धन में बाबा, गन में बाबा

Updated at : 28 Aug 2017 6:46 AM (IST)
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धन में बाबा, गन में बाबा

आलोक पुराणिक वरिष्ठ व्यंग्यकार देश का सबसे कमाऊ धंधा-इस विषय पर निबंध प्रतियोगिता का आयोजन हुआ. प्रथम पुरस्कार विजेता निबंध इस प्रकार है- पुराने वक्त में हर बंदे का धंधा निर्धारित होता था कि वह यह काम करेगा, वह यह काम करेगा. कोई भजन पूजा करता था, कोई दाल आटा बेचता था. कोई अचार पापड़ […]

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आलोक पुराणिक
वरिष्ठ व्यंग्यकार
देश का सबसे कमाऊ धंधा-इस विषय पर निबंध प्रतियोगिता का आयोजन हुआ. प्रथम पुरस्कार विजेता निबंध इस प्रकार है- पुराने वक्त में हर बंदे का धंधा निर्धारित होता था कि वह यह काम करेगा, वह यह काम करेगा. कोई भजन पूजा करता था, कोई दाल आटा बेचता था. कोई अचार पापड़ बेचता था. कोई मनोरंनार्थ नाट्य आदि गतिविधियों में लगता था. कालांतर में देखा यह गया कि बाकी लोग अपने अपने धंधों में लगे रहे. पर बाबा लोग हर काम करने लगे. बाबा दाल आटा भी बेचने लगे, अचार पापड़ भी. फिल्म वगैरह भी बाबा बनाने लगे और टीवी कार्यक्रमों में भी बाबा डांस-धमाल मचाने लगे.
बाबा हर काम करने लगे. मोह माया से दूर रहने का मंत्र देनेवाले बाबा हर जगह दीखने लगे. धन में बाबा, गन में बाबा. धंधे से धन कमाया. धन को बचाने के लिए कमांडो बनाये. कमांडो के लिए गन का जुगाड़ किया. अकेले दम बाबा सबके धंधों पर जमकर बैठ गये.
इस तरह से हमने देखा कि सबसे ज्यादा कमाई का धंधा बाबागिरी ही हो गया. बाबागिरी मूलत: तीन स्तर की होती है- एक बाबागिरी का कुटीर उद्योग, दूसरे मंझोले स्तर के बाबा और तीसरे स्तर पर काॅरपोरेट बाबा. बाबागिरी का ऐसा जोर चला कि कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मन भी होने लगा कि चलो बाबागिरी की भी एक कंपनी डाल ली जाये.
पर यह आसान नहीं हुआ. बाबागिरी योग सिखाता हुआ बाबा तो जब चाहे टूथपेस्ट के धंधे में उतर सकता था, पर टूथपेस्ट बेचती कोई कंपनी जब चाहे प्राणायाम सिखाने ना उतर सकती थी. इस चक्कर में हुआ यूं टूथपेस्ट कंपनी अपने ब्रांड का प्राणायाम बाजार में ना उतार पायी पर बाबा ने अपने टूथपेस्ट बाजार में उतार दिये. इससे यह भी साफ हुआ कि बाबा जो चाहे धंधा कर सकता है, पर बाकियों को यह छूट हासिल नहीं है.
बाबागिरी के कुटीर उद्योग वाले सौतन से मुक्ति, सुंदरी वशीकरण, जादू-टोना उतारनेवाले काम भर करते हैं. थोड़े उन्नत किस्म के बाबा विदेश यात्रा, नौकरी में उन्नति आदि का जुगाड़ भी करते हैं.
काॅरपोरेट लेवल के बाबा तो हर काम हाथ में ले लेते हैं. वोट दिलवाने से लेकर किसी नये प्रोजेक्ट में नोट दिलवाने तक के काम काॅरपोरेट बाबाओं के पास आते हैं. बाबागिरी के धंधे में एक खास बात है.
आम तौर पर अगर किसी धंधे में कस्टमर को वादे के मुताबिक परिणाम नहीं मिलते हैं, तो वह कस्टमर कंजूमर फोरम में जा सकता है. पर बाबागिरी के कस्टमर के साथ फायदा यह है कि इस धंधे में वादे के मुताबिक रिजल्ट ना आने पर कंजूमर किसी कंजूमर फोरम में ना जाकर किसी और दूसरे बाबा के पास चला जाता है. यानी बाबागिरी का धंधा कंजूमर फोरम से कतई मुक्त है. इसलिए यह भरपूर फल-फूल रहा है.
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