स्त्री शक्ति की नयी ‘ईद’
Updated at : 25 Aug 2017 12:32 PM (IST)
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तीन तलाक की प्रथा का अंत कर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने विश्व में भारतीय मुस्लिम महिलाओं की शक्ति को ही रेखांकित नहीं किया, बल्कि करोड़ों भारतीय स्त्रियों को नवीन शक्ति दी. जिन मुस्लिम महिलाओं पर सारी जिंदगी ट्विटर, फेसबुक, फोन, पोस्टकार्ड या इमेल पर ‘तलाक-तलाक-तलाक’ के शब्दों की क्रूर तलवार लटकती रहती थी, जिस […]
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तीन तलाक की प्रथा का अंत कर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने विश्व में भारतीय मुस्लिम महिलाओं की शक्ति को ही रेखांकित नहीं किया, बल्कि करोड़ों भारतीय स्त्रियों को नवीन शक्ति दी. जिन मुस्लिम महिलाओं पर सारी जिंदगी ट्विटर, फेसबुक, फोन, पोस्टकार्ड या इमेल पर ‘तलाक-तलाक-तलाक’ के शब्दों की क्रूर तलवार लटकती रहती थी, जिस प्रथा को इस्लाम का समर्थन नहीं था, जिसे अधिकांश मुस्लिम देश पहले ही प्रतिबंधित कर चुके हैं, उसे भारत में समाप्त करने में इतना लंबा समय क्यों लगा?
अप्रैल में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी, भुवनेश्वर में स्पष्ट तौर पर सबको समानता का अधिकार देने की बात कही गयी और स्वयं मोदी जी ने कहा कि बदलाव समझाने की पद्धति और विधि के अनुसार होगा. इस पर मुस्लिम उलेमाओं तथा पर्सनल बोर्ड ने खुलकर तलाक समाप्त करने की पहल लेने के बजाय अजीबोगरीब ढीला रवैया अपनाया. वे चाहते तो मुस्लिम समाज में नये बदलाव का नेतृत्व अपने हाथों में लेकर समाज में नयी स्फूर्ति भर सकते थे और अपने नेतृत्व को समय-सम्मत, काल-सापेक्ष एवं मनुष्यता के प्रति संवेदनशल सिद्ध कर सकते थे. मुस्लिम नेताओं ने यह सुनहरा मौका खो दिया और भारत का सर्वोच्च न्यायालय इस परिवर्तन का सूत्रधार बना.
वास्तव में उत्तर प्रदेश चुनावों से पूर्व ही तीन बार तलाक के विरुद्ध आवाजें उठनी शुरू हो गयी थीं. अनेक मुस्लिम महिलाएं खुलकर एवं अपने समाज के कड़े मजहबी शिकंजों को तोड़कर सामने आयीं, संगठन बनाये, अपनी आपबीती सुनायी और एक ताजगी भरा जागरण दिखायी देने लगा. उत्तर प्रदेश चुनावों में इन मुस्लिम महिलाओं ने बड़ी संख्या में नरेंद्र मोदी के पक्ष में मत दिये, ऐसे भी समाचार-विश्लेषण सामने आये. मुस्लिम स्त्रियों की इस एकजुटता ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को हिला दिया. पहली बार उसने तीन तलाक को अमान्य करने की तरफ हिचकिचाहट के साथ कदम बढ़ाया और कहा कि ऐसा करनेवालों का सामाजिक बहिष्कार किया जाना चाहिए. पर कौन इसे लागू करवायेगा? कैसे तय किया जायेगा कि किसी पुरुष का ‘तीन बार तलाक’ कहना अनुचित था और किसका ‘उचित’ था?
तीन बार तलाक कहकर अपनी ब्याहता पत्नी और बच्चों का जीवन नरक बनानेवाली प्रथा का अंत करने के लिए किसी कृत्रिम दलील की जरूरत नहीं. अगर पाकिस्तान और अन्य मुस्लिम देशों ने यह प्रथा खत्म न भी की होती, यदि कुरान और हदीस में चौदह सौ साल पहले इसका कहीं उल्लेख होता भी, तो भी समय की मांग और मनुष्यता के सरोकार को देखते हुए नयी उम्र की नयी आवश्यकताओं के अनुसार तीन तलाक प्रथा का अंत किया जाना उचित होता.
इसके लिए सबसे उपयुक्त एवं सार्थक कहा जानेवाला देश भारत ही हो सकता था. भारत में, बल्कि संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लाम का स्वरूप विश्व में मिलनेवाले इस्लाम से भिन्न है. दरगाहें, वहां चढ़नेवाली चादरें, फूल, इलायचीदाना, लाल झंडे, मन्नतें, कव्वालियों, गीत-संगीत- ये सब कहां और किस देश के इस्लाम में मिलेगा? यह केवल और केवल भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में इस्लामी समाज में मिलता है. बाकी जगहों पर इन सबको कुफ्र कहा जाता है. यह सहअस्तित्व और साझेदारी हिंदू-मुस्लिम मन तथा हिंदू परंपराओं के सम्मान का प्रतिनिधित्व करती हैं.
अगर किसी को आवाज उठानी चाहिए थी, तो वे भारतीय मुसलमान ही हो सकते थे. विडंबना यह है कि अतिरेकी मानस के शिकंजे में ग्रस्त पाकिस्तान के मुस्लिम सुधारों की ज्यादा आवाज उठाते दिखते हैं, बनिस्बत भारतीय मुसलमानों के. 1966 में महाराष्ट्र के प्रसिद्ध समाजवादी नेता हामिद दलवाई ने मुस्लिम समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठायी तथा 18 अप्रैल, 1966 को ‘तीन तलाक से ग्रस्त’ सात मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व में महाराष्ट्र विधानसभा, मंत्रालय के समक्ष प्रदर्शन किया. मुस्लिम उलेमा हैरत में पड़ गये, लेकिन हिंदू-सेकुलरों ने मुस्लिम कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेक दिये. सवाल यह है कि विद्वान एवं धार्मिक हामिद दलवाई मुसलमानों के नेता के नाते स्वीकार क्यों नहीं हुए और मुस्लिम नेतृत्व जहर उगलनेवाले, स्त्रियों का दमन करनेवाले लोगों के हाथों में क्यों सिमटा रहा?
अब भी इन सुधारों के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं. मुस्लिम नेतृत्व को भय सता रहा है कि वे समाज के लिए संदर्भहीन होते चले जायेंगे, तो उनको पूछेगा कौन? यदि सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले से जड़बद्ध मुस्लिम समाज में व्याप्त कुरीतियां दूर होने लगीं और परिवर्तन आने लगा, तो उनका वर्चस्व समाप्त हो जायेगा.
गरीबी, अशिक्षा, पिछड़ापन और सामाजिक बुराइयां न हिंदू होती हैं, न मुसलमान. समाज को आगे बढ़ना है तो सामूहिकता से इसके खिलाफ लड़ना ही होगा. हिंदू समाज की प्रगति का कारण यही है कि उसने नवीन परिवर्तनों काे अंगीकार किया. मुस्लिम समाज को तीन तलाक से मुक्ति का फैसला एक नये जागरण पर्व तथा स्त्री शक्ति की नयी ‘ईद’ के रूप में मनाना चाहिए.
तरुण विजय
पूर्व सांसद, भाजपा
tarunvijay55555@gmail.com
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