प्रकृति इनकी सगी हो जैसे!
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 27 Sep 2018 8:21 AM
मिथिलेश कु. राय युवा रचनाकार कक्का एक दिन धूप को कोसने लगे थे. भादो का महीना था. सवेरे का मौसम बड़ा सुहाना था. वे पांव-पैदल कहीं सफर पर निकल गये. सोचा, कितनी प्यारी हवा चल रही है. बातों-बातों में रास्ता कट जायेगा. लेकिन, पहले आसमान से काले-काले बादल गायब हुए, फिर हवा भी रुक गयी. […]
मिथिलेश कु. राय
युवा रचनाकार
कक्का एक दिन धूप को कोसने लगे थे. भादो का महीना था. सवेरे का मौसम बड़ा सुहाना था. वे पांव-पैदल कहीं सफर पर निकल गये. सोचा, कितनी प्यारी हवा चल रही है. बातों-बातों में रास्ता कट जायेगा. लेकिन, पहले आसमान से काले-काले बादल गायब हुए, फिर हवा भी रुक गयी.
इतनी तीखी धूप निकली कि कक्का की हालत खराब. वे बमक गये. धूप को चांडाल तक कह दिया. मैं नहीं जानता कि धूप उनकी बातों को सुन भी रही थी कि नहीं!
मुझे कई बार ताज्जुब होता है. क्या गांव के लोग प्रकृति से बातें भी कर लेते हैं! जब जिस चीज की जरूरत होती है, उनसे कहते हैं. जरूरत समाप्त हो जाती है, तो हाथ-पैर समेट कर दफा हो जाने के लिए बोल देते हैं. कक्का सही कहते हैं. खेतिहरों के जीवन में प्रकृति इस तरह घुल-मिल जाती है कि वे कभी-कभी उसे डपट भी देते हैं, गाली भी दे डालते हैं.
एक रात की बात है. अभी खाना बन ही रहा था कि जोरदार हवा उठी और पूरी दुनिया का बादल गांव के ऊपर जमा होकर मूसलाधार बरसने लगा. यह सब इतना जल्दी हुआ कि माई को संभलने का मौका नहीं मिला और वे गुस्से से आग-बबूला हो गयीं. बादल को खरी-खोटी सुनाने लगीं कि थोड़ा सबर कर लेता, तो उसका क्या जाता. सब खा-पीकर बिस्तर पर जम जाते. फिर वह रातभर इत्मीनान से बरसता रहता. लेकिन नहीं. लोगों को तंग करने में नाशपीटे को आनंद आता है!
धान के खेतों में अगर पानी लगा हो और फिर भी आसमान में बादलों की चहलकदमी नजर आये, तो लोग उल्लास से बादल की ओर देखकर कहने लगते हैं कि जाओ-जाओ, कुछ दिन बाद आना, बहुत हो गया. जहां जरूरत है, उस ओर बढ़ जाओ. इधर धूप को आने दो!
कक्का का मानना है कि प्रकृति के जो भी नियम अस्तित्व में हैं, वे सब खेतिहरों को ध्यान में रखकर ही बनाये गये हैं. लेकिन कभी-कभी जब प्रकृति इन नियमों में ढील दे देती है, तो खेती-बाड़ी के कामों में विघ्न उत्पन्न हो जाता है. तभी मुंह से कुबोल निकलते हैं. नहीं तो हम इनकी प्रशंसा में गीत गाते रहते हैं.
कक्का गांव की एक बूढ़ी माई का किस्सा बताते हैं. वे सावन-भादो में बगल की नदी को कभी भी आंखें दिखाने लगती थीं. हालांकि, वे बहुत धार्मिक महिला थीं. एक दोपहर मैंने एक आदमी को एक वृक्ष को कोसते सुना. उस दिन धूप बड़ी तीखी निकली थी और वह काम को बीच में छोड़कर पेड़ के पास एक आस में आया था.
लेकिन पेड़ के पत्ते मौन थे. उन्हें लगा कि पेड़ उन्हें पसीने में लथपथ देखकर भी अपने पत्तों को नहीं डोला रहा, तो इसका एक ही मतलब है कि वह उसके कष्ट को मुग्ध भाव से निहार रहा है और मजे ले रहा!
ढिबरी बुत जाने पर यहां बूढ़ी माई उसी के पीछे लग जाती हैं और हवा को सुनाने लगती हैं. फिर जब उसे यह पता चलता है कि घर में तेल खत्म हो गया है, तो वह चुप हो जाती हैं और फिर रात के अंधेरे को कोसने लगती हैं कि रात बनाया तो बनाया, अंधेरा गढ़ने की क्या जरूरत थी!
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