एक थे किसान बाबा

Updated at : 29 Aug 2017 6:29 AM (IST)
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एक थे किसान बाबा

मिथिलेश कु. राय युवा रचनाकार बाबा को जादू करते हुए किसी ने नहीं देखा था. लेकिन, सबको उनका व्यक्तित्व एक जादू की तरह ही लगता था. मुसीबत में पड़े आदमी बाबा के यहां जाते, तो खाली हाथ नहीं लौटते. बाबा बिना किसी शर्त लोगों की मदद किया करते थे. बाबा देते और भूल जाते. किसान […]

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मिथिलेश कु. राय
युवा रचनाकार
बाबा को जादू करते हुए किसी ने नहीं देखा था. लेकिन, सबको उनका व्यक्तित्व एक जादू की तरह ही लगता था. मुसीबत में पड़े आदमी बाबा के यहां जाते, तो खाली हाथ नहीं लौटते. बाबा बिना किसी शर्त लोगों की मदद किया करते थे. बाबा देते और भूल जाते. किसान बाबा कोई महाजन नहीं थे कि बही-खाते रखते. लेकिन, कुछ लोगों का कहना था कि बाबा नेकी कर दरिया में डाल वाली बात बराबर कहा करते थे.
लालपुर में वे बमबम बाबा के नाम से प्रसिद्ध थे. लोगों का कहना था कि बाबा रोग से आक्रांत लोगों को देखकर व्यथित हो जाते थे. परेशान होकर कोई उनके पास आता, तो वे अलहदा तरीके से उनका उपचार किया करते थे. लोग ठीक हो जाते थे, लेकिन चिकित्सा की वो पद्धति किसी की समझ में नहीं आती थी. बाद में बाबा ने स्थायी समाधान के उद्देश्य से गांव में योग का एक केंद्र बनाया. जहां रविवार को बाबा रोग के कारणों और उनके निवारण पर प्रकाश डालते थे.
लोग कहते थे कि किसान बाबा के पास योग की शक्तियां थीं. उनकी उम्र के बारे में ठीक-ठीक अनुमान किसी को नहीं था. अरसे से बाबा ज्यों के त्यों ही नजर आ रहे थे. कुछ लोगों का तो यह भी कहना था कि पता नहीं कैसे पर बाबा ने उम्र को अपनी मुट्ठी में कर लिया था. बाबा का व्यक्तित्व गांव वालों के लिए हैरत की बात थी. बाबा से कम उम्र के बूढ़े बिस्तर पकड़ लिये थे या लाठी के सहारे चल रहे थे. लेकिन, बाबा सवेरे कुदाली लेकर खेतों की ओर चल देते थे. शाम होती थी, तो वे अपनी साइकिल उठाकर बाजार की ओर निकल जाते थे.
बाबा बुजुर्गों को जितना सम्मान देते थे, उतना ही वे बच्चों से भी प्यार करते थे. बाबा असल में गृहस्थ थे. चार बेटे एक बेटी से भरा-पुरा परिवार था उनका. कुछ बीघे की खेती थी. बाबा पौधे लगाने के शौकीन थे. वे तरह-तरह के पौधे लाकर लगाया करते थे. वे लोगों से प्राय: कहा करते थे कि यह धरती वृक्षों के सहारे ही मनुष्यों को जीने का वातावरण मुहैया कराती है.
बाबा समय-समय पर गांव से बाहर निकल जाते. दस-पंद्रह दिन बाद लौटते. लोगों का कहना था कि बाबा के अनुयायी दूर-दूर तक फैले हुए थे. तब फोन का जमाना नहीं था. चिट्ठी आती थी. बाबा भी चिट्ठी लिखा करते थे.
लेकिन बाबा के ज्ञान और शिक्षा में कोई समानता नहीं थी. बाबा धोती और हाफ कुर्ता पहनते थे. कंधे पर अंगोछा. पैरों में हवाई चप्पल. बाबा योग के अच्छे जानकार थे और उन्होंने ध्यान की कला में निपुणता हासिल कर ली थी.
सौ से अधिक की उम्र में बाबा साइकिल चलाते और कुदाल से खेतों की मेड़ छांटते एक दिन बाबा ने कहा कि अब हम चलते हैं और वे चले गये.
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