बीमार है हमारा बॉलीवुड

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 26 Apr 2019 7:08 AM

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तरुण विजय वरिष्ठ नेता, भाजपा tarunvijay55555@gmail.com एक फिल्म है- ‘मेंटल है क्या’. यह फिल्म भारत के धनी, अहंकारी और संवेदनहीन समाज का दर्पण है, जिसे भारत या भारतीयों से कोई लेना-देना नहीं. सिर्फ बॉक्स ऑफिस उनका गणतंत्र, टिकट बिक्री ही उनका मजहब और ऐश व विलास ही उनका निर्वाण है. मानसिक चुनौतियां समाज की सबसे […]

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तरुण विजय
वरिष्ठ नेता, भाजपा
tarunvijay55555@gmail.com
एक फिल्म है- ‘मेंटल है क्या’. यह फिल्म भारत के धनी, अहंकारी और संवेदनहीन समाज का दर्पण है, जिसे भारत या भारतीयों से कोई लेना-देना नहीं. सिर्फ बॉक्स ऑफिस उनका गणतंत्र, टिकट बिक्री ही उनका मजहब और ऐश व विलास ही उनका निर्वाण है.
मानसिक चुनौतियां समाज की सबसे बड़ी समस्या है. तनाव भारत में 90 प्रतिशत आत्महत्याओं का कारण है. कंगना रणौत और सेंसर बोर्ड यदि इस ‘शब्द-हिंसक’ फिल्म को पास करता है, तो प्रसून जोशी को देश के किसी एक मानसिक चिकित्सालय में दिन भर बिठाकर वहां का दृश्य दिखाना चाहिए. मानसिक चुनौती एक यथार्थ है. मां-बाप अपने मानसिक-समस्याग्रस्त बेटे-बेटियों के साथ इन चिकित्सालयों में आते हैं. समाज में मानसिक व्याधि एक कलंक, एक शाप माना जाता है. जिसके बच्चे ऐसी समस्या से ग्रस्त हैं, वे क्या करें?
‘मेंटल है क्या’ फिल्म इन एक करोड़ से ज्यादा विशेष-सक्षम लोगों को गाली देने समान है. भारत में हम अपनी हजारों साल पुरानी सभ्यता, संस्कृति, करुणा, स्नेह के मूल्यों का बखान करते नहीं अघाते. पर सच्चाई में हम बहुत निर्मम, संवेदनहीन लोग हैं, जब समाज के कम भाग्यशाली लोगों की सहायता का प्रश्न आता है.
जिस पश्चिम को हम भोगवादी कहकर धिक्कारने में गर्व महसूस करते हैं, वह स्वयंसेवी सेवाओं, विशेष सक्षम बच्चों व प्रौढ़ नागरिकों की देखभाल में, तथा उनके प्रति संवदेना दिखाने में हमसे कई प्रकाश वर्ष आगे हैं.
संसद, राजनीतिक विषयों पर चलती या रुकती है. क्या किसी की स्मृति में है कि संसद ने कभी भारत वर्ष के बच्चों, उनकी स्थिति, उनके पोषण, पठन-पाठन अथवा विशेष-सक्षम बच्चों पर कभी पंद्रह मिनट की भी चर्चा की हो?
किसी भी राजनीतिक चुनावी घोषणापत्र में बच्चों, विशेष-सक्षम बच्चों और नागरिकों पर एक पंक्ति भीनहीं होती, क्योंकि ये न तो राजनीतिक गुट हैं, न ही संगठित आवाज. इसलिए राजनेता देश के इन बेहद प्यारे, सुंदर और कमाल के बच्चों पर ध्यान देना ‘वेस्ट ऑफ टाइम’ मानते हैं. हां, फोटो के लिए, अखबार के लिए, सोशल मीडिया के लिए इन विशेष-सक्षम बच्चों तथा प्रौढ़ नागरिकों का ‘इस्तेमाल’ करना इन्हें बुरा नहीं लगता.
भारत में एक करोड़ से ज्यादा मानसिक व अन्य ‘विशेष-सक्षम’ बच्चे हैं. यहां विश्व में सबसे कम मानसिक चुनौती ग्रस्त लोगों के लिए सुविधाएं हैं. यहां विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, प्रति एक लाख की जनसंख्या पर 2,443 वर्ष यानी व्याधि के कारण नष्ट वर्ष का आंकड़ा है.
मानसिक चुनौतीग्रस्त वातावरण के कारण साल 2010 के मूल्य पर एक खरब डॉलर की भारत को क्षति (साल 2010 से 2030 तक) का आकलन किया गया है. सबसे कम मानसिक स्वास्थ्य सेवा और कार्यकर्ता वाले देशों में भारत भी है. मानसिक विशेषज्ञ और सलाहकार प्रति एक लाख व्यक्तियों पर 0.3 हैं, नर्सें 0.12 हैं, मानसिक विज्ञानी 0.07 हैं और स्वयंसेवी कार्यकर्ता मात्र 0.07 हैं. जी हां, ये आंकड़े प्रति एक लाख जनसंख्या के हैं.
