ग्रामीण क्षेत्रों के विकास से बढ़ेगा रोजगार

II ब्रजेश झा II अर्थशास्त्री इस बजट में ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए व्यापक प्रावधान किया है. लेकिन, इसमें बहुत सी चीजों को तर्कसंगत बनाने की जरूरत है. कृषि क्रेडिट कार्ड अच्छी व्यवस्था है, पर इसका दायरा बढ़ाना होगा. गांवों के हाटों को कृषि बाजार में बदलने का प्रावधान किया गया है. इसमें एक […]
II ब्रजेश झा II
अर्थशास्त्री
इस बजट में ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए व्यापक प्रावधान किया है. लेकिन, इसमें बहुत सी चीजों को तर्कसंगत बनाने की जरूरत है. कृषि क्रेडिट कार्ड अच्छी व्यवस्था है, पर इसका दायरा बढ़ाना होगा. गांवों के हाटों को कृषि बाजार में बदलने का प्रावधान किया गया है.
इसमें एक चीज का प्रमुखता से ध्यान रखना होगा कि फिलहाल इन हाटों में किसी तरह का टैक्स नहीं लगता है, लेकिन जब उन्हें कृषि बाजाराें में बदला जायेगा, तो टैक्स लगना तय है. यहां यह जानना होगा कि यह ग्राहक आधारित बाजार है, जहां ज्यादातर कम आमदनी वाले ग्रामीण ग्राहक होते हैं, जिन्हें टैक्स के दायरे में लाया जा सकता है.
ऑपरेशन ग्रीन लॉन्च अच्छा प्रयास है, आलू-प्याज की उपज को अधिक दिनों तक टिकाऊ बनाये रखने के लिए. कृषि उत्पादों को बचाने की व्यवस्था के लिए यह कदम जरूरी भी है. इससे इन उत्पादों को खराब होने से बचाया जा सकेगा. इससे किसानों की आमदनी बढ़ेगी.
एक जरूरी पहलू पर ध्यान देना होगा कि किसानों तक सरकार की अनेक योजनाओं की सूचना पर्याप्त तरीके से पहुंच नहीं पाती है. इसके लिए मुकम्मल व्यवस्था करनी होगी. सरकार की योजनाओं का डायरेक्शन ठीक है, लेकिन नतीजे उम्मीद के अनुरूप नहीं हो रहे हैं. और यह कहना भी ठीक नहीं होगा कि इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मूलभूत बदलाव हो जायेगा. इसके लिए कलेक्टिव डेवलपमेंट की जरूरत है. इसलिए हमें नये तरीके से इसे अंजाम देना होगा.
देश के 86 फीसदी से अधिक किसानों के पास एक हेक्टेयर से भी कम खेती की जमीन है. इतनी जमीन में किसी भी तरह की खेती से उनकी आमदनी को बहुत ज्यादा नहीं बढ़ाया जा सकता है. इसके लिए हमें मौजूदा खेती और विकास का मॉडल कुछ हद तक बदलना होगा.
किसान की आमदनी कम होती जा रही है. केवल खेती के बूते किसी परिवार को पूर्णकालिक रोजगार नहीं मुहैया कराया जा सकता. ग्रामीण क्षेत्र से संबंधित उद्योग-धंधों को बढ़ावा देना होगा. इसमें फूड प्रोसेसिंग सेक्टर की अहम भूमिका हो सकती है. इसमें छोटे-छोटे उद्यमों को शुरू करने की अपार संभावनाएं हैं. इससे ग्रामीण सेक्टर में रोजगार पैदा होगा. औद्योगिकरण को विकेंद्रित करना होगा, ताकि वहां तक ग्रामीण आबादी की पहुंच भी कायम हो सके. अन्यथा ग्रामीण समस्या जस-की-तस बनी रहेगी. इसके लिए सबसे जरूरी है, ग्रामीण इलाकें में नॉन-फार्मिंग सेक्टर को बढ़ावा देना. ग्रामीण इलाकों से जुड़े छोटे-छोटे उद्योगों को फैलाना होगा. तभी रोजगार बढ़ेंगे.
बीते दो-तीन दशकों में देशभर में बड़े शहरों को विकसित करने और वहां उद्योग-धंधों को फैलाने के क्रम में ग्रामीण इलाकों में छोटे उद्योगों की व्यापक तौर पर अनदेखी की गयी. ग्रामीण आबादी को शहरों के कारोबार से जोड़े बिना गांवों का समग्र विकास नहीं किया जा सकता. केवल स्मार्ट सिटी से समग्र विकास नहीं होगा.
सभी को आप उसमें रोजगार नहीं दे सकते. गांव आधारित छोटे उद्यमों से भी लोगों को जोड़ना होगा, तब जाकर समाज और देश का समग्र विकास मुमकिन होगा, अन्यथा सरकार के निवेश का अपेक्षित नतीजा नहीं आ सकता. इसके लिए खेती के साथ-साथ उससे जुड़ी हुई गतिविधियों, जैसे डेरी सेक्टर, मछली पालन, मुर्गी पालन, मधुमक्खी पालन आदि को भी आपस में जोड़ना होगा और उसे बढ़ावा देना होगा. इससे रोजगार को बढ़ाने में मदद मिलेगी.
मनरेगा की व्यवस्था लगातार बेहतर बन रही है. अब तक इसके माध्यम से ग्रामीण इलाके में सामुदायिक ढांचे को विकसित किया गया, कुछ सामूहिक संपदा का निर्माण किया गया. अब इसके जरिये इन कॉमन संपदा का रखरखाव पर खर्च किया जायेगा. शुरू में मनरेगा का मकसद विकास से अधिक लोगों को रोजगार मुहैया कराना था. लेकिन अब इसका मकसद विस्तृत किया जायेगा. अनेक राज्यों में इसका बहुत ही अच्छा असर देखा गया है.
जहां तक किसानों की आमदनी को वर्ष 2022 तक दोगुना करने की बात है, तो इससे पहले भी 2002-03 और 2011-12 के आसपास कुछ इस तरह की कवायद की गयी थी. लेकिन उसके अपेक्षित नतीजे नहीं आये. इस दिशा में पहले की कमियों को समझते हुए नये तरीके से आगे बढ़ना होगा. बहुत सी चीजों पर इसमें काम हो भी रहा है, जिससे लग रहा है कि इस लक्ष्य को हासिल करना बहुत मुश्किल नहीं होना चाहिए.
(कन्हैया झा से बातचीत पर आधारित)
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