भेदभाव करोगे, तो गरम होऊंगा ही न!

Updated at : 07 Jun 2014 5:03 AM (IST)
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भेदभाव करोगे, तो गरम होऊंगा ही न!

।। पंकज कुमार पाठक।। (प्रभात खबर, रांची) इस गरमी में शायद ही कोई होगा, जिसने सूरज को भला-बुरा नहीं कहा होगा. मैं खुद दिन में दस बार उसे उलाहना देता हूं. अब इस उलाहने का असर कहिए या सच्चई बताने की जरूरत, लेकिन एक रोज मेरे सपने में सूरज देवता प्रकट हुए और उन्होंने पूछा-‘‘दिन […]

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।। पंकज कुमार पाठक।।

(प्रभात खबर, रांची)

इस गरमी में शायद ही कोई होगा, जिसने सूरज को भला-बुरा नहीं कहा होगा. मैं खुद दिन में दस बार उसे उलाहना देता हूं. अब इस उलाहने का असर कहिए या सच्चई बताने की जरूरत, लेकिन एक रोज मेरे सपने में सूरज देवता प्रकट हुए और उन्होंने पूछा-‘‘दिन भर मुङो कोसते क्यों रहते हो?’’ मैंने विनम्रता से कहा- ‘‘अब क्या शहर को जला कर चैन की सांस लीजिएगा? अपना तापमान सामान्य रखिएगा, तो आपका क्या नुकसान होगा? आखिर किस गलती का बदला ले रहे हैं?’’ मेरे सवालों ने उन्हें भावुक कर दिया.

आंखे नम करते हुए बोले- ‘‘जब तुम्हारे साथ ऐसा होगा न, तब तुम्हारे भीतर भी बदले की भावना जलेगी! मेरे अंदर जो आग सुलग रही है, ये गरमी उसी का परिणाम है.’’ मैंने सकुचाते हुए पूछा- ‘‘ऐसा क्या हो गया जी आपके साथ?’’ एक शब्द में उन्होंने बताया- ‘‘भेदभाव.’’ मैं सोचने लगा कि भला सूरज के साथ भेदभाव कौन और कैसे करेगा? मेरे मन में चल रही बात को पढ़ कर वह बोले- ‘‘तुम सब मेरे साथ भेदभाव कर रहे हो. इसी का परिणाम है, यह भयानक गरमी. धरती के सबसे काम का हूं मैं.

दुनिया भर में ऊर्जा का सबसे बड़ा प्राकृतिक स्नेत हूं मैं. तुम्हारे देश के प्राचीन ऋषि-मुनियों ने भगवान किसे कहा है, मुङो. लेकिन फिर भी तुम एहसानफरामोश लोग चांद की तारीफ करने में ही व्यस्त रहते हो? तुम्हारी तारीफ के रास्ते में तो मैं दूर-दूर तक दिखता ही नहीं हूं. तुम्हें, प्रेमिका चाहिए, चांद के टुकड़े जैसी. लोगों को अपने घरों में चांद जैसी बहू की तलाश है, बच्चों की सुंदरता का मापक भी चांद ही बना. तुम्हारे गीतकार-संगीतकारों ने भी मेरे भेदभाव ही किया है. गाने कैसे-कैसे बनाये उन्होंने! चांद-तारों में नजर आये, चेहरा तेरा.., चांद छिपा बादल में.., खोया-खोया चांद.., कुछ ने कहा चांद, तो कुछ ने कहा तेरा चेहरा.. चलो माना कि एक गाने में मेरा जिक्र भी आया है, लेकिन चांद के बाद ही न! उसके बोल थे, चंदा है तू, मेरा सूरज है तू.. अब आसमान के नागरिकों के ‘समानता के अधिकारों’ का हनन करोगे, तो मैं (सूरज) तो बुरा मानूंगा ही न! ऐसा भेदभाव करोगे, तो मेरे भीतर की आगे सुलगेगी ही. मेरा पारा ऊपर चढ़ेगा ही. प्रेमिका, पुत्र, बहू-बेटी से पहले ‘सूरज’ का विशेषण लगाते तो कौन-सा भूचाल आ जाता? बच्चों तक ने मेरे साथ भेदभाव किया है.

उन्हें गर्मी छुट्टी मिलती है, तो उसका एकमात्र कारण मैं हूं, लेकिन उनकी जुबां पर सिर्फ चंदा मामा का ही नाम होता है. चंदा मामा. चंदा मामा की रट लगाये रखते हैं. मुङो भी चाचा या ताऊ कह देते तो क्या जाता? लेकिन मेरी तारीफ करना तो लगता है जैसे पाप है? किसी आदमी के साथ ऐसा भेदभाव करके देखो, वह तो आग लगा देगा दुनिया में. दंगा-फसाद करा देगा.’’ आदमी का जिक्र होते ही मेरी आंख खुली गयी. दिन निकल चुका था और मैं सूरज को देखते हुए शर्मिदा हो रहा था.

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