हकीकत बनें नीतियां

Updated at : 29 Aug 2017 6:29 AM (IST)
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हकीकत बनें नीतियां

विकास का रोडमैप पेश करते हुए नीति आयोग ने अप्रैल में माना था कि अगले 15 सालों में आर्थिक वृद्धि दर आठ फीसदी की रहेगी. चार महीने बाद आयोग की त्रिवर्षीय कार्य-योजना आयी है. नीति आयोग के नये उपाध्यक्ष के रूप में राजीव कुमार सितंबर में कार्यभार संभालेंगे. कार्य-योजना पुराने उपाध्यक्ष के समय में बनी […]

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विकास का रोडमैप पेश करते हुए नीति आयोग ने अप्रैल में माना था कि अगले 15 सालों में आर्थिक वृद्धि दर आठ फीसदी की रहेगी. चार महीने बाद आयोग की त्रिवर्षीय कार्य-योजना आयी है. नीति आयोग के नये उपाध्यक्ष के रूप में राजीव कुमार सितंबर में कार्यभार संभालेंगे.
कार्य-योजना पुराने उपाध्यक्ष के समय में बनी और जारी होने के बावजूद राजीव कुमार के आर्थिक चिंतन के अनुकूल है. पिछले साल मोदी सरकार की चुनौतियों पर जारी एक दस्तावेज में कुमार ने सलाह दी थी कि आंकड़ों के सहारे दावे जो भी किये जायें, सच यह है कि अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों में उत्पादन या तो नीचे गिर रहा है या उसमें ठहराव आया है तथा ग्रामीण-संकट बढ़ता जा रहा है.
ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह अपनी आर्थिक उपलब्धियों पर ज्यादा जोर न देते हुए रोजगार बढ़ाने के उपाय पर ध्यान दे. दस्तावेज में कहा गया है कि भारत की बड़ी समस्या बेरोजगारी से ज्यादा अर्द्ध-बेरोजगारी की है. ऐसे लोगों की तादाद बहुत ज्यादा है, जिन्हें साल में सब दिन काम नहीं मिल पाता. इसे ध्यान में रखते हुए उच्च उत्पादकता और ज्यादा वेतन के रोजगार तैयार करने और घरेलू उत्पादन पर जोर देने की नीति की पैरोकारी की गयी है.
चीन, ताइवान, सिंगापुर जैसी अर्थव्यवस्थाओं की नजीर दी गयी है, लेकिन यह साफ नहीं है कि उच्च उत्पादकता के लिहाज से जरूरी मशीनीकरण और डिजिटलाइजेशन के कारण उत्पन्न बेरोजगारी की स्थितियों से कैसे निपटा जायेगा. यह भी कहा गया है कि श्रम-संबंधी नये कानूनों की जरूरत है. मौजूदा कानूनों को खत्म करने या उन्हें समेकित करने से विशेष लाभ नहीं होगा, क्योंकि इन कानूनों का रिश्ता ऐतिहासिक रूप से कम पारिश्रमिक और कम उत्पादन के ढांचे से रहा है.
कार्य-योजना में सामाजिक क्षेत्र (आवास, चिकित्सा, शिक्षा आदि) पर होनेवाले व्यय को बढ़ाने का सुझाव है और बुनियादी ढांचे पर निवेश के साथ ग्रामीण विकास पर जोर देने की बात भी की गयी है. कार्य-योजना का जोर इस बात पर भी है कि केंद्र और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराये जायें और बजट-प्रावधान एक साल की प्राथमिकताओं को देखकर नहीं, बल्कि बहुआयामी संभावनाओं को सोचकर किया जाये, ताकि विकास संबंधी कार्यों में बाधा न आये.
कार्य-योजना के कुछ सुझाव संविधान और कानून में परिवर्तन की मांग करते हैं. आगे आनेवाले वक्त में यह साफ होगा कि सरकार नीति आयोग की त्रिवर्षीय कार्ययोजना की बातों को किस हद तक स्वीकार करती है, लेकिन इतनी उम्मीद जरूर की जा सकती है कि रोजगार बढ़ाने और अर्थव्यवस्था को पटरी पर रखने से संबंधित सुझावों पर सरकार गंभीरता से विचार करेगी तथा उचित पहल करेगी.
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