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मेरी माटी, मेरा देश : 12 साल की उम्र में असम की तिलेश्वरी बरुआ ने दी कुर्बानी, पढ़ें प्रेरक कहानी

Updated at : 09 Aug 2023 12:35 PM (IST)
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मेरी माटी, मेरा देश : 12 साल की उम्र में असम की तिलेश्वरी बरुआ ने दी कुर्बानी, पढ़ें प्रेरक कहानी

हम देश की उन गुमनाम महिला स्वतंत्रता सेनानियों से रू-ब-रू करवायेंगे, जिनके योगदान की चर्चा कम हुई है. इन वीरंगनाओं ने न केवल स्वतंत्रता संग्राम अभियान का नेतृत्व किया, बल्कि मातृभूमि के लिए अपनी जान को भी समर्पित कर दिया. आज पढ़ें देश की सबसे कम उम्र की शहीदों में एक तिलेश्वरी बरुआ के बारे में.

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Meri Maati Mera Desh : शहीद वीर-वीरांगनाओं को सम्मान देने के लिए पीएम नरेंद्र मोदी के आह्वान पर बुधवार से ‘मेरी माटी, मेरा देश’ अभियान शुरू हो रहा है. इसी कड़ी में हम देश की उन गुमनाम महिला स्वतंत्रता सेनानियों से रू-ब-रू करवायेंगे, जिनके योगदान की चर्चा कम हुई है. इन वीरंगनाओं ने न केवल स्वतंत्रता संग्राम अभियान का नेतृत्व किया, बल्कि मातृभूमि के लिए अपनी जान को भी समर्पित कर दिया. आज पढ़ें देश की सबसे कम उम्र की शहीदों में एक तिलेश्वरी बरुआ के बारे में.

कौन हैं तिलेश्वरी बरुआ ?

शहीद तिलेश्वरी बरुआ, उन महिला स्वतंत्रता सेनानियों में शामिल हैं, जिनकी चर्चा बहुत कम हुई है. असम के सुदूर ढेकियाजुली से ताल्लुक रखनेवाली तिलेश्वरी देश की सबसे कम उम्र की शहीद मानी जाती हैं. ब्रिटिश हुकूमत से संघर्ष के दौरान क्रांतिकारी बरुआ ने महज 12 वर्ष की उम्र में देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी. गुवाहाटी से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर सोनितपुर जिले का ढेकियाजुली, 1942 में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ब्रिटिश पुलिस की बर्बरता का गवाह बना था.

तिरंगा फहराने के लिए जुटे निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग

20 सितंबर, 1942 को बड़ी संख्या में सत्याग्रही स्थानीय पुलिस स्टेशन में तिरंगा फहराने के लिए जुटे थे. इसी दौरान आजादी के लिए संघर्षरत निहत्थे लोगों पर अंग्रेजों की पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां बरसायीं, जिसमें करीब पंद्रह लोग शहीद हो गये, जिसमें तिलेश्वरी भी थीं. कुछ वर्ष पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ढेकियाजुली गये थे और शहीदों को श्रद्धांजलि दी थी. 20 सितंबर का दिन, जिस दिन तिलेश्वरी बरुआ ने शहादत प्राप्त की, असम में अब शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है.

गोली लगने के बाद भी लगाती रही ‘वंदे मातरम’ का नारा

बात 20 सितंबर, 1942 की है, जब ढेकियाजुली पुलिस थाने में लोगों ने तिरंगा फहराने का आयोजन किया था. हाथ में झंडा लिए तिलेश्वरी उस भीड़ में शामिल हो गयीं. लोग जब थाने पहुंचे, तो पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी. कई लोग शहीद हुए, पर इस बच्ची के कदम थमे नहीं और वह ‘वंदे मातरम’ के नारे लगाते हुए आगे बढ़ती रही. वह कुछ दूर आगे बढ़ी ही थी कि गोली लगने से उसका संतुलन बिगड़ गया. खून से लथपथ तिलेश्वरी को उनके एक रिश्तेदार अपनी पीठ पर उठा कर दौड़ना शुरू किया. इसी दौरान पुलिस के लोगों ने उनका रास्ता रोका और तिलेश्वरी (संभवत: पार्थिव शरीर) को कुछ घंटे बाद ही पुलिस उठा कर ले गयी.

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किसान परिवार में जन्मीं, पिता की इकलौती पुत्री : तिलेश्वरी बरुआ का जन्म ढेकियाजुली थाना अंतर्गत निज बड़गांव ग्राम में हुआ था. वह किसान भाभाकांत बरुआ की इकलौती पुत्री थीं. बचपन से ही देशभक्ति गीतों से काफी प्रभावित थीं. यही वजह है कि काफी कम उम्र में स्वेच्छा से वह स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में कूद पड़ीं.

ढेकियाजुली 1942, द अनटोल्ड स्टोरी

स्वतंत्रता संग्राम के इस संघर्ष की गाथा की विस्तृत जानकारी ‘ढेकियाजुली 1942: द अनटोल्ड स्टोरी’ नामक पुस्तक से मिलती है. समुद्र गुप्त कश्यप द्वारा लिखित यह पुस्तक पहली बार इस भूले-बिसरे इतिहास से दुनिया को परिचित करवाती है. इस पुस्तक के प्रकाशन के बाद ढेकियाजुली पुलिस स्टेशन, जहां भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान नरसंहार हुआ था, को असम सरकार ने एक विरासत संरचना घोषित किया है. कश्यप का मानना है कि ढेकियाजुली की घटना अंग्रेजों के बर्बरता की बड़ी घटना थी. स्वतंत्रता संग्राम के इस आंदोलन में स्थानीय किसानों, महिलाओं व जनजाति समुदायों के सदस्यों ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया था.

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