प्रवृत्तियां नजर आती हैं. पिछले पांच वर्षों के दौरान आर्थिक वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत से घटकर क्रमशः 7.2 एवं 7.0 प्रतिशत तक आ चुकी है. नवीनतम त्रैमासिक वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत है. […]

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अजीत रानाडे
सीनियर फेलो, तक्षशिला इंस्टीट्यूशन
editor@thebillionpress.org
केंद्रीय वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामले विभाग द्वारा जारी नवीनतम मासिक आर्थिक रिपोर्ट में कुछ चिंताजनक प्रवृत्तियां नजर आती हैं. पिछले पांच वर्षों के दौरान आर्थिक वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत से घटकर क्रमशः 7.2 एवं 7.0 प्रतिशत तक आ चुकी है. नवीनतम त्रैमासिक वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत है. इस तरह, यह घटती वृद्धि दर लगातार चौथे वर्ष भी जारी है. अब हम सबसे तेज गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था का खिताब भी बरकरार नहीं रख सकेंगे, क्योंकि चीन की आर्थिक वृद्धि दर हमसे थोड़ी ज्यादा हो सकती है.
इन्हीं तीन वर्षों के दौरान कृषि में सकल मूल्य वर्धित (ग्रॉस वैल्यू ऐडेड-जीवीए) भी 6.3 प्रतिशत से घटकर क्रमशः 5.0 प्रतिशत से होते हुए 2.7 प्रतिशत तक पहुंच चुका है और यह चिंता की दूसरी वजह है.
क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार, 2018-19 के दौरान खाद्य मूल्यस्फीति वर्ष 1991 के पश्चात निम्नतम स्तर पर थी. पिछले वर्ष के एक बड़े हिस्से में फल, सब्जियों, दालों तथा चीनी में नकारात्मक मूल्यस्फीति यानी मूल्य अपस्फीति की स्थिति रही. पिछले कई वर्षों से ग्रामीण मजदूरी वृद्धि पांच प्रतिशत से कम रही है. इसने ग्रामीण मांग पर असर डालते हुए उन व्यवसायों का प्रदर्शन भी धीमा कर दिया है, जो स्वस्थ ग्रामीण मांग पर निर्भर होते हैं. इनमें तेजी से बिकनेवाली उपभोक्ता वस्तुएं (एफएमसीजी) जैसे, साबुन, टूथपेस्ट, बालों का तेल, बिस्कुट इत्यादि के अलावा दोपहिया वाहन भी शामिल हैं.
नतीजतन, इन्हें बनानेवाली कंपनियों की आय वृद्धि दर पिछले दो वर्षों में सबसे नीचे आ चुकी है और दोपहिया वाहनों की बिक्री की मासिक वृद्धि में पिछले एक वर्ष से भी अधिक अवधि से गिरावट का रुख जारी है, जो नकारात्मक क्षेत्र में प्रवेश कर चुका है.
उक्त रिपोर्ट के मुताबिक, चिंता की तीसरी वजह पिछले तीन वर्षों के दौरान चालू खाते के घाटे में जारी लगातार वृद्धि है, जो 0.6 से क्रमशः 1.9 होते हुए जीडीपी के 2.6 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है. इस स्थिति का अर्थ यह है कि निर्यातों से हमारी आय हमारे बढ़ते आयातों के खर्चे पूरे करने में असमर्थ है.
वर्ष 2014 से लेकर मार्च 2019 तक के पांच वर्षों के दौरान निर्यातों में शुद्ध वृद्धि शून्य रही है. निर्यात सीधी तरह घरेलू विनिर्माण संबंधी गतिविधियों से संबद्ध होते हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले चार महीनों से लगातार गिरता औद्योगिक उत्पादन सूचकांक इस मार्च में नकारात्मक हो चुका है. पूंजीगत वस्तुओं (कैपिटल गुड्स)के उत्पादन में तीव्र नकारात्मक वृद्धि तो खास चिंता की वजह बन चुकी है, क्योंकि मार्च महीने का सूचकांक नकारात्मक 8.7 के स्तर पर आ चुका है.
सरकारी आंकड़ों के ही अनुसार, यह तथ्य कि पिछले तीन महीनों में भारतीय मुद्रा वास्तविक प्रभावी विनिमय दर के अर्थ में ज्यादा मजबूत हुई है, पिछले तीन वर्षों के दौरान चालू खाते के बढ़ते रुझान की चुनौतियों को और विषम कर रहा है. यहां यह याद रखना भी प्रासंगिक होगा कि कच्चे तेल के बाद आयातों की अगली सबसे बड़ी वस्तु मोबाइल फोन समेत इलेक्ट्रॉनिक्स माल हैं.
चिंता का चौथा सबसे बड़ा कारण जीडीपी के अनुपात के रूप में पूंजीगत निवेश में आयी जड़ता है. अतीत में यह अनुपात 35 प्रतिशत तक पहुंच चुका है, मगर वर्तमान में 28 प्रतिशत पर ठहरा है. निजी निवेश व्ययों में वृद्धि भी लगभग शून्य हो चुकी है.
इसका अर्थ यह है कि नयी क्षमताओं का सृजन नहीं हो रहा है और न ही नये व्यावसायिक उपक्रम आरंभ किये जा रहे हैं. गिरते निवेश अनुपात के परिणामस्वरूप भारत का संभाव्य (पोटेंशियल) जीडीपी संभवतः 8 प्रतिशत से गिरकर 7 प्रतिशत प्रतिवर्ष पर उतर आया है, जिसका मतलब यह है कि इसके बाद अब कोई भी आघात अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक होगा. इसका एक यह लक्षण सामने है कि उपभोक्ता मूल्य आधारित एवं थोक मूल्य आधारित दोनों किस्म की मुद्रास्फीतियां वृद्धि के रुझान पर हैं. मंत्रालय की रिपोर्ट यह भी बताती है कि जीडीपी डिफ्लेटर (वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य स्तर का एक पैमाना) भी ऊपर चढ़ता जा रहा है.
साफ है कि अगली केंद्रीय सरकार के लिए अर्थव्यवस्था उच्च प्राथमिकता होनी चाहिए. प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के एक सदस्य रथिन रॉय ने चेताया भी है कि भारत मध्य-आय फंदे में पड़ने का जोखिम झेल रहा है.
उनके अनुसार, पिछले दो दशकों के दीर्घावधि रुझान बताते हैं कि दक्षिण कोरिया एवं जापान के विपरीत भारत एक निर्यात संचालित अर्थव्यवस्था नहीं बन सका है. यह घरेलू उपभोग वृद्धि पर निर्भर रहा है, मगर यह वृद्धि मुख्यतः सर्वोच्च 10 करोड़ उपभोक्ताओं द्वारा मांगी जा रही वस्तुओं एवं सेवाओं की ही पूर्ति करती रही है. इनमें कारें, दोपहिया वाहन, हवाई यात्राएं जैसी चीजें शामिल हैं. पर अब वह मांग भी घट रही है. ऑटो क्षेत्र के नेतृत्वकर्ता मारुति सुजुकी ने अप्रैल महीने में अपनी मांग में 17 प्रतिशत की गिरावट देखी, जो सात वर्षों में सर्वाधिक है.
यहां तक कि मार्च माह में घरेलू हवाई यात्राओं में भी वृद्धि दर शून्य रही, जिसकी एक वजह तो जेट एयरवेज की बंदी भी थी. पर यह स्थिति पिछले चार वर्षों में दहाई अंकों की वृद्धि (विश्व में सर्वाधिक) के बाद उत्पन्न हुई है. डॉ रॉय कहते हैं कि अर्थव्यवस्था को तीव्र करने का भार या तो उपभोग वृद्धि का फलक विस्तृत कर अथवा निर्यातों को बढ़ा कर वहन करना होगा.
वृद्धि के लिए अर्थव्यवस्था को चार कारक चाहिए- उपभोग, निर्यात, निवेश तथा इसे चालू रखने हेतु सरकार. सरकार का योगदान राजकोषीय सीमाओं में आबद्ध होता है. भारत की राजकोषीय स्थिति पांच वर्ष पूर्व से बेहतर है, पर यह संतोष की वजह नहीं है.
सार्वभौमिक आय, स्वास्थ्य बीमा, ऋण माफी के अलावा सार्वजनिक क्षेत्र बैंकों के पुनर्पूंजीकरण जैसी जिम्मेदारियों के रहते सरकार से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अनिश्चित काल तक निवेश द्वारा आर्थिक गतिविधियों में जान फूंकती रहेगी. इसमें शक नहीं कि सड़कों, रेलों तथा जलमार्गों पर बड़े व्यय से दीर्घावधि में और भी कई फायदे होते हैं, पर यदि हम 8-जोड़ प्रतिशत की समावेशी वृद्धि पर केंद्रित हैं, तो ऐसे निवेश की एक सीमा है.
नयी सरकार द्वारा सबसे पहले भारी सरकारी रिक्तियों के विरुद्ध बड़े पैमाने की नियुक्तियां एवं ग्रामीण संकट को संबोधित करने जैसे काम होने चाहिए. इन अल्पावधि प्राथमिकताओं के साथ ही हमें अर्थव्यवस्था के उपर्युक्त चार नहीं, तो कम से कम उपभोग एवं निवेश के दो कारकों में जान डालने की जरूरत है.
(अनुवाद: विजय नंदन)
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