बाबाओं के मायाजाल से बचें

Updated at : 30 Apr 2018 7:09 AM (IST)
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बाबाओं के मायाजाल से बचें

II आशुतोष चतुर्वेदी II प्रधान संपादक, प्रभात खबर ashutosh.chaturvedi @prabhatkhabar.in एक नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में जोधपुर की एक अदालत ने आसाराम को दोषी करार दिया है और उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई है. पिछले कुछ अरसे में कई बाबाओं का पर्दाफाश हुआ है और इनमें से कई जेल की सलाखों के पीछे हैं. […]

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II आशुतोष चतुर्वेदी II
प्रधान संपादक, प्रभात खबर
ashutosh.chaturvedi
@prabhatkhabar.in
एक नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में जोधपुर की एक अदालत ने आसाराम को दोषी करार दिया है और उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई है. पिछले कुछ अरसे में कई बाबाओं का पर्दाफाश हुआ है और इनमें से कई जेल की सलाखों के पीछे हैं.
इन बाबाओं का ऐसा मायाजाल है, जिसमें न केवल कम पढ़े-लिखे लोग फंसे हैं, बल्कि पढ़े-लिखे लोग भी झांसे में आये हैं. जो शख्स बड़ी-बड़ी देसी-विदेशी कारों में चलता हो, स्टेज पर रॉक स्टार जैसी उछलकूद करता हो, जिसकी जीवनशैली किसी राजा-महाराज की तरह हो, जिसमें आध्यात्मिक गुरु होने का कोई तत्व न हो, ऐसा व्यक्ति क्या बाबा कहलाने लायक है?
भोग-विलास के प्रतीक ऐसे बाबाओं से समाज को दिशा देने अथवा समाज सुधार की उम्मीद करना बेमानी है. फिर काहे हम लोग इन बाबाओं के मायाजाल में फंस जाते हैं? भारत में आध्यात्मिक परंपरा बहुत पुरानी है. आदि शंकराचार्य से लेकर महर्षि अरविंद, रामकृष्ण परमहंस, चैतन्य महाप्रभु, विवेकानंद, परमहंस योगानंद, आचार्य शंकर देव अनगिनत संतों ने भारत की आध्यात्मिक परंपरा को जीवंत बनाये रखा है. इन संतों की आज भी बड़ी संख्या में अनुयायी हैं.
इनका समाज में व्यापक प्रभाव रहा है और समाज सुधार में इनकी भूमिका रही है. इनके आश्रमों में महिलाओं और बच्चों को संरक्षण मिलता रहा है. दूसरी ओर आसाराम जैसे लोग हैं, जो संतों के नाम पर कलंक हैं. आसाराम अपनी पोती की उम्र की बच्ची के साथ दुष्कर्म के दोषी पाये गये हैं.
गौर करें, तो दुष्कर्म को लेकर जो खबरें आ रही हैं, वे दिल को दहला देने वाली हैं. देश के किसी-न-किसी कोने से रोजाना दुष्कर्म की खबरें सुर्खियां बन रही हैं. चिंता का सबसे बड़ा विषय यह है कि नाबालिग बच्चियों से दुष्कर्म किया जा रहा है और घटना को अंजाम देने वाला कोई जाना पहचाना शख्स ही होता है. यह कानून व्यवस्था से कहीं बड़ी सामाजिक समस्या बन गया है. कड़ी सजा का प्रावधान जरूरी है.
साथ ही जन जागरूकता अभियान चलाये जाने की भी जरूरत है. अगर आपका कोई रिश्तेदार ही दुष्कर्म में शामिल है, तो कानून व्यवस्था की कोई भी मशीनरी इसे रोक नहीं पायेगी. थॉमसन रॉयटर फाउंडेशन ने एक अध्ययन में पाया कि भारत में दुष्कर्म के तकरीबन 90 फीसदी मामलों में दुष्कर्मी जाना पहचाना शख्स था. यह तथ्य बेहद चौकाने वाला है और समस्या की गंभीरता की ओर इशारा करता है.
हम भारतीय बहुत भावुक लोग हैं और बहुत जल्द किसी को भी ईश्वर का दर्जा दे देते हैं. लेकिन बाद में पता चलता है कि जिसे ईश्वर का दर्जा दिया हुआ है, वह तो हैवान है. आसाराम के मामले में भी यही हुआ. उसने उनके साथ दुष्कर्म किया, जिनका उस पर अटूट विश्वास था. उसके बाद दुष्कर्म के मामले से बचने के लिए सुनियोजित तरीके से गवाहों पर हमले हुए. उनमें से कई को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.
