डॉक्टर बनने की गंदी डगर

।। सुभाष चन्द्र कुशवाहा ।। वरिष्ठ पत्रकार हम निश्चित रूप से नहीं कह सकते हैं कि मेडिकल कॉलेजों में पढ़ रहे तमाम छात्र योग्य ही हैं. इस खेल में बड़ों का हाथ न होता, तो यह धंधा इतने सुनियोजित तरीके से नहीं चलता और न ही अपराधी सजा से बच पाते. एक बार फिर 22 […]
।। सुभाष चन्द्र कुशवाहा ।।
वरिष्ठ पत्रकार
हम निश्चित रूप से नहीं कह सकते हैं
कि मेडिकल कॉलेजों में पढ़ रहे तमाम छात्र योग्य ही हैं.
इस खेल में बड़ों का हाथ न होता, तो यह धंधा इतने सुनियोजित तरीके से नहीं चलता और न ही अपराधी सजा से बच पाते.
एक बार फिर 22 जून, 2014 को होने वाली कंबाइंड प्री मेडिकल टेस्ट (सीपीएमटी) की परीक्षा प्रश्न-पत्रों के आउट हो जाने के कारण स्थगित करनी पड़ी. विगत कई सालों से मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में नकल माफिया का खेल जारी है. एक ऐसा तंत्र विकसित हो गया है, जो नकल, जुगाड़, धांधली और खरीद-फरोख्त द्वारा मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश दिला रहा है.
प्रवेश परीक्षा के पूर्व ही दक्षिण भारत में 15 से 40 लाख में मेडिकल की सीटें बिक रही हैं. एमडी कोर्स में प्रवेश दिलाने के लिए डेढ़ करोड़ में सौदा हो रहा है. पूरे चिकित्सा तंत्र पर बाहुबलियों और धन्नासेठों का कब्जा है. मुन्ना भाई एमबीबीएस का चरित्र हवा-हवाई नहीं है. देश के कई महानगरों में प्रश्न-पत्रों को बेचने का संगठित धंधा मजबूती से पांव पसार चुका है.
जून, 2009 को देश के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के प्रश्नपत्रों के बाहर आने का प्रकरण हमने देखा है. अक्सर ऐसे मामले प्रकाश में आते हैं और हर बार प्रशासन ऐसी घटनाओं को नकार कर मामले को शांत कर देता है. 2009 के जून महीने में ही उत्तर प्रदेश सीपीएमटी परीक्षा को साफ-सुथरा संपन्न कराने के तमाम दावों बीच झांसी व लखनऊ से 6 फर्जी छात्रों को गिरफ्तार किया गया था, जो दूसरों की जगह परीक्षा दे रहे थे. ऐसी स्थिति में मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं की निष्पक्षता पर संदेह उठना लाजिमी है. अब तक इन प्रवेश परीक्षाओं में प्रश्नपत्र बेचने की घटनाओं में गिरफ्तार लोगों के विरुद्ध कार्रवाई न किया जाना संदेह को मजबूत करता है. इससे यह संकेत मिलता है कि यह तंत्र बड़ों के इशारे पर संचालित हो रहा है.
2004 में लखनऊ स्थित मेडिकल कॉलेज में प्रवेश दिलाने और परीक्षकों को धमकानेवाले मुन्ना भाइयों का रैकेट पकड़ा गया था, पर कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं हुआ. 2005 में सीपीएमटी प्रश्न-पत्रों के बाहर आने के मामले में 12 डॉक्टरों और कुछ छात्रों को गिरफ्तार किया गया था. मामला आज तक लंबित है. पुलिस मुख्य आरोपी तक पहुंच नहीं पायी. नवंबर, 2005 का एक और मामला लंबित है, जिसमें केजी मेडिकल कॉलेज, लखनऊ के कुछ छात्रों को एक छात्र के अपहरण के आरोप में कानपुर से गिरफ्तार किया गया था. अपहरण के पीछे कारण बताया गया था कि उस छात्र ने झांसी मेडिकल कालेज में प्रवेश दिलाने वाले गैंग को तय रकम नहीं दी थी.
2006 में पंजाब पीएमइटी का प्रश्नपत्र भी लखनऊ के प्रिटिंग प्रेस से बाहर आया था और दिल्ली में केजी मेडिकल कॉलेज के एक छात्र को प्रश्नपत्र हल करते पकड़ा गया था. उस मामले में भी कोई कार्रवाई नहीं हुई. अप्रैल, 2006 में भी वहीं के दो छात्रों को मोबाइल व इयर फोन के माध्यम से परिसर के बाहर प्रश्न-पत्रों का हल प्राप्त करते पकड़ा गया था. 2007 में विशेष टास्क फोर्स द्वारा बनारस में पश्चिम बंगाल प्रवेश परीक्षा के प्रश्नपत्र बाहर करने के मामले में बबली काजमी की गिरफ्तारी का मामला भी अभी तक किसी नतीजे तक नहीं पहुंच सका है.
2007 के सीपीएमटी में हुई धांधली मामले में तो पूर्वाचल विश्वविद्यालय के कुलपति को इस्तीफा तक देना पड़ा था. मई, 2008 में अलीगढ़ व लखनऊ में एक बड़े रैकेट को पकड़ा गया था और 30 से अधिक गिरफ्तारियां भी हुई थीं. चिकित्सा क्षेत्र में सीपीएमटी के अलावा एमडी परीक्षाओं में भी धांधलियां पकड़ी जाती रही हैं. 2004 में तो केजीएमसी के कुछ अध्यापक तक गिरफ्तार हुए, पर यह मामला भी ठंडे बस्ते में चला गया.
मेडिकल की पढ़ाई में धनबल और धांधलियों के बढ़ने से आम मरीज मुन्ना भाईयों के रहमो-करम पर जीने को अभिशप्त है. हम निश्चित रूप से नहीं कह सकते हैं कि मेडिकल कॉलेजों में पढ़ रहे तमाम छात्र योग्य ही हैं. इस खेल में बड़ों का हाथ न होता, तो यह धंधा इतने सुनियोजित तरीके से नहीं चलता और न ही अपराधी सजा से बच पाते. देश के तमाम निजी मेडिकल कॉलेजों का स्वामित्व राजनेताओं के पास है. वे इसे व्यवसाय के रूप में चला रहे हैं. यह चमत्कार से कम नहीं है कि लखनऊ के एक निजी मेडिकल कॉलेज के ज्यादातर एमबीबीएस छात्र एमडी कोर्स में प्रवेश के लिए चुन लिये गये हैं.
मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में हो रही धांधली और धन तंत्र की पकड़ ने इस शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न् लगा दिया है. आने वाले दिनों में मरीजों के साथ कैसा सलूक होगा, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है. धनी लोग तो महंगे चिकित्सालयों की ओर रुख कर लेंगे, पर आम जनता मुन्ना भाईयों के हाथों मरेगी. डॉक्टर का रूप भगवान का नहीं, हैवान का होगा. चिकित्सक और मरीजों के संबंध और खराब होंगे और मेधावी छात्र कुंठा के मारे आत्महत्या करने को मजबूर होंगे. जरूरत है कि मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और चिकित्सकों की संवेदना बचाये रखने के लिए मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं को पारदरशी बनाया जाये.
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