डेटा सुरक्षा का सवाल

Updated at : 10 Aug 2017 6:23 AM (IST)
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डेटा सुरक्षा का सवाल

व्यापारिक दायरों में माना जा रहा है कि 21वीं सदी की डिजिटल होती दुनिया में आंकड़ों (डेटा) की वही अहमियत है, जो पिछली सदी में कच्चे तेल की थी. यह सोच सूचना-प्रौद्योगिकी के तीव्रतर विकास से जुड़ी संभावनाओं का संकेत करती है, तो आशंकाओं का भी. खुलेपन की पैरोकारी पर टिकी अर्थव्यवस्था के बारे में […]

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व्यापारिक दायरों में माना जा रहा है कि 21वीं सदी की डिजिटल होती दुनिया में आंकड़ों (डेटा) की वही अहमियत है, जो पिछली सदी में कच्चे तेल की थी. यह सोच सूचना-प्रौद्योगिकी के तीव्रतर विकास से जुड़ी संभावनाओं का संकेत करती है, तो आशंकाओं का भी.
खुलेपन की पैरोकारी पर टिकी अर्थव्यवस्था के बारे में कहा जाता है कि उसमें ग्राहक ही राजा होता है और इसी तर्क से ग्राहक की रुचि, जरूरत, खर्च करने की क्षमता तथा इच्छित उत्पाद को हासिल करने की सहूलियत आदि को ध्यान में रख कर बाजार का विस्तार किया जाता है. इसकी जरूरी शर्त है कि उत्पादक और वितरक के पास ग्राहक से संबंधित सूचनाओं का भंडार मौजूद हो. अगर किसी व्यक्ति के बारे में पता हो कि वह किसी धनी बस्ती में रहता है, तो उसके स्मार्टफोन पर आप कोई कंपनी शेयर बाजार में निवेश से संबंधित सूचना भेज कर मान सकती है कि उसने अपना एक भावी ग्राहक तलाशने की दिशा में काम किया है.
लेकिन जैसे कच्चे तेल के इस्तेमाल ने औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया और औद्योगीकरण ने अपना बाजार तलाशने के क्रम में उपनिवेश बसाये, उसी तरह डेटा के संग्रह और इस्तेमाल को लेकर पर्याप्त अंकुश न हो, तो एक किस्म का उपनिवेशवाद पनप सकता है. इसी कारण किसी व्यक्ति या समुदाय से संबंधित किस जानकारी का संग्रहण हो, उसका क्या इस्तेमाल हो और यह इस्तेमाल कौन करे- इसे लेकर नीति के स्तर पर स्पष्ट समझ होनी चाहिए, क्योंकि डेटा के संग्रह और इस्तेमाल से व्यक्ति की निजता यानी जीवन जीने की स्वतंत्रता का सवाल जुड़ा है.
इसी आशंका को स्वर देते हुए आधार-परियोजना के पूर्व मुखिया नंदन नीलेकणी ने कहा है कि डिजिटल डेटा के बारे में एक व्यापक नीतिबनायी जानी चाहिए, ताकि इस डेटा से जुड़े व्यक्ति की निजता का उल्लंघन न हो तथा उसका इस्तेमाल सिर्फ लोक-कल्याण के लिए किया जाये, न कि वैश्विक कंपनियों के फायदे के लिए. मुश्किल यह है कि सरकार ऐसी नीति बनाने को लेकर गंभीर नहीं है.
उसने सर्वोच्च न्यायालय में तर्क दिया है कि व्यक्ति की निजता बेशक एक अधिकार है, लेकिन अन्य बुनियादी अधिकारों की तरह नहीं. बहरहाल, वित्तीय लेन-देन से लेकर व्यक्ति की रोजमर्रा की आवाजाही तक पर नजर रखने सूचना-प्रौद्योगिकी की युक्तियों की मौजूदगी के बीच डेटा के संग्रह और इस्तेमाल को लेकर उठी आशंका को नकारना मुश्किल है और यह आशंका साइबर सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम की मांग करती है, जिसकी पहली शर्त है एक सुचिंतित नीति बनाना.
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