नीतीश को समझ लिया, समझो राजनीति समझ ली

-प्रेम कुमार- राहुल गांधी की नजर में नीतीश धोखेबाज हैं, तो लालू की नजर में हत्यारा. नरेंद्र मोदी की नजर में नीतीश भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में दलगत राजनीति से ऊपर उठे हुए नेता हैं, तो अपनी ही पार्टी के नेताओं की नजर में नीतीश गलत को बर्दाश्त नहीं करने वाले नेता. नीतीश क्या हैं? […]
-प्रेम कुमार-
राहुल गांधी की नजर में नीतीश धोखेबाज हैं, तो लालू की नजर में हत्यारा. नरेंद्र मोदी की नजर में नीतीश भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में दलगत राजनीति से ऊपर उठे हुए नेता हैं, तो अपनी ही पार्टी के नेताओं की नजर में नीतीश गलत को बर्दाश्त नहीं करने वाले नेता. नीतीश क्या हैं? नीतीश अवसरवादी हैं या यथार्थवादी, नीतीश सांप्रदायिकता विरोध की सियासत के पैरोकार हैं या भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस वाले नेता. अगर किसी ने नीतीश को समझ लिया, तो मानो भारतीय राजनीति को समझ लिया.
आ’राम’ की राजनीति है नीतीश की विशिष्टता
गैरकांग्रेसवाद के पुरोधा, संपूर्ण क्रांति के जनक जयप्रकाश नारायण के शिष्य के रूप में भी नीतीश की प्रतिष्ठा है. मगर, उन्होंने लालू सरीखे अपने गुरुभाइयों से अलग राजनीतिक परंपरा की लकीर खींचने वाले नेता के रूप में भी खुद को स्थापित किया है. नीतीश कुमार पर लालू का भी प्रभाव है, जो बिहार में सामाजिक न्याय के आंदोलन के अगुआ रहे हैं. उन पर रामविलास पासवान का भी असर है जो दलितों के एकछत्र नेता रहे हैं और नीतीश पर लालकृष्ण आडवाणी का भी प्रभाव है जिनकी नजर में नीतीश संभावनाओं से भरपूर नेता रहे हैं और जिन्होंने नीतीश को एक मुख्यमंत्री के तौर पर लालू प्रसाद के समांतर खिलने और बढ़ने का मौका दिया था. भारतीय राजनीति में ‘राम’ पर राजनीति का मतलब अयोध्या आंदोलन भी है और सामाजिक न्याय का संघर्ष भी. सही मायने में ‘राम’ पर राजनीति में संतुलन का पर्याय हैं नीतीश कुमार. इसे हम सुविधा के लिए आ’राम’ की राजनीति भी कह सकते हैं.
नीतीश मतलब कोई गैर नहीं, राजनीति जिसके बगैर नहीं
जॉर्ज फर्नांडीज़ की सियासत भी आप नीतीश में देख सकते हैं जिन्होंने हमेशा गैरकांग्रेसवाद का परचम लहराया, जब जरूरत पड़ी तो वाजपेयी के भी करीब हो लिये और उसी हिसाब से चंद्रशेखर के भी. गैरकांग्रेसवाद और गैरबीजेपीवाद के बीच जो राजनीति पनपी, उसके अग्रदूत हैं नीतीश, जिनके लिए न कांग्रेस गैर है, न बीजेपी गैर. बल्कि कहें कि बगैर कांग्रेस या बगैर बीजेपी जिनकी सियासत आगे बढ़ती ही नहीं है. इस राजनीति की खासियत है कि जब एक के साथ हों आप, तो दूसरे के खिलाफ भी हों. दोस्ताना विरोध नहीं, सैद्धांतिक आवरण में तगड़ा विरोध. वामपंथी दलों को तो नीतीश हमेशा मित्र ही कहते हैं. मगर, जब बीजेपी खेमे में होते हैं, तो इस मित्रता को भुला बैठते हैं, उन मित्रों को पहचानते तक नहीं. ये है नीतीश की गैर और बगैर की सियासत.
महागठबंधन की सोच को झटका लगा गये नीतीश
तीसरा मोर्चा यानी गैर बीजेपी-गैर कांग्रेस गठबंधन- जब काठ की हांडी बन गया, तो राजनीति का एक नया मंच बिहार की सियासत में पैदा हुआ- महागठबंधन. यह गैरबीजेपीवाद का ऐसा प्रयोग था जिसमें कांग्रेस अछूत नहीं थी, शामिल थी. जब पूरे देश में मोदी लहर के रूप में बीजेपी कांग्रेसमुक्त भारत का सपना सच करने में जुटी थी, महागठबंधन के रूप में गैरबीजेपीवाद की धारा को सुरक्षित नाव मिल गयी. यह प्रयोग राष्ट्रीय पैमाने पर आजमाने की हसरत लिये देश की राजनीति करवट ले रही थी, लेकिन नीतीश की आ’राम’ वाली सियासत ने इस हसरत को चकनाचूर कर दिया है. यही वो खीज है जिस वजह से राहुल गांधी ने नीतीश को धोखेबाज बताया है.
विरोध से घटता नहीं है नीतीश का कद
नीतीश कुमार को कोसने से कद नीतीश का घटता नहीं है, कद उनका ही घटता है जो उन्हें कोसते हैं. इसकी वजह ये है कि वही नेता इन्हीं नीतीश कुमार की तारीफ में कसीदे पढ़ते नहीं थकते, जब वक्त बदल जाता है. आज वही बीजेपी के नेता नीतीश को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाला, विकास का पर्याय बता रहे हैं जो कल तक नीतीश राज में कुशासन का झंडा बुलंद कर रहे थे. कोई ऐसा दल नहीं, जिसने नीतीश की तारीफ न की हो. इसी तरह कोई ऐसा दल नहीं, जिसने नीतीश को कोसा न हो. यह तारीफ और कोसना दरअसल दोनों नीतीश कुमार के लिए सम्मान का हार बन चुके हैं.
कोई जाति, धर्म, समुदाय नहीं रहता है नीतीश के खिलाफ
जाति, धर्म और समुदाय के स्तर पर भी कोई नीतीश कुमार को अपना दुश्मन नहीं मानता. इसकी वजह है कि लालू प्रसाद के साथ रहते हुए भी नीतीश कभी जातिवाद की राजनीति में नहीं उलझते. हां, जरूरत पड़ने पर मुस्लिमों को पुचकार जरूर देते हैं. पर मुस्लिमों को पुचकारने की उनकी नीति बीजेपी के साथ रहते हुए भी जारी रहती है जो उस वक्त ‘दबाव की राजनीति’ के नाम से पहचानी जाती है. जब नीतीश बीजेपी के साथ होते हैं तो कभी धार्मिक नजरिये से हिंदूवादी नहीं हो जाते. इसलिए नीतीश भारतीय राजनीति में इतनी आसानी से वैचारिक आधार भी बदलने में कामयाब रहते हैं लेकिन आधार में यह बदलाव उनके अपने विचारों को कभी नहीं बदलता. यह विचार विकास उन्मुख है, सबको साथ लेकर चलने वाला है, महिला समर्थक, सामाजिक बदलाव के लिए है.
(21 साल से प्रिंट व टीवी पत्रकारिता में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन prempu.kumar@gmail.com )
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