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मजबूत होती साझेदारी

Updated at : 22 Apr 2019 7:11 AM (IST)
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मजबूत होती साझेदारी

अमेरिका और जापान के रक्षा एवं विदेश विभाग के शीर्ष मंत्रियों ने द्विपक्षीय बातचीत में भारत के साथ बेहतर होते संबंधों पर संतोष जताया है. वाणिज्यिक तथा सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ये तीन देश ऑस्ट्रेलिया के साथ व्यापक साझेदारी बनाने की दिशा में अग्रसर हैं. भारत, जापान और अमेरिका की पहली […]

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अमेरिका और जापान के रक्षा एवं विदेश विभाग के शीर्ष मंत्रियों ने द्विपक्षीय बातचीत में भारत के साथ बेहतर होते संबंधों पर संतोष जताया है. वाणिज्यिक तथा सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ये तीन देश ऑस्ट्रेलिया के साथ व्यापक साझेदारी बनाने की दिशा में अग्रसर हैं.

भारत, जापान और अमेरिका की पहली त्रिपक्षीय बैठक नवंबर, 2018 में हुई थी तथा दो संयुक्त सैन्याभ्यास भी हो चुके हैं. जी-20 शिखर सम्मेलन के आयोजन में हुए उस त्रिपक्षीय बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस साझेदारी के महत्व को रेखांकित करते हुए तीनों देशों के नाम के अक्षरों को मिला कर ‘जय’ की संज्ञा दी थी. उल्लेखनीय है कि कभी एशिया-प्रशांत के नाम से इंगित किये जानेवाले क्षेत्र को अब हिंद-प्रशांत क्षेत्र कहा जाता है.

यह भारत की बढ़ती भूमिका का सूचक है. सबसे पहले अमेरिका ने इस नाम का प्रयोग किया था, लेकिन आज इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयुक्त किया जाता है. दक्षिण चीनी समुद्र में नियंत्रण तथा बेल्ट-रोड परियोजना एवं विविध निवेशों के माध्यम से चीन अपना वैश्विक वर्चस्व बढ़ाने की लगातार कोशिश कर रहा है. भारत, अमेरिका, चीन और ऑस्ट्रेलिया की पहल को चीन की काट के रूप में देखा जाता है.

हालांकि ये देश ऐसी आशंकाओं को निराधार बताते रहे हैं, पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कूटनीति के बहुपक्षीय स्वरूप को ठोस करने के लिए विभिन्न मंचों की आवश्यकता बढ़ गयी है. चीन के साथ भारत, अमेरिका और जापान के गहरे आर्थिक संबंध हैं तथा अलग-अलग मुद्दों पर तनाव के बाद भी परस्पर आर्थिक सहयोग को बढ़ाने के लिए ये सभी देश प्रयासरत रहे हैं, लेकिन यह भी सच है कि चीन अपनी नीतियों को लेकर आक्रामक है तथा अमेरिका का जोर संरक्षणवाद पर है. ऐसे में भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था तथा क्षेत्रीय राजनीतिक शक्ति को इस खींचतान में संतुलन बनाने की चुनौती है.

बीते सालों में इस चुनौती से पार पाने की कोशिश में भारत ने अमेरिका, रूस और चीन के साथ यूरोपीय संघ, आसियान, जापान, दक्षिण कोरिया, अरब के देशों से भी द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सहयोग को आगे बढ़ाया है. इसी प्रयास का परिणाम है कि बड़ी और विकसित शक्तियां भारत से निकटता को प्रगाढ़ करने में लगी हुई हैं.

चीन, रूस और अमेरिका आपसी सहयोग के बावजूद आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक प्रतिस्पर्द्धा में हैं. इस होड़ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है और इसमें निकट भविष्य में बदलाव की संभावना नहीं है. इन देशों से भारत के संबंध भी उतार-चढ़ाव से प्रभावित होते हैं, लेकिन भारत के साथ की आवश्यकता भी इन देशों को है. भारत एक ऐसे स्थान पर खड़ा है, जहां से वह अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य, समुद्री सुरक्षा तथा राजनीति को प्रभावित कर सकता है.

जापान और अमेरिका के रुझान को इस दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए. इन तीन देशों की साझेदारी जहां वैश्विक स्तर पर सकारात्मक है, वहीं इन्हें चीन के साथ निरंतर संवाद से विवादित मसलों को सुलझाने का प्रयास भी करना चाहिए, ताकि व्यापक संतुलन स्थापित हो सके.

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