ब्रिक्स से उम्मीदें

Updated at : 05 Sep 2017 6:33 AM (IST)
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ब्रिक्स से उम्मीदें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चीन पहुंचने के चार घंटे पहले यह बात साफ हो गयी थी कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत के पास पाने के लिए बहुत कुछ है और खोने के लिए कुछ नहीं. चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बतौर मेजबान अपने भाषण में संकेत कर दिया था कि सम्मेलन को द्विपक्षीय विवादों […]

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चीन पहुंचने के चार घंटे पहले यह बात साफ हो गयी थी कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत के पास पाने के लिए बहुत कुछ है और खोने के लिए कुछ नहीं.
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बतौर मेजबान अपने भाषण में संकेत कर दिया था कि सम्मेलन को द्विपक्षीय विवादों से दूर रखा जायेगा और मुख्य एजेंडा शांति और सहयोग पर केंद्रित रहेगा. उन्होंने स्पष्ट कहा कि ब्रिक्स देश एक-दूसरे के साथ बराबरी का व्यवहार करें, आपसी सहयोग करें और ऐसा करते हुए पूरी दुनिया की भलाई को ध्यान में रखें. आर्थिक विस्तारवाद की राह पर धौंसपट्टी से काम लेनेवाले चीन के राष्ट्राध्यक्ष का यह कथन स्वयं में सुलह का संकेत है.
डोकलाम के मुद्दे पर चली तनातनी के परिप्रेक्ष्य में देखें तो राष्ट्रपति का यह कहना बड़ा मानीखेज है कि दुनिया शांति और सहयोग की अपेक्षा रखती है, संघर्ष और टकराव की नहीं. चीन पहुंचकर प्रधानमंत्री मोदी ने भी आगे की बातचीत के लिए अपनी तरफ से बुनियाद तैयार करते हुए जोर विकास-केंद्रित प्राथमिकताओं पर दिया. एशिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के अगुआ अगर पारस्परिक मतभेदों को भुलाकर एक बड़े आर्थिक मंच से पारस्परिक सहयोग की भाषा बोल रहे हैं, तो इसकी एक बड़ी वजह वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में खोजी जानी चाहिए.
भारत और चीन इस बात से आगाह हैं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था फिलहाल मंदी जैसी हालत में है और इससे उबरने के लिए अमेरिका तथा यूरोप के कई देश संरक्षणवादी नीतियां अपना रहे हैं. लेकिन, भारत तथा चीन जैसों देशों के आर्थिक विकास के लिए बहुत जरूरी है कि निवेश, उत्पादन और खपत की बढ़त जारी रहे और यह तभी संभव है, जब अर्थव्यवस्था में ज्यादा से ज्यादा खुलापन रहे.
यूरोप के देशों और अमेरिका की संरक्षणवादी नीतियों की तरफ मुड़ने के बाद ब्रिक्स देशों के पास अवसर है कि वे आपसी सहयोग के आधार पर खुद को वैश्विक अर्थव्यवस्था की चालक-शक्ति के रूप में स्थापित करें.
मौजूदा आर्थिक परिदृश्य और आपसी सहयोग में निहित संभावनाओं को देखने के कारण मेजबान चीन और मेहमान भारत ब्रिक्स के मंच पर निश्चित ही आपसी सहयोग की एक नयी राह तलाश सकेंगे.
जून में कजाकिस्तान में शंघाई कोऑपरेशन आर्गेनाइजेशन की बैठक के सिलसिले में प्रधानमंत्री मोदी की चीनी राष्ट्रपति से मुलाकात हुई थी. तब से कई मुद्दों पर दोनों देशों के बीच तल्खी का माहौल बना चला आ रहा था. उम्मीद की जानी चाहिए कि ब्रिक्स सम्मेलन के अवसर पर भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों में भी नये सिरे से मिठास घुलेगी.
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