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नैतिकता के इंजेक्शन

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नैतिकता के इंजेक्शन

संतोष उत्सुक वरिष्ठ व्यंग्यकार [email protected] आचार संहिता के मौसम में वायदों और इरादों की बारिश के कारण वोटर मुग्ध हैं. आंखों के सामने ऐसे पारदर्शी प्रयोग हो रहे हैं जिनसे साफ पता नहीं चलता कि जिन वस्तुओं और सुविधाओं की जिंदगी को ज्यादा जरूरत है, उनकी चिंता बहुत बढ़िया तरीके से की जा रही है. […]

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संतोष उत्सुक

वरिष्ठ व्यंग्यकार

[email protected]

आचार संहिता के मौसम में वायदों और इरादों की बारिश के कारण वोटर मुग्ध हैं. आंखों के सामने ऐसे पारदर्शी प्रयोग हो रहे हैं जिनसे साफ पता नहीं चलता कि जिन वस्तुओं और सुविधाओं की जिंदगी को ज्यादा जरूरत है, उनकी चिंता बहुत बढ़िया तरीके से की जा रही है.

लेकिन, जिन वस्तुओं की इस जमाने में कतई जरूरत नहीं है, निकट भविष्य में उनके इंजेक्शन बनाये और लगाये जाने की भी खूब तैयारी चल रही है.

अभी तक तो सुनने में आ रहा है कि आगामी जून-जुलाई की रसभरी गर्मियों से शुरू होनेवाले अकादमिक वर्ष में देश के एक प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान की यह योजना है कि नकल करने के मामले को तूल न दिया जाये तथा शिक्षक व परीक्षक सत्यनिष्ठा, नैतिकता व ईमानदारी की नियमावली के तहत विद्यार्थियों के प्रति सकारात्मक रवैया अपनायें.

दिक्कत यह है कि इन तीन भारी-भरकम शब्दों को बोलते, लिखते या टाइप करते हुए हिज्जे-मात्रा की गलती, आजकल अक्सर बहुतों से होने लगी है. गहरे असमंजस में हूं कि इतने विकसित हो चुके माहौल में आखिर यह सब कैसे होगा.

फिलहाल तो विकासजी के सुदृढ़ प्रशासन में इधर सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है, सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक सामंजस्य उच्च श्रेणी का है. देश के कर्णधार देश सेवा में दिन-रात एक किये हुए हैं और आचार संहिता का अनुशासनात्मक पालन करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं.

देश की ‘तेज तरक्की योजना’ के अंतर्गत, देश का भूत व वर्तमान संवार कर भविष्य में सीमेंट लगा देनेवालों ने पिछले दिनों आयोजित दो दिन की नैतिक वर्कशाप में ही कितनी दक्षता से सीख लिया है कि सहानुभूति, सच्चाई, क्षमा और ईमानदारी जैसी पुरानी गुणात्मक वस्तुएं कैसे पकायी जा सकती हैं और लोगों को नियमित खिलायी जा सकती हैं. बहुत डर गया हूं कहीं देश के चमचमाते बाजार से असत्यनिष्ठा, निष्ठुरता, अनैतिक वफा, महानिष्ठुर देशभक्ति, अनैतिक सामाजिकता जैसा बिकाऊ सामान गायब न हो जाये.

अगर यह मान लिया जाये कि सच्चे स्नेह और असली मुस्कुराहट के साथ गढ़े चरित्र नयी फाॅर्मेट में होंगे, तो फिर जो पहले से गुरु और महागुरु हैं उनका क्या होगा.

उपाय स्वरूप उनके स्थापित आचार व व्यवहार को, प्राचीन भारतीय संस्कृति में परिवर्तित करने के लिए प्रयोगशालाएं लगायी जा सकती हैं, जिनमें शुद्ध नैतिकता आदि के असली इंजेक्शन बनाये जा सकते हैं. इन्हें बनानेवाले ‘नैतिक’ व्यक्ति हम इतिहास से निकाल कर ला सकते हैं.

यदि ऐसा हो गया तो फिर इंजेक्शन चुनावी पेटियों की तरह अतिसुरक्षा में रखने होंगे और अगर ऐसा भी हो पाया, तो ऐसे कर्मठ लोग ढूंढने होंगे, जो इन इंजेक्शंस को मानवीय शरीरों में बिना किसी प्रकार के भेदभाव के लगा सकें, क्योंकि कुछ शरीर कभी भी सत्य, निष्ठा, नैतिकता, सहानुभूति, सच्चाई, क्षमा और ईमानदारी को अपनाकर अपनी फायदा उगल रही दुकानें बंद नहीं करना चाहेंगे.

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