ePaper

रेलवे के खानपान की पेचीदगी

Updated at : 10 Apr 2019 6:15 AM (IST)
विज्ञापन
रेलवे के खानपान की पेचीदगी

अभिषेक सिंह टिप्पणीकार abhi.romi20@gmail.com देश का हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में रेलवे पर आश्रित है, लेकिन उसकी सेवा को लेकर किसी के पास कहने के लिए शायद ही कोई सकारात्मक बात होगी. पिछले कुछ वर्षों से रेलवे की खानपान सेवा को सुधारने की कई कोशिशें होती रही हैं, पर इसे लेकर विवादों का […]

विज्ञापन

अभिषेक सिंह

टिप्पणीकार

abhi.romi20@gmail.com

देश का हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में रेलवे पर आश्रित है, लेकिन उसकी सेवा को लेकर किसी के पास कहने के लिए शायद ही कोई सकारात्मक बात होगी. पिछले कुछ वर्षों से रेलवे की खानपान सेवा को सुधारने की कई कोशिशें होती रही हैं, पर इसे लेकर विवादों का कोई अंत नहीं दिख रहा है. मुसाफिर इसकी बढ़ती दरों और क्वॉलिटी को लेकर हमेशा ही शिकायत करते रहे हैं.

बीते 7 अप्रैल, 2019 को दिल्ली से भुवनेश्वर जा रही प्रीमियम श्रेणी की राजधानी एक्सप्रेस में परोसे गये नॉनवेज खाने से करीब पांच दर्जन यात्री फूड पॉयजनिंग के शिकार हो गये.

बीमार यात्रियों को दवा देकर और भोजन के नमूने लेकर आईआरसीटीसी ने परोसनेवाली एजेंसी पर कार्रवाई की बात कही, पर इसकी गुंजाइश कम है कि आगे ऐसा हादसा नहीं होगा. अतीत में कई बार ऐसा हुआ है, जब खराब नाश्ते-भोजन की शिकायत पर कैटरिंग स्टाफ अपनी गलती मानने की बजाय मुसाफिरों से ही अभद्रता पर उतर आये. हैरानी ही है कि रेल मंत्रालय ट्रेनों में दिये जानेवाले भोजन की निगरानी के जितने बड़े प्रबंधों के दावे करता है, समस्या उतनी ही बढ़ती दिखती है.

नवंबर, 2018 में ऐलान किया गया था कि भोजन की क्वॉलिटी को लेकर हो रही शिकायतों को देखते हुए रेलमंत्री खुद इ-दृष्टि नामक सॉफ्टवेयर की मदद से बेस किचन पर नजर रखेंगे. इसके लिए उनके कमरे में एक बड़ी स्क्रीन लगायी गयी है, जिस पर रेलमंत्री भोजन पकते हुए देख सकेंगे. तो क्या यह माना जाये कि राजधानी एक्सप्रेस का भोजन भी उनकी नजरों से गुजरा होगा?

रेलवे की खानपान सेवा कीमतों और गुणवत्ता को लेकर विवाद नये नहीं हैं. सारी दिक्कतें लंबी दूरियों की उन ट्रेनों में हैं, जिनके रास्ते में न्यूनतम ठहराव (स्टॉपेज) होते हैं और लोगों के सामने ट्रेन में ही लगी पैंट्री कार से मिलनेवाले भोजन का विकल्प होता है. ऐसी ज्यादातर ट्रेनों में अक्सर ही यात्री यह शिकायत करते पाये जाते हैं कि भोजन की क्वॉलिटी बेहद खराब थी.

भोजन में कॉकरोच निकलने जैसी घटनाएं भी आयी हैं. यह हाल तो प्रीमियम श्रेणी की राजधानी और शताब्दी जैसी ट्रेनों के खानपान का है, साधारण श्रेणी की मेल-एक्सप्रेस ट्रेनों में कैसा भोजन दिया जाता है- इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है.

साल 2017 में भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) ने भारतीय रेल की कैटरिंग सर्विस से जुड़ी अपनी रिपोर्ट संसद के सामने रखी थी.

