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छोटे कर्जदारों को राहत

Updated at : 14 May 2019 6:29 AM (IST)
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छोटे कर्जदारों को राहत

दिवाला कानून आर्थिक सुधारों की दिशा में एक अहम कदम है, लेकिन इसके तहत बड़ी कर्जदार कंपनियों के लिए ही प्रावधान है. कंपनी मामलों का मंत्रालय इसमें बदलाव कर छोटे कर्जदारों को राहत देने की योजना पर काम कर रहा है. इस योजना का फायदा 60 हजार रुपये से कम की सालाना आमदनीवाले, 35 हजार […]

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दिवाला कानून आर्थिक सुधारों की दिशा में एक अहम कदम है, लेकिन इसके तहत बड़ी कर्जदार कंपनियों के लिए ही प्रावधान है. कंपनी मामलों का मंत्रालय इसमें बदलाव कर छोटे कर्जदारों को राहत देने की योजना पर काम कर रहा है.
इस योजना का फायदा 60 हजार रुपये से कम की सालाना आमदनीवाले, 35 हजार रुपये या उससे कम के बकाया कर्जवाले तथा 20 हजार या उससे कम की संपत्ति का मालिकाना रखनेवाले लोग उठा सकेंगे. इसकी लागत 20 हजार करोड़ रुपये तक हो सकती है, किंतु इसके लाभुकों की तादाद करोड़ों में होगी. मंत्रालय के सचिव इंजेती श्रीनिवास ने इस योजना की जानकारी देते हुए एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही है. कुछ हजार का कर्ज लेनेवाले और उसे चुकाने में परेशानी का सामना करनेवाले किसान, कारोबारी और कारीगर सही मायनों में गरीब लोग हैं, परंतु दिवाला कानून के नियम उनके लिए भी वही हैं, जो करोड़ों-अरबों की कर्जदार कंपनियों के लिए हैं.
एक तो किसी गरीब के पास उन नियमों के हिसाब से मुकदमा लड़ने का दम नहीं है और दूसरे यह कि इन छोटे कर्जदारों पर अगर मुकदमा होता है, तो उनकी संख्या करोड़ों में होगी. इनका निपटारा कर पाना न्यायिक प्रणाली के लिए बेहद मुश्किल होगा. ग्रामीण और कस्बाई अर्थव्यवस्था को गति देने में अन्य योजनाओं के साथ यह पहल भी काफी मददगार साबित हो सकती है.
कुछ हजार रुपये की इस राहत से उन कर्जदारों को नये सिरे से उठ खड़ा होने का हौसला मिलेगा. हमारे देश में ऐसे लोगों का भी एक समूह है, जो बड़ी कंपनियों को हजारों करोड़ की कर्जमाफी को तो अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के लिए जरूरी मानता है, परंतु जब किसानों और छोटे कारोबारियों को राहत देने की बात होती है, तो उसे परेशानी होने लगती है.
ऐसे लोगों को श्रीनिवास की इस बात पर गौर करना चाहिए, जिसमें उन्होंने कहा है कि दिवाला कानून के तहत एक स्टील कंपनी से 34 हजार करोड़ तो मिले, पर उस मामले में 20 हजार करोड़ की रियायत भी देनी पड़ी थी. जब एक कंपनी को 20 हजार करोड़ रुपये की राहत दी जा सकती है, तो करोड़ों लोगों के फायदे के लिए इतने रुपये क्यों नहीं खर्च किये जा सकते हैं? बीते सालों में सरकार ने विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों- जन-धन, सम्मान राशि, बीमा योजना आदि- के माध्यम से देश की बड़ी आबादी को आर्थिक और वित्तीय गतिविधियों में समावेशित करने का उल्लेखनीय प्रयास किया है.
यह आबादी गरीब और निम्न आय वर्ग की है. उसे अनुदान, भत्ता, आसान शर्तों पर कर्ज, खाते में भुगतान आदि देना असल में एक निवेश है, जिसका परिणाम भविष्य में साकार होगा. हमारी अर्थव्यवस्था की बढ़ोतरी में छोटे कारोबारियों, किसानों और कारीगरों का बहुत योगदान है.
राष्ट्रीय आर्थिक नीति में उनका संज्ञान लिया जाना जरूरी है. इस योजना के प्रारूप को अंतिम रूप दिया जा रहा है. उम्मीद है कि नयी सरकार के कार्यभार संभालने के साथ ही इसे अमल में लाने की कवायद शुरू हो जायेगी.
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