क्षमा से सुशोभित भुजंग

Updated at : 23 Mar 2018 5:22 AM (IST)
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क्षमा से सुशोभित भुजंग

सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार माफी मांगने-देने का खेल जोरों पर है. बावजूद इसके कि पर्यूषण-पर्व अभी दूर है, जिसका आखिरी दिन क्षमावाणी दिवस होता है और ‘मिच्छामि दुक्कड़म’ कहकर क्षमा मांगी जाती है. ‘मिच्छामि’ मतलब ‘क्षमा चाहता हूं’ और ‘दुक्कड़म’ मतलब दुष्कर्मों की. दुष्कर्मों से भी यहां मतलब अपने ही दुष्कर्मों से है, जो शायद […]

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सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
माफी मांगने-देने का खेल जोरों पर है. बावजूद इसके कि पर्यूषण-पर्व अभी दूर है, जिसका आखिरी दिन क्षमावाणी दिवस होता है और ‘मिच्छामि दुक्कड़म’ कहकर क्षमा मांगी जाती है. ‘मिच्छामि’ मतलब ‘क्षमा चाहता हूं’ और ‘दुक्कड़म’ मतलब दुष्कर्मों की. दुष्कर्मों से भी यहां मतलब अपने ही दुष्कर्मों से है, जो शायद किये भी इसलिए जाते हैं, ताकि उनकी क्षमा मांगकर सामने वाले को क्षमा करने का सुख दिया जा सके. सामने वाला बैठे-बिठाये अपने को वीर समझ सके, क्योंकि क्षमा वीरों का आभूषण है. उधर सामने वाला भी कोई कम दयालु नहीं होता, वह भी पर्याप्त मात्रा में दुष्कर्म कर दूसरे को क्षमा करने का भरपूर अवसर उपलब्ध कराता है.
दुष्कर्म इस तरह, आम धारणा के विपरीत, लोगों में भाईचारा फैलाने और समाज में समरसता बढ़ाने के काम आते हैं. समाज में दुष्कर्मों की बाढ़ देख लगता है, लोग अपने पिछले दुष्कर्मों की क्षमा मांगने के साथ ही अगले दुष्कर्म करने का संकल्प भी ले लेते हैं, ताकि अगले वर्ष फिर उसी उत्साह और उमंग के साथ क्षमा मांगने के लिए जुटा जा सके.
दिनकर ने अपने काव्य में क्षमा पर काफी प्रकाश डाला है. उनके अनुसार, पहली बात तो यह कि क्षमा करनेवाले का भुजंग होना जरूरी है. अगर वह भुजंग नहीं है, तो क्षमा उसे शोभा ही नहीं देगी. वे आगे कहते हैं कि क्षमा करनेवाले का भुजंग होना ही जरूरी नहीं है, बल्कि ऐसा भुजंग होना जरूरी है, जिसके पास गरल भी हो. क्षमा उस गरल में लिपटकर बाहर निकलती है, तभी सच्चे अर्थों में क्षमा बनती है.
क्षमा करनेवाले इसीलिए इस कदर फुफकारते-से दिखायी देते हैं. उनकी क्षमा निखालिस क्षमा नहीं होती, तानों के जहर से बुझी क्षमा होती है, जो क्षमा मांगनेवाले को राहत नहीं पहुंचाती, बल्कि और बेचैन कर देती है. दिनकर कहते हैं कि क्षमा करनेवाला अगर दंतहीन, विषहीन, विनीत और सरल होगा, तो उसका क्या होगा, कहा नहीं जा सकता.
क्षमा करनेवाले का भुजंग होना जरूरी है, तो क्षमा मांगनेवाले का क्या होना जरूरी है- नेवला या कुछ और, इस बारे में अलबत्ता दिनकर ने कुछ नहीं कहा. लेकिन, दिनकर जो बताने से चूक गये, उसे हमारे नेताओं ने अपने व्यवहार से जता दिया और वह यह कि क्षमा मांगनेवाला भी कम विषैला नहीं होना चाहिए.
आखिर उसका सामना दंतयुक्त, विषयुक्त, अविनीत और कठोर भुजंगों से होना है. उसे उन भुजंगों पर ऐसे-ऐसे आरोप मढ़ सकने लायक होना चाहिए, जो सच हों या नहीं, पर जनता उन्हें सच मान ले और सत्ता उनसे छीनकर आपको दे दे.
इस पर जब वे पता नहीं अपने किस मान की हानि का दावा अदालत में ठोंक दें, तो आप उनसे क्षमा मांग लें. अदालत भी क्षमा जैसे मानवीय मूल्यों के प्रचार-प्रसार में बड़ी भूमिका निभाती है. रही जनता की बात, तो वह तो ‘भोली’ है और अपनी इस ख्याति को बनाये रखने के लिए वह भी आपको क्षमा कर देगी, बशर्ते ऐन मौके पर कोई आपके साथ भी वैसा ही न कर दे, जैसा आपने दूसरों के साथ किया था.
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