मनरेगा के तहत प्रवासी मजदूरों को मिलेगा काम, जानें कैसे बना सकते हैं जॉब कार्ड

Author : Rajneesh Anand Published by : Prabhat Khabar Updated At : 18 May 2020 3:57 PM

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सरकार ने मनरेगा योजना के तहत मिलने वाले मानदेय को 182 रुपये से बढ़ाकर 202 रुपये कर दिया गया है यानी 20 रुपये की वृद्धि की गयी है. इस योजना के तहत 40,000 करोड़ रुपये के रोजगार सृजन की बात की गयी है. इससे अनुमानत: 5 करोड़ गरीब परिवारों को फायदा होगा.

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कोराना काल में वायरस से भी बड़ी समस्या बनकर उभरी है प्रवासी मजदूरों की बेरोजगारी. देश में आठ करोड़ प्रवासी मजदूर हैं, जिनमें से अधिकांश बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड के हैं. लॉकडाउन के कारण यह मजदूर बेरोजगार हो गये हैं और अपना कर्मक्षेत्र छोड़ अपने देस वापस आ गये हैं या फिर रास्ते में असंख्य मुसीबतों को झेलते हुए घर की ओर अग्रसर हैं. इन प्रवासी मजदूरों को रोजगार उपलब्ध कराना केंद्र और राज्य सरकार की जिम्मेदारी है. वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा की है, जिसमें मनरेगा के तहत इन प्रवासी मजदूरों को रोजगार उपलब्ध कराने की योजना है. तो आइए जानते हैं कि सरकार किस तरह इन मजदूरों को रोजगार उपलब्ध करायेगी और साथ ही हम प्रवासी मजदूरों के लिए मनरेगा योजना की जानकारी देंगे, ताकि वे इसका लाभ उठा सकें.

ध्यान देने वाली बात यह है कि सरकार ने मनरेगा योजना के तहत मिलने वाले मानदेय को 182 रुपये से बढ़ाकर 202 रुपये कर दिया गया है यानी 20 रुपये की वृद्धि की गयी है. इस योजना के तहत 40,000 करोड़ रुपये के रोजगार सृजन की बात की गयी है. इससे अनुमानत: 5 करोड़ गरीब परिवारों को फायदा होगा.

क्या है मनरेगा और कैसे मिलता है इसका लाभ : मनरेगा यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की शुरुआत देश में वर्ष 2005 में हुई थी. मनमोहन सिंह की सरकार ने इस योजना की शुरुआत की थी, जिसका उद्देश्य ग्रामीणों का जीवन स्तर सुधारना था. इस योजना के तहत परिवार के वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराना है. इस योजना की परिकल्पना पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने की थी और 1991 में यह संसद के सामने रखा गया था. उस वक्त इसे देश के 625 जिलों में लागू किया गया था बाद में इसे पूरे देश में लागू कर दिया गया.

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मनरेगा के तहत रोजगार पाने के लिए सबसे पहले ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्य को ग्राम पंचायत के पास एक तसवीर के साथ अपना नाम, उम्र और पता जमा कराना होता है. उसकी जांच की जाती है उसके बाद पंचायत उनका रजिस्ट्रेशन करके उन्हें जॉब कार्ड प्रदान करता है. जॉब कार्ड में पंजीकृत व्यक्ति के बारे में तमाम सूचनाएं होती हैं. एक पंजीकृत व्यक्ति या तो पंचायत या कार्यक्रम अधिकारी को लिखित रूप से (निरंतर काम के कम से कम चौदह दिनों के लिए) काम करने के लिए एक आवेदन प्रस्तुत कर सकता है. इस अधिनियम के तहत लिंगआधारित भेदभाव नहीं किया जाता है और स्त्री-पुरुष दोनों को समान रकम का भुगतान होता है. सभी वयस्क रोजगार के लिए आवेदन कर सकते हैं. मनरेगा जॉब कार्ड लिस्ट को अब अॅानलाइन कर दिया गया है, जिसके जरिये लाभार्थी पूरी सूची निकाल सकता है. काम नहीं मिलने पर उक्त व्यक्ति बेरोजगारी भत्ता का अधिकारी होगा.

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लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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