जमीता ने कायम की मिसाल
Updated at : 01 Feb 2018 6:51 AM (IST)
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शफक महजबीन टिप्पणीकार भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा है कि ‘किसी भी देश की हालत के बारे में जानना हो, तो उस देश की औरतों की हालत का अंदाजा लगाकर जाना जा सकता है.’ यानी इस कथन का अर्थ यह है कि सिर्फ पुरुषों के विकास कर लेने भर से ही […]
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शफक महजबीन
टिप्पणीकार
भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा है कि ‘किसी भी देश की हालत के बारे में जानना हो, तो उस देश की औरतों की हालत का अंदाजा लगाकर जाना जा सकता है.’ यानी इस कथन का अर्थ यह है कि सिर्फ पुरुषों के विकास कर लेने भर से ही समाज विकसित नहीं हो जाता. देश की तरक्की के लिए औरतों की बराबर हिस्सेदारी भी बहुत जरूरी है.
सदियों से ही पुरुष खुद को समाज रूपी भवन के मजबूत खंभे और औरतों को फर्श समझते आ रहे हैं.ऐसी मानसिकता के चलते औरतें हमेशा से ही पुरुषों पर निर्भर रही हैं. वे अपनी मर्जी से कोई फैसले नहीं ले सकती थीं. लेकिन अब वक्त बदल चुका है. अब औरतें किसी मामले में भी पुरुषों से कमतर नहीं हैं. औरतें अब उन सारी बंदिशों को तोड़ रही हैं, जो उनकी तरक्की में रुकावट की वजह हैं. आज वे हर क्षेत्र में बेहतर काम कर रही हैं और कामयाबी के झंडे गाड़ रही हैं.
ऐसी ही एक मिसाल हैं केरल की जमीता. पिछले दिनों केरल के मलप्पुरम जिले में ‘कुरान सुन्नत सोसाइटी’ की महासचिव जमीता ने अपनी इमामत में 80 लोगों को जुमे की नमाज अदा करायी, जिसमें औरत और मर्द दोनों शामिल थे. इस तरह जमीता भारत की पहली महिला इमाम बन गयी हैं. जमीता की इमामत पर कुछ उलेमाओं ने विरोध जताया है.
दारुल उलूम का कहना है कि जुमे की नमाज औरतों पर वाजिब नहीं है, और मर्दों की नमाज औरतों की इमामत में नहीं हो सकती. जबकि, इस्लाम में मर्द और औरत के हुकूक बराबर हैं. हालांकि, औरतों के परदे को ध्यान में रखते हुए कुरान में औरत पर जुमे और ईद की नमाजें वाजिब नहीं हैं, क्योंकि इन नमाजों को जमात के साथ ही अदा किया जा सकता है.
लेकिन, अगर औरतें यह नमाज पढ़ना चाहें, तो पढ़ भी सकती हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि कुरान की इस बात को उलेमा कैसे झुठला सकते हैं.
जमीता द्वारा की गयी इमामत की यह पहल काबिले तारीफ है. विडंबना है कि इसके लिए कुछ कट्टरपंथियों ने जमीता को जान से मारने की धमकी दी है. फिर भी जमीता अपने फैसले पर अडिग हैं. इस्लाम यह इजाजत नहीं देता कि कोई इंसान किसी की जान ले. क्योंकि जान लेने और जिंदगी देने का काम सिर्फ अल्लाह का है. कट्टरपंथी उलेमाओं को यह सोचना चाहिए कि नमाज के लिए नीयत का दारोमदार इमाम पर नहीं, बल्कि नमाजी पर होता है.
अपनी नियत के साथ नमाजी किसी के भी पीछे नमाज पढ़ सकता है.जमीता के इस फैसले से आज की लड़कियों में हौसला आफजाई होगी. न जाने कितनी ही लड़कियों और औरतों की इमाम बनने की चाहत होगी, उनका ख्वाब होगा. अब वे जमीता को नजीर मानकर अपने ख्वाब पूरे कर सकेंगी. जमीता महिलाओं के लिए बनायी गयीं कुरीतियों का भी विरोध करती रही हैं. इसलिए देश की मुस्लिम औरतों और लड़कियों के लिए जमीता प्रेरणा की स्रोत हैं और उम्दा मिसाल हैं.
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