बंदूक के बदलते कंधे

Updated at : 24 Aug 2017 6:22 AM (IST)
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बंदूक के बदलते कंधे

मनोज श्रीवास्तव टिप्पणीकार कितना डरते हैं हम! खासकर धारा के विरुद्ध चलने में. और यदि धारा समाज या धर्म की हो, तो फिर बहुत ही मुश्किल है कि कोई आगे आये और आंदोलन करे या जन-जागरण करे. हमारी कमजोरी है कि हम सबकुछ बन सकते हैं, पर समाज की निगाहों में बुरा नहीं बन सकते. […]

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मनोज श्रीवास्तव

टिप्पणीकार

कितना डरते हैं हम! खासकर धारा के विरुद्ध चलने में. और यदि धारा समाज या धर्म की हो, तो फिर बहुत ही मुश्किल है कि कोई आगे आये और आंदोलन करे या जन-जागरण करे. हमारी कमजोरी है कि हम सबकुछ बन सकते हैं, पर समाज की निगाहों में बुरा नहीं बन सकते.

यही हाल हालिया तीन तलाक मामले में भी रहा, जिसमें भी चाह यही रही है कि बुरा बने बगैर ही न्यायालय से काम हो जाये. दरअसल, हम आदतन या परंपरागत रूप से कुरीतियों को रोकने के लिए सीधे टकराव से बचकर अपने बीच से किसी पढ़े-लिखे को पकड़ते हैं, ताकि बुराई का ठीकरा उसके सिर पर फोड़ा जा-सके. इसी तरह बीते समय अंग्रेजों का इसके लिए बहुत उपयोग किया गया है. कई सुधार कानून बनाने में अंग्रेजों के कंधों पर बंदूक रखने की तरह प्रयोग हुए हैं, जो कानून आजतक उपयोग में हैं.

जब गुलाम भारत में एक से बढ़कर एक जननेता थे, तब उन्हें समाज सुधार के लिए अंग्रेजों के कांधे की जरूरत क्यों पड़ी, जबकि वे चाहते तो खुद जनता के बीच जनजागरण चलाते, धरना-प्रदर्शन करते या पदयात्रा करते.

वे चाहते तो क्या नहीं हो सकता था, लेकिन उन्हें भी कानून बनवाना पड़ा. इसका कारण है कि वे सभी दृश्य-अदृश्य नेता भी हमारे समाज से सीधे टकराने का साहस नहीं कर पाये.

आज भी पक्ष-विपक्ष में कोई जन नेता अपने सिर पर जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है.

समाजिक कुरीतियों के खिलाफ देशव्यापी जनजागरण या आंदोलन के लिए कोई शीर्ष स्तर से लड़ाई छेड़ने को तैयार नहीं होगा. सुधारों के लिए पहले अंग्रेजों का उपयोग होता रहा, जो एक तरह से हमारे बीच असामाजिक थे, क्योंकि उन्हें देश और प्रजा का छोर नहीं पता था.

लेकिन, बुराई से बचने के लिए उस समय के लोगों ने उन्हें आगे करके कानून बनवा लिये. इसी तरह अब अंग्रेजों की जगह जजों को आगे करने की प्रथा चली है. जजों से आशा की जाती है कि वे सारी बुराई अपने सिर बांध ले. जबकि होना यह चाहिए की पक्ष-विपक्ष के सभी छोटे-बड़े नेता अपने-अपने क्षेत्र में समाज के सभी वर्गों में फैली कुरीतियों के खिलाफ जनजागरण चलाये और कुरीतियों के पक्षधर तत्वों के खिलाफ सामाजिक विरोध दर्ज कराये.

धारा के विरुद्ध चलने और सीधे टकराने के हौसले दिखाये जाने चाहिए, न कि बंदूक रखने के लिए बदलते कांधे ढूंढने चाहिए. नहीं तो बस थोड़ी-बहुत हलचल होगी या सिर्फ महानगरों में सुधार की खबरें नजीर बनकर सफल सिद्ध होगी, हालत नहीं बदलेगी. आजाद भारत में पक्ष-विपक्ष के ऊपर से लेकर नीचे मोहल्ले के नेता-कार्यकर्ता को जनसेवा की प्रतिबद्धता खुद पूरी करनी होगी, न कि न्यायालय को.

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