आपत्ति पलायन और शोषण पर होनी चाहिए, किताब से नहीं : सोवेंद्र शेखर

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आपत्ति पलायन और शोषण पर होनी चाहिए, किताब से नहीं : सोवेंद्र शेखर

साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता झारखंड के लेखक – साहित्यकार डॉक्टर हांसदासोवेंद्रशेखरकी किताब को लेकर इन दिनों सोशल मीडिया में बहस छिड़ी हुई है. साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उनके उपन्यास ‘सीमेन, सलाइवा,स्वेट, ब्लड’ की अश्लील भाषा पर उनका जबरदस्त विरोध किया है. उनके कहानी संग्रह ‘आदिवासी विल नॉट डांस’ पर भी गंभीर सवाल खड़े किये […]

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साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता झारखंड के लेखक – साहित्यकार डॉक्टर हांसदासोवेंद्रशेखरकी किताब को लेकर इन दिनों सोशल मीडिया में बहस छिड़ी हुई है. साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उनके उपन्यास ‘सीमेन, सलाइवा,स्वेट, ब्लड’ की अश्लील भाषा पर उनका जबरदस्त विरोध किया है. उनके कहानी संग्रह ‘आदिवासी विल नॉट डांस’ पर भी गंभीर सवाल खड़े किये गये हैं.’ खबर है कि आज शुक्रवार को किताब की प्रतियां जलाने कई संगठन सड़कों पर उतरेंगे. इस बीच डॉक्टर हांसदासोवेंद्रशेखरसे प्रभात खबर डॉट कॉम ने बातचीत की है.

आखिर ऐसा क्‍या लिख दिया सोवेंद्र शेखर ने कि उद्वेलित हुए आदिवासी लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता

सोवेंद्रशेखर ने बताया कि वह पेशे से डॉक्टर हैं और उनकी पहली पोस्टिंग पाकुड़ में हुई. पाकुड़ में उन्होंने जो कुछ भी देखा, उसने मन – मस्तिष्क को हिला कर रख दिया. किसी किताब की कहानी के एक पेज को फेसबुक पर पोस्ट कर विवाद खड़ा करना आसान है लेकिन उसके संदर्भ को समझना जरूरी होता है. मेरी कहानी में पाकुड़ के पलायन की कहानी है. अगर यह सच नहीं है तो उन्हे यहां आकर देखना चाहिए. आपत्ति तो पलायन और शोषण पर होनी चाहिए, किताब से नहीं.
पाकुड़ आते ही मैंने गांव के गांव महिलाओं को पलायन करते देखा. निरीह लोग, शरीर पर कपड़े नहीं, सिर पर गठरी बांधे महिलाएं यहां से पलायन कर दूसरे राज्य चली जाती हैं, जब मैंने संथाल परगना के इस त्रासदी के पीछे की वजह जानना चाहा तो, चौंकाने वाले तथ्य सामने आये. कई महिलाओं के साथ तो स्टेशन में शोषण होता था. मेरी कहानी शोषण व पलायन पर है. एक लेखक होने के नाते , मेरी जिम्मेदारी बनती है कि मैं पूरी घटना को जस का तस पन्ने पर उतारूं. मेरा कोई एजेंडा या प्रोपेगेंडा नहीं है. वहां के आदिवासी समाज की जमीन कोयले खदानों में चली गयी, लेकिन नौकरी नहीं मिली. घाटशिला में तब भी मैंने संपन्न आदिवासी देखे और पाकुड़ की स्थिति बिलकुल उलट थी. लेखक होने के नाते मेरे लिए यह बहुत पीड़ादायी था.
मुझे पोर्न लेखक साबित करने की कोशिश की जा रही है
एक लेखक होने के नाते मैं पूरे समाज का प्रतिनिधित्व करता हूं, लेकिन दुख की बात है कि मुझे पोर्न लेखक साबित करने की कोशिश की जा रही है. 2012 में जो कहानी प्रकाशित हो चुकी, उस पर आज विवाद खड़ा किया जा रहा है. वह लेखन का एक अलग किस्म ‘इरोटिका’ का हिस्सा है. आप ��स विधा के लेखन में शालीन भाषा की उम्मीद नहीं कर सकते.
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