झोले में बैंक

Updated at : 07 Sep 2018 6:13 AM (IST)
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झोले में बैंक

सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार drsureshkant@gmail.com एक जमाने में एक पूरा सरकारी विभाग चिट्ठियां लाने-ले जाने पर टिका था. कबूतर द्वारा चिट्ठियां पहुंचाने में दिलचस्पी लेना छोड़कर लोगों को अवैध तरीके से विदेश पहुंचाने के ‘कबूतरबाजी’ वाले धंधे में लिप्त हो जाने पर डाकिये ने ही सामने आकर लोगों की समस्या हल की. आधी से ज्यादा […]

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सुरेश कांत

वरिष्ठ व्यंग्यकार

drsureshkant@gmail.com

एक जमाने में एक पूरा सरकारी विभाग चिट्ठियां लाने-ले जाने पर टिका था. कबूतर द्वारा चिट्ठियां पहुंचाने में दिलचस्पी लेना छोड़कर लोगों को अवैध तरीके से विदेश पहुंचाने के ‘कबूतरबाजी’ वाले धंधे में लिप्त हो जाने पर डाकिये ने ही सामने आकर लोगों की समस्या हल की.

आधी से ज्यादा उर्दू शेरो-शायरी कासिद यानी डाकिये द्वारा आशिक की चिट्ठी माशूक को भेजने और उसके संभावित परिणामों पर टिकी है, जिससे डाकिये के शायरी में योगदान का अंदाजा लगाया जा सकता है.

डाकिये का साहित्य की अभिवृद्धि में भी योगदान रहा है. मसलन, पहले रचनाएं संपादकों को डाक से ही भेजी जाती थीं, जो ‘संपादक के अभिवादन व खेद सहित’ डाक से ही लौटा भी दी जाती थीं.

कभी-कभी तो यह काम इतनी तेजी से होता था कि लेखकों को कुछ देर दंग रह जाने का काम करना पड़ जाता था. अस्सी के शुरू में रिजर्व बैंक में कार्य ग्रहण करने बंबई जाने पर वहां ‘धर्मयुग’ के दफ्तर में धर्मवीर भारती से मिलकर मैंने उनसे पूछा कि क्या आपने ‘संपादक के अभिवादन और खेद सहित’ की कुछ पर्चियां डाकिये को भी दे रखी हैं, कि इधर मैंने रचना आपको भेजी और उधर डाकिये ने लौटा भी दी? इस उलाहने के बाद मेरी रचनाएं ‘धर्मयुग’ में खूब छपने लगीं.

आज के लेखक यह जानकर आश्चर्य में पड़ सकते हैं कि पहले रचनाओं पर पारिश्रमिक और किताबों पर रॉयल्टी देनी नहीं पड़ती थी, बल्कि मिलती थी और उसका चेक भी डाकिये ही लेकर आया करते थे.

कुछ पुराने विचारों के पोंगापंथी प्रकाशक किसी न किसी रूप में आज भी वह परंपरा कायम रखे हुए हैं. एक बड़े प्रकाशक ने पिछले दिनों मेरी कुछ ‘बेस्टसेलर’ किताबों की सालभर की रॉयल्टी के रूप में 340 रुपये का चेक भिजवाया, जिसे बैंक ने इनकैश करने से मना कर दिया.

पहले तो मैं समझा कि जिस काम के लिए प्रकाशक को शर्मिंदा होना चाहिए, उसके लिए बैंक क्यों शर्मिंदा हो रहा है, पर फिर चेक-वापसी-पर्ची पढ़ने से पता चला कि तारीख में 2017 के 7 को काटकर 8 करने के कारण चेक लौटाया गया था, जिसके लिए मेरे खाते में से 118 रुपये भी काट लिये गये थे. जाहिर है, चेक पिछले साल की रॉयल्टी का था.

प्रकाशक को लिखने पर उसने, शायद शर्मिंदगी में कि कैसा लेखक है, जो देश-समाज के सामने मुंह बाये खड़ी विसंगतियों को छोड़कर रॉयल्टी जैसी ओछी बात पर ध्यान दे रहा है, कुछ जवाब नहीं दिया. पर कभी विक्टर ह्यूगो को उसके प्रकाशक ने जो जवाब दिया था, उसे देखते हुए तो यह ठीक रहा.

ह्यूगो ने रॉयल्टी का चेक देखकर प्रकाशक को केवल प्रश्नवाचक चिह्न (?) लिखकर भेजा था, जिसका उत्तर प्रकाशक ने भी केवल विस्मयादिबोधक चिह्न (!) लिखकर दे दिया था.

अब डाकियों ने ‘ठेले पर हिमालय’ की तर्ज पर अपने झोले में डाक के बजाय बैंक रखकर लाने का काम शुरू किया है, तो उम्मीद है, कई दूसरे माल्याओं, मोदियों और चौकसियों को देश का समुचित विकास करने की प्रेरणा मिलेगी.

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