व्यवस्था बेहतर हो

‘फिर से परीक्षा होती भी है, तो इस बात की क्या गारंटी है कि हमारे साथ ऐसा दोबारा नहीं होगा?’ ये शब्द हैं दसवीं की एक छात्रा के. यह सवाल न सिर्फ केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) से है, बल्कि परीक्षाएं संचालित करनेवाली देश की हर संस्था से है. यह सवाल केंद्र और राज्य की […]
‘फिर से परीक्षा होती भी है, तो इस बात की क्या गारंटी है कि हमारे साथ ऐसा दोबारा नहीं होगा?’ ये शब्द हैं दसवीं की एक छात्रा के. यह सवाल न सिर्फ केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) से है, बल्कि परीक्षाएं संचालित करनेवाली देश की हर संस्था से है. यह सवाल केंद्र और राज्य की सरकारों से भी है, जिनके अधीन ये संस्थाएं काम करती हैं.
सीबीएसई की दसवीं और बारहवीं कक्षा के पर्चे लीक होने की यह घटना पहली बार नहीं हुई है. विभिन्न स्कूली परीक्षाओं और चयन परीक्षाओं में पर्चे बाहर आने की शिकायतें पहले भी आयी हैं. इसके साथ अन्य तरह की धांधलियों को जोड़ दें, तो यह स्पष्ट है कि हमारे शैक्षणिक तंत्र में संगठित भ्रष्टाचार और कदाचार का माहौल है.
इसका खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ता है, जो प्रतिस्पर्धा के दौर में नींद-चैन खोकर अपने सफल भविष्य के सपने संजोये परीक्षाओं की तैयारी करते हैं. उनकी इस कोशिश में उनके अभिभावक और शिक्षक भी तनाव झेलते हैं. यह भी सोचा जाये कि शैक्षणिक भ्रष्टाचार का कैसा मनोवैज्ञानिक असर इन बच्चों पर पड़ेगा? सीबीएसई परीक्षाओं की केंद्रीय संस्था है और स्कूली परीक्षाओं के अलावा अन्य कुछ अहम परीक्षाओं का संचालन भी इसके जिम्मे है. इसकी कार्यशैली और उम्दा रिकॉर्ड राज्यस्तरीय बोर्डों के लिए मानक हैं.
सीबीएसई के पूर्व अध्यक्ष अशोक गांगुली ने रेखांकित किया है कि बोर्ड की कामयाबी ने उसके भीतर आत्मतुष्टि, लापरवाही और अहंकार की नकारात्मक भावनाएं भी पैदा की हैं. एनसीईआरटी के निदेशक रहे ख्यात शिक्षाविद कृष्ण कुमार का मानना है कि बोर्ड के प्रशासनिक ढांचे और उसकी कार्यशैली सुधार की राह में बड़ी बाधा हैं. शिक्षा व्यवस्था में माफिया गिरोहों की घुसपैठ बहुत समय से है.
पर्चे लीक होने और धांधली के मामलों से बोर्ड को सीख लेनी चाहिए थी. उम्मीद है कि लाखों छात्रों की परेशानी को हमारे नीति-निर्धारक और शैक्षणिक प्रशासक गंभीरता से समझने की कोशिश करेंगे और व्यवस्थागत खामियों को ठीक करने के लिए ठोस कदम उठायेंगे. इस संबंध में यह भी चिंताजनक है कि शिक्षा माफिया के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई करने में बहुत कमी रही है.
यह नहीं भूलना चाहिए कि अभिभावक बच्चों की शिक्षा पर बहुत खर्च करते हैं तथा छात्र भी अच्छे अंक लाने के दबाव में होते हैं. असफल होने या कम अंक आने पर या फिर ऐसी आशंका से छात्र अवसाद से भी पीड़ित होते हैं, जिसकी भयावह परिणति आत्महत्या के रूप में भी होती है. माफिया या संस्थागत लापरवाही के कारण परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता भी सवालों के घेरे में आती है.
तात्कालिक तौर पर इस मामले की त्वरित जांच कर दोषियों को सजा देने के साथ खामियों का ठीक से आकलन कर उन्हें दूर करने के प्रयास हों, ताकि फिर संकट की ऐसी स्थिति पैदा नहीं हो. नागरिकों को भी सरकार और संस्थाओं पर सुधार के लिए दबाव बनाये रखना होगा.
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