मानसिक समस्या से ग्रस्त लोग पागल नहीं होते. पागल एक गाली है. सबसे खराब गालियों में वे हैं, जो मां-बहन से संबंधित हैं या फिर जिनको मानसिक स्थिति से जोड़ा जाता है. तुम पागल हो, तुम्हें आगरा भेज देंगे. क्योंकि वहां मानसिक स्वास्थ्य चिकित्सा केंद्र है, इसे सबसे घातक गालियों में माना जाता है.
मैंने स्वयं देखा है कि सामाजिक कलंक से डरकर माता-पिता अपने मानसिक चुनौतीग्रस्त बच्चों को देहरादून के चिकित्सालय/ आश्रयस्थल में छोड़ जाते हैं और फिर कभी आते भी नहीं हैं. कंगना और प्रसून जोशी इस फिल्म के शीर्षक से मानसिक व्याधि से ग्रस्त लोगों को और भी गहरे अवसाद के अंधेरे में धकेलनेवाले हैं. बहुत धन, बहुत प्रतिष्ठा, सत्ता से करीबी ऐसा ही राक्षसी संवेदनहीन अहंकार पैदा करती है.
दुनिया में मानसिक तनाव और उसके कारण होनेवाली विक्षिप्तावस्था एक लक्षण है. जन्म से ही किन्हीं कारणों से मानसिक विकार होना भारत में एक बड़ी समस्या है. लिव, लव, लाफ फाउंडेशन (दीपिका पादुकोण) के एक अध्ययन के अनुसार, भारत में 71 प्रतिशत लोग मानसिक चुनौतीग्रस्त लोगों के प्रति एक कलंक और हीनता का भाव रखते हैं.
केवल 27 प्रतिशत उनके प्रति कुछ समझदारी और सम्मान दिखाते हैं. ऐसे लोगों को जंजीर में बांधकर रखना, उन्हें अंधेरे कमरे में चीखने-चिल्लाने को छोड़ देना, भूत-पिशाच का प्रकोप मानकर काला जादू करनेवाले ढोंगियों के पास ले जाकर झाड़-फूंक करवाना, उन्हें पीटना आदि ग्रामीण क्षेत्रों में आम बात है.
सेंसर बोर्ड या कंगना का इन सबसे कोई संबंध नहीं, क्योंकि ये बेजुबान उनकी चिंताओं के दायरे में नहीं आते. मानसिक चुनौती ग्रस्त 71 प्रतिशत बच्चे भारत के केवल ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं. शहरी क्षेत्रों में डॉक्टरों की संख्या प्राय: नगण्य रहती है. मानसिक रोग विशेषज्ञ आम तौर पर अन्य चिकित्सकों से ज्यादा फीस लेते हैं और जो निजी स्वयंसेवी संगठन इस क्षेत्र में सक्रिय हैं, वे चमड़ी उधेड़ पैसा लेते हैं.
यदि सामान्य ग्रामीण के घर एक सदस्य भी ऐसा समस्याग्रस्त हुआ, तो वह सामाजिक अभिशाप तथा आर्थिक कठिनाई दोनों चक्कों में पिसता है. बीमार राजनीति एक बीमार सेंसर को संभालती है, जो बीमार बॉलीवुड को संरक्षण देता है.
बहुत कम अभिनेता-निर्देशक सामाजिक विषयों में संवेदना दिखाते हैं. खैर, संवेदनहीन राजनेताओं के देश में बॉलीवुड से उम्मीद कम ही है. फिल्म ‘मेंटल है क्या’, इस शीर्षक पर चर्चा के बहाने देश में बढ़ रही मानसिक चुनौतियों पर समाज का ध्यान आकृष्ट करना चाहिए. मानसिक चुनौतियां डिस्लेक्सिया, ऑटिज्म, लर्निंग डिसएबिलिटीज के रूप में भी देखी जाती हैं.
ऐसे बच्चों की संख्या करीब एक करोड़ है. बिल क्लिंटन और बिल गेट्स भी डिसलेक्सिया से गुजरे हैं. वे बच्चे अच्छे हो जाते हैं, जिनको तनिक सही प्रोत्साहन मिल जाता है. उन्हें मिली-जुली कक्षाओं में पढ़ाया जाना चाहिए. पर अमूमन स्कूल ऐसे बच्चों को या तो प्रवेश ही नहीं देते, या उन्हें सबसे अलग बिठा देते हैं. ऐसे स्कूल निर्मम और कानून विरोधी हैं. देश जगे, कुछ हृदय दिखाये. सिर्फ चुनावी नारेबाजी जीवन नहीं है साहब!
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