आधुनिक समाज में पिछड़ते आदिवासी
Updated at : 09 Aug 2017 6:33 AM (IST)
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आज ही के दिन 1994 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने प्रति वर्ष विश्व आदिवासी दिवस मनाने का फैसला लिया था. आदिवासी का अर्थ है मूल निवासी या वनवासी, जो सदियों से जंगल और जमीन को कृषि और रहने लायक बनाते आये हैं. लेकिन इस आदिवासी समाज को हमेशा उपेक्षा ही सहनी पड़ी है. संविधान के […]
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आज ही के दिन 1994 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने प्रति वर्ष विश्व आदिवासी दिवस मनाने का फैसला लिया था. आदिवासी का अर्थ है मूल निवासी या वनवासी, जो सदियों से जंगल और जमीन को कृषि और रहने लायक बनाते आये हैं. लेकिन इस आदिवासी समाज को हमेशा उपेक्षा ही सहनी पड़ी है.
संविधान के अनुसार राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का गठन भी किया गया है. पर, आज भी आदिवासी नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं. अशिक्षित होने की वजह से उनकी जमीन छीनी जा रही है, तो कई सरकारी योजनाओं का लाभ उन तक पहुंचता ही नहीं. जब तक सरकार इस ओर कोई सकरात्मक कदम नहीं उठायेगी, समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग पिछड़ेपन के अंधकार में खोता चला जायेगा.
कुंदन कुमार गोंझू, बुंडू, रांची
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