प्रतिबंधित स्थल पर नमाज पढ़ने के मामले में हाई कोर्ट ने क्या कहा? यूपी का है मामला

इलाहाबाद हाई कोर्ट (File Photo)
Offering Namaz at Prohibited Place : उत्तर प्रदेश में प्रतिबंधित स्थल पर नमाज पढ़ने के आरोप में दो छात्रों के खिलाफ दर्ज मामला अदालत ने रद्द कर दिया है. जानें आखिर क्या है पूरा मामला और आरोपियों के वकील की ओर से क्या दी गई दलील.
Offering Namaz at Prohibited Place : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रतिबंधित स्थान पर नमाज पढ़ने के आरोप में दो छात्रों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया. कोर्ट ने उन्हें भविष्य में आधिकारिक निर्देशों का पालन करने की चेतावनी दी. न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की एकल पीठ ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 143 (गैरकानूनी सभा का सदस्य) और 188 (सरकारी अधिकारियों द्वारा विधिवत जारी आदेश) के तहत दर्ज प्राथमिकी से संबंधित कार्यवाही को रद्द कर दिया.
हाई कोर्ट ने पाया कि आवेदकों के खिलाफ आपराधिक मामला उचित नहीं था जिनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं था. मामले के विवरण के अनुसार, संत कबीर नगर की एक अदालत ने कथित अपराधों का संज्ञान लिया था और मई 2019 में दोनों छात्रों के खिलाफ समन जारी किया था. याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि दोनों महज छात्र हैं और उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है. उन्हें केवल अपने धर्म के अनुसार नमाज अदा करने के इरादे से फंसाया गया है.
छात्र के भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, वकील ने कहा
वकील ने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ता नंबर एक उच्च स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है. ऐसे “मामूली अपराध” में मुकदमे का जारी रहना उसके भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है. राज्य के अतिरिक्त सरकारी वकील ने आपराधिक इतिहास के अभाव को स्वीकार किया, लेकिन तर्क दिया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कुछ स्थानों को नमाज अदा करने के लिए प्रतिबंधित किया गया है.
जानबूझकर प्रतिबंधित स्थान पर नमाज अदा की : सरकारी वकील
सरकारी वकील ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने जानबूझकर प्रतिबंधित स्थान पर नमाज अदा की और इस प्रकार प्रशासनिक निर्देशों का उल्लंघन किया. दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने पाया कि एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश में, प्रत्येक नागरिक को अपने विश्वासों और रीति-रिवाजों का पालन करने का अधिकार है. हालांकि, कोर्ट ने इस बात पर बल दिया कि विविध समाज में कानून-व्यवस्था और सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के व्यापक हित में स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन आवश्यक है.
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अदालत ने दोनों को चेतावनी दी
पीठ ने गौर किया कि दोनों आवेदकों पर मुकदमा चलाना, विशेष रूप से उनके आपराधिक इतिहास के अभाव में, अनुचित था. उनके भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता था. 17 फरवरी के आदेश में अदालत ने केवल दोनों आवेदकों के संबंध में कार्यवाही रद्द की. साथ ही उन्हें चेतावनी दी गई कि भविष्य में धार्मिक क्रिया में शामिल होते समय स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी किसी भी निर्देश या प्रतिबंध का सख्ती से पालन करें.
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By Amitabh Kumar
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