अगस्त, 2013 में आसाराम के खिलाफ दुष्कर्म का मामला दर्ज करवाने वाला उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर निवासी पीड़िता का पूरा परिवार आसाराम का अंधभक्त था. उन्होंने अपने दो बच्चों को आसाराम के छिंदवाडा स्थित गुरुकुल में पढ़ने के लिए भेजा था. अगस्त, 2013 को पीड़िता के पिता को छिंदवाडा गुरुकुल से एक फोन आया. उन्हें बताया गया कि उनकी 16 साल की बेटी बीमार है.
जब पीड़िता के माता-पिता छिंदवाडा गुरुकुल पहुंचे, तो उन्हें बताया गया कि उनकी बेटी पर भूत-प्रेत का साया है, जिसे आसाराम ही ठीक कर सकते हैं. पीड़िता का परिवार आसाराम से मिलने उनके जोधपुर आश्रम पहुंचा. आसाराम ने 16 साल की बच्ची को अपनी कुटिया में बुलाकर दुष्कर्म किया. आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इस घटना का आसाराम को भगवान मानने वाले परिवार पर क्या असर हुआ होगा.
इसके बाद की कहानी और संगीन है. परिवार को रिश्वत की पेशकश की गयी, जान से मार देने की धमकी भी दी गयी और हर तरह के दबाव डाले गये. लेकिन परिवार आसाराम के खिलाफ जारी अपनी लड़ाई में डटा रहा.
ये तथ्य मीडिया में पहले भी आये हैं, पर मैं रेखांकित करना चाहता हूं कि आसाराम से पार पाना कितना कठिन था. आसाराम और उनके बेटे नारायण साई पर दुष्कर्म का आरोप लगाने वाली सूरत की दो बहनों में से एक के पति पर सूरत में जानलेवा हमला हुआ. राकेश पटेल नाम के वीडियोग्राफर को निशाना बनाया गया. दिनेश भगनानी नाम के एक गवाह पर सूरत में तेजाब फेंका गया.
आसाराम के निजी सचिव के तौर पर काम कर चुके अमृत प्रजापति पर हमला किया गया. उन्हें गर्दन पर गोली लगी और उनकी मौत हो गयी. आसाराम के खिलाफ खबरें लिखने वाले पत्रकार नरेंद्र यादव को भी निशाना बनाया गया. कई ऑपरेशन के बाद नरेंद्र किसी तरह बच पाये. एक अन्य गवाह अखिल गुप्ता की उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में गोली मारकर हत्या कर दी गयी. आसाराम के सचिव के रूप में काम कर चुके राहुल सचान पर जोधपुर अदालत में गवाही देने के तुरंत बाद अदालत परिसर में ही जानलेवा हमला हुआ.
एक अन्य गवाह महेंद्र चावला पर पानीपत में हमला हुआ. इस हमले के कुछ दिनों बाद एक अन्य गवाह कृपाल सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गयी. अगर इन तथ्यों पर गौर करें, तो पायेंगे कि आसाराम को सजा दिलवाना कोई आसान काम नहीं था.
लेकिन एक नहीं अनेक बाबा इसी तरह के आरोपों के घेरे में हैं. दिल्ली में आध्यात्मिक विश्वविद्यालय चलाने वाले वीरेंद्र दीक्षित पर दुष्कर्म के कई आरोप हैं और उनकी सीबीआइ जांच कर रही है. हरियाणा में सतलोक आश्रम चलाने वाले रामपाल पर हत्या के गंभीर आरोप हैं.
गुरुमीत राम रहीम को दुष्कर्म के मामले में 20 साल की सजा सुनायी जा चुकी है. बंगलुरु के नजदीक धन्यपीठ चलाने वाले नित्यानंद पर दुष्कर्म का आरोप है.
फिलहाल वह जमानत पर है. भीमानंद पर सेक्स रैकेट चलाने का आरोप है और वह जेल में है. देखा जाये, तो लगभग सभी राजनीतिक दल बाबाओं के इस्तेमाल में कोई संकोच नहीं बरतते हैं. पिछले दिनों शिवराज सिंह सरकार ने पांच हिंदू धर्मगुरुओं को राज्य मंत्री का दर्जा दे दिया. हम सब जानते हैं कि मध्य प्रदेश में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि बाबाओं को बढ़ा-चढ़ाकर ईश्वर का नुमाइंदा बनाने में मीडिया की भी भूमिका रहती है.
ज्यादातर घटनाओं में बाबाओं के प्रति अंधभक्ति का शिकार परिवार की बच्चियां बनी हैं. उन्होंने बताया कि उनका शोषण इसलिए हुआ, क्योंकि परिवारजन उनकी बात सुनने को तैयार नहीं थे. लब्बोलुआब यह है कि किसी भी बाबा के अंधभक्त न बनें.
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