रिपोर्ट में भारतीय रेल की कैटरिंग सर्विस में कई अनियमितताओं पर सवाल उठाये गये थे. जैसे यह कहा गया था कि ट्रेनों और रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों को परोसी जा रही चीजें खाने लायक नहीं हैं. वे प्रदूषित हैं और कई डिब्बाबंद व बोतलबंद वस्तुएं एक्सपायरी डेट के बाद भी बेची जा रही हैं. सीएजी के मुताबिक 2005 से भारतीय रेलवे ने तीन बार अपनी कैटरिंग पॉलिसी में बदलाव किया.

कैटरिंग सर्विस को पहले 2005 में आईआरसीटीसी को दिया गया था और वापस जोनल रेलवे को दिया गया था, बाद में एक बार फिर उसे आईआरसीटीसी को दे दिया गया. रिपोर्ट ने इन समस्याओं के लिए मैनेजमेंट स्तर पर लगातार हो रहे बदलाव को बड़ा कारण बताया, जिससे अनिश्चितता की स्थिति बनी और यात्रियों को नुकसान हुआ.

उस दौरान सीएजी और रेलवे की संयुक्त टीम ने 80 ट्रेनों का मुआयना भी किया. इसमें पाया गया कि पेय पदार्थों में साफ पानी का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है और खाने-पीने की चीजों को ढकने तक की व्यवस्था नहीं है. ट्रेनों के अंदर चूहे और तिलचट्टे पाये गये हैं. पैंट्री कार के जरिये बेची जा रही चीजों की ऊंची कीमत वसूली जाती है, जबकि उनका वजन भी तयशुदा मात्रा से कम पाया गया.

एक दौर था, जब रेलवे की कैटरिंग सेवा इतनी खराब नहीं थी और भोजन की कीमत भी अधिक नहीं थी. मुसाफिर रेलवे के संतुष्टिदायक भोजन को मानने लगे थे कि जरूरत पड़ने पर वह खाया जा सकता था और घर से भोजन बांधकर ले चलने के झंझट से बचा जा सकता था.

लेकिन जब से रेलवे ने खाने का जिम्मा निजी हाथों में सौंपा है, इसका बंटाधार शुरू हो गया है. रेलवे ने भोजन व्यवस्था को निजी हाथों में सौंपते समय दलील थी कि इससे भोजन की क्वॉलिटी सुधरेगी और कमजोर वर्ग को काम भी मिलेगा. रेलवे की कैटरिंग सेवा के जरिये कुछ लोगों को स्व-रोजगार उपलब्ध कराने का रेलवे का प्रस्ताव आकर्षक था, लेकिन धीरे-धीरे इसमें मुनाफाखोरों ने घुसपैठ कर ली, जिन्हें भोजन की गुणवत्ता से कोई मतलब नहीं.

हाल यह है कि रेलवे की खानपान सेवा के तहत ठेका हासिल करनेवाले ठेकेदार रेल अधिकारियों को येन-केन-प्रकारेण (घूस देकर) संतुष्ट कर लेते हैं और फिर यात्रियों को भोजन मुहैया कराने के नाम पर अपने खाने-पीने की ही व्यवस्था करने लगते हैं.

न तो रेल अधिकारी इसकी नियमित जांच करते हैं कि परोसा गया भोजन खाने योग्य है भी या नहीं और यदि हंगामा न किया जाये, तो इस बारे में यात्रियों की शिकायतें सुनने तक की व्यवस्था नहीं है.

राजधानी, दूरंतो और शताब्दी जैसी ट्रेनों में मिलनेवाले खाने की कीमत में बढ़ोत्तरी के बावजूद रेल यात्रियों को कोई गारंटी नहीं दी जाती कि उन्हें बेहतरीन भोजन मिलेगा और संतुष्ट नहीं होने पर वे उसकी कीमत वापस पा सकते हैं या उसकी शिकायत कर सकते हैं.

जिस रेल यात्रा के सुखद होने का आश्वासन रेलवे अपने यात्रियों को देती है, यदि वह खराब और महंगा भोजन देने पर ही आमादा रहती है, तो आखिर कैसे कोई यात्रा मंगलमय और आरामदेह हो सकती है.

विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola