Manipur Violence मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग, मैतेई समुदाय की अपील- कुकी से न बात करे केंद्र
Published by : ArbindKumar Mishra Updated At : 26 Jul 2023 9:28 AM
केंद्र, मणिपुर सरकार और दो कुकी उग्रवादी संगठनों-- ‘कुकी नेशनल ऑर्गनाइजेशन’ और ‘यूनाइटेड पीपुल्स फ्रंट’ के बीच एसओओ पर हस्ताक्षर किये गये थे. यह संधि 2008 में हुई थी जिसकी अवधि कई बार बढ़ाई गई.
मणिपुर 3 मई से हिंसा की आग में जल रहा है. रोजाना वहां से प्रदर्शन, आगजनी और हिंसा की नयी खबरें सामने आ रही हैं. मैतेई और कुकी समुदाय एक-दूसरे की जान के दुश्मन बन बैठे हैं. दोनों ही समुदाय पीछे हटने और समझौता के मूड में नहीं है. नतीजा है कि राज्य पूरी तरह से अशांत हो चुका है. सरकार भी इसको लेकर चिंतित है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह खुद वहां पहुंचकर शांति स्थापित करने की कोशिश की, लेकिन परिणाम सार्थक नहीं रहा. अब मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग उठ रही है. जबकि मैतेई समुदाय ने केंद्र सरकार से अपील की दी है कि वे कुकी से बात नहीं करे.
मैतेई समुदाय ने केंद्र सरकार से कर दी ये अपील
इंफाल के कई नागरिक समाज संगठनों के साझा मंच ‘कोऑर्डिनेटिंग कमेटी ऑन मणिपुर इंटिग्रिटी (सीओसीओएमआई)’ ने मणिपुर में जारी अशांति के लिए कुकी उग्रवादी समूहों को जिम्मेदार ठहराते हुए केंद्र से अपील की कि वह उनसे बात नहीं करे. सीओसीओएमआई ने यह भी दावा किया कि कुकी उग्रवादी संगठनों के सदस्य ‘विदेशी’ हैं. सीओसीओएमआई के संयोजक जितेंद्र निंगोम्बा ने कहा, मीडिया के सूत्रों से हमें सूचना मिली है कि भारत सरकार कुकी संगठनों के साथ बातचीत करने वाली है. हम पूरी तरह से इसके खिलाफ हैं. उन्होंने कहा कि सरकार को संघर्ष विराम (एसओओ) से जुड़े संगठनों में से किसी के साथ वार्ता नहीं करनी चाहिए.
कुकी उग्रवादी संगठनों के साथ सरकार की 2008 में हुई थी संधि
केंद्र, मणिपुर सरकार और दो कुकी उग्रवादी संगठनों– ‘कुकी नेशनल ऑर्गनाइजेशन’ और ‘यूनाइटेड पीपुल्स फ्रंट’ के बीच एसओओ पर हस्ताक्षर किये गये थे. यह संधि 2008 में हुई थी जिसकी अवधि कई बार बढ़ाई गई. निंगोम्बा ने कहा, हम कुकी उग्रवादी संगठनों और भारत सरकार के बीच किसी भी वार्ता के विरूद्ध हैं क्योंकि ये संगठन विदेशी नागरिकों के संगठन हैं. उन्होंने कहा कि राज्य की क्षेत्रीय अखंडता को कायम रखने और पृथक प्रशासन की अनुमति नहीं देने की अपनी मांग को लेकर सीओसीओएमआई 29 जुलाई को रैली आयोजित करेगी.
सीओसीओएमआई ने केंद्र सरकार पर लगाया गंभीर आरोप
मणिपुर में चिन-कुकी-मिजो-जोमी से संगठन से संबद्ध 10 आदवासी विधायकों ने मैतेई और आदिवासियों के बीच हिंसक संघर्ष के आलोक में केंद्र से अपने समुदायों के लिए पृथक प्रशासन के गठन की अपील की है. इस बीच, नई दिल्ली में सीओसीओएमआई के प्रवक्ता के अथौबा ने राज्य और केंद्र सरकार पर मणिपुर में हिंसा को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा, गुजरात दंगों (2002) के दौरान स्थिति को नियंत्रित करने में चार दिन लगे लेकिन मणिपुर जैसे छोटे राज्य में बल की तैनाती के बावजूद हिंसा को नियंत्रित क्यों नहीं किया जा सकता है. अथौबा ने असम राइफल्स पर उग्रवादियों का समर्थन करने का भी आरोप लगाया, और कहा कि उनका समूह इस संबंध में साक्ष्य इकट्ठा कर रहा है. उन्होंने मांग की कि अर्धसैनिक बल की कुछ बटालियनों को राज्य से हटा दिया जाए. असम राइफल्स ने पहले ही सीओसीओएमआई के खिलाफ राजद्रोह और मानहानि का मामला दर्ज किया है क्योंकि संगठन के प्रमुख ने बहुसंख्यक समुदाय से हथियार न सौंपने का आह्वान किया था.
दो महिलाओं को निर्वस्त्र कर घुमाने के मामले के बाद मणिपुर में और स्थिति खराब
19 जुलाई को मणिपुर से एक वीडियो सोशल मीडिया के माध्यम से दुनिया के सामने आया. जिसने हिंसा की आग को और बढ़ा दिया. 30 सेकंड के वीडियो में 1000 से अधिक लोगों की भीड़ को दो महिलाओं को निर्वस्त्र का घुमाते हुए देखा गया. जिसके बाद पूरे देश में आक्रोश बढ़ गयी. सड़क से लेकर संसद तक इस घटना की निंदा की गयी. हालांकि यह घटना 4 मई की बतायी जाती है. दो महीने के बाद एक्शन में आयी पुलिस ने अबतक इस मामले में 7 लोगों को गिरफ्तार की है और 12 लोगों की पहचान कर ली है.
मणिपुर में 3 मई को भड़की हिंसा में अबतक 160 से अधिक लोगों की मौत
इस पूर्वोत्तर राज्य में करीब तीन महीने पहले जातीय हिंसा शुरू हुई थी जिसमें 160 से अधिक लोगों की जान चली गयी तथा सैकड़ों अन्य घायल हुए. मणिपुर में अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मैतेई समुदाय की मांग के विरोध में पर्वतीय जिलों में तीन मई को आयोजित ‘आदिवासी एकजुटता मार्च’ के दौरान हिंसा भड़की थी. राज्य में मैतेई समुदाय की आबादी करीब 53 प्रतिशत है और वे मुख्य रूप से इंफाल घाटी में रहते हैं. वहीं, नगा और कुकी जैसे आदिवासी समुदायों की आबादी 40 प्रतिशत है और वे अधिकतर पर्वतीय जिलों में रहते हैं.
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अरबिंद कुमार मिश्रा वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल में एक अनुभवी पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. अप्रैल 2011 से संस्थान का हिस्सा रहे अरबिंद के पास पत्रकारिता के क्षेत्र में बतौर रिपोर्टर और डेस्क एडिटर 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है. वर्तमान में वह नेशनल और इंटरनेशनल डेस्क की जिम्मेदारी संभालने के साथ-साथ एक पूरी शिफ्ट का नेतृत्व (Shift Lead) भी कर रहे हैं. विशेषज्ञता और अनुभव अरबिंद की लेखनी में खबरों की गहराई और स्पष्टता है. उनकी मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है. राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मामले: वैश्विक राजनीति और देश की बड़ी घटनाओं पर पैनी नजर. खेल पत्रकारिता: झारखंड में आयोजित 34वें नेशनल गेम्स से लेकर JSCA स्टेडियम में हुए कई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों की ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव. झारखंड की संस्कृति: राज्य की कला, संस्कृति और जनजातीय समुदायों की समस्याओं और उनकी जीवनशैली पर विशेष स्टोरीज. पंचायतनामा: ग्रामीण विकास और जमीनी मुद्दों पर 'पंचायतनामा' के लिए विशेष ग्राउंड रिपोर्टिंग. करियर का सफर प्रभात खबर डिजिटल से अपने करियर की शुरुआत करने वाले अरबिंद ने पत्रकारिता के हर आयाम को बखूबी जिया है. डिजिटल मीडिया की बारीकियों को समझने से पहले उन्होंने आकाशवाणी (All India Radio) और दूरदर्शन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में एंकरिंग के जरिए अपनी आवाज और व्यक्तित्व की छाप छोड़ी है. शिक्षा और योग्यता UGC NET: अरबिंद मिश्रा ने यूजीसी नेट (UGC NET) उत्तीर्ण की है. मास्टर्स (MA): रांची यूनिवर्सिटी के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग से एमए की डिग्री. ग्रेजुएशन: रांची यूनिवर्सिटी से ही मास कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज्म में स्नातक.
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