कर्नाटक: मुख्यमंत्री शिवकुमार के सामने ये हैं चुनौतियां, कहीं बढ़ न जाए टेंशन

मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार (Photo: PTI)
कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के सामने कई चुनौतियां हैं. इनमें से एक 2028 विधानसभा चुनाव भी है. जानें इसके अलावा उनके सामने और क्या चुनौती होगी जानें यहां.
कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को एक तरफ सरकार को प्रभावी ढंग से चलाना है, तो दूसरी ओर कांग्रेस को 2028 विधानसभा चुनाव के लिए भी तैयार करना है. राजनीतिक संतुलन बनाए रखने, वित्तीय चुनौतियों से निपटने और प्रशासन को मजबूत करने की जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर है. 64 साल के शिवकुमार ऐसे समय में सत्ता संभाला है, जब राज्य कई जटिल मुद्दों से जूझ रहा है.
मुख्यमंत्री के रूप में उनके सामने पहली बड़ी चुनौती मंत्रिमंडल का गठन और विभागों का बंटवारा है. उन्होंने बुधवार (3 जून) को पहले चरण में 13 मंत्रियों को मंत्रिमंडल में शामिल किया. कर्नाटक में मुख्यमंत्री सहित कुल 34 मंत्रियों की स्वीकृत संख्या है. मंत्रिपद के कई दावेदारों और सीमित रिक्तियों के बीच शिवकुमार को संतुलन बनाना होगा. नए मंत्रिमंडल में उन्हें जातीय समीकरणों, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया के समर्थकों को ध्यान में रखते हुए समावेशी संतुलन बनाना पड़ेगा.
‘अहिंदा’ वोट बैंक को साधना भी एक चुनौती
सिद्धरमैया के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद कांग्रेस के लिए ‘अहिंदा’ वोट बैंक को बनाए रखना भी शिवकुमार के लिए महत्वपूर्ण चुनौती होगी. ‘अहिंदा’ अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और दलितों के लिए कन्नड़ भाषा का संक्षिप्त रूप है. सिद्धरमैया को इन समुदायों का मजबूत समर्थक माना जाता है और 2023 के विधानसभा चुनाव में इन वर्गों का कांग्रेस के पक्ष में व्यापक समर्थन पार्टी की सत्ता में वापसी का प्रमुख कारण रहा था. आगामी चुनावों में भी इन वर्गों का समर्थन कांग्रेस के लिए अहम माना जा रहा है.
वीरशैव-लिंगायत को रखना होगा खुश
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिवकुमार को सिद्धरमैया और उनके समर्थकों को विश्वास में लेकर आगे बढ़ना होगा, साथ ही राज्य के प्रभावशाली समुदायों के साथ भी अच्छे संबंध बनाए रखने होंगे. उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि राज्य के दूसरे बड़े प्रभावशाली समुदाय वीरशैव-लिंगायत उनके किसी फैसले से नाराज न हों. वीरशैव-लिंगायत की उत्तर कर्नाटक और दक्षिण के कुछ हिस्सों में मजबूत उपस्थिति है.
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विभिन्न समुदायों के बीच संतुलन साधने की उनकी क्षमता की बड़ी परीक्षा उस समय होगी जब सामाजिक और शैक्षणिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट सार्वजनिक होगी जिसे आमतौर पर ‘जाति जनगणना’ कहा जाता है. लिंगायत और वोक्कालिगा जैसे प्रभावशाली समुदायों ने पहले की सर्वेक्षण रिपोर्ट पर कड़ी आपत्ति जताई थी और शिवकुमार ने स्वयं भी उस पर संदेह व्यक्त किया था.
वोक्कालिगा समुदाय का समर्थन कांग्रेस को मिल सकता है
कांग्रेस के भीतर कई नेताओं का मानना है कि शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने से पुराने मैसूर क्षेत्र में प्रभाव रखने वाले वोक्कालिगा समुदाय का समर्थन पार्टी के पक्ष में और मजबूत हो सकता है. 2023 के विधानसभा चुनाव में वोक्कालिगा समुदाय के एक हिस्से का कांग्रेस की ओर झुकाव इस उम्मीद से जुड़ा माना गया था कि शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा. हालांकि भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) के गठबंधन के बीच इस समर्थन को बनाए रखना भी उनके लिए बड़ी चुनौती होगी.
वोक्कालिगा समुदाय का एक बड़ा वर्ग पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा और उनके पुत्र तथा केंद्रीय मंत्री एच. डी. कुमारस्वामी को अब भी सम्मान की दृष्टि से देखता है. यह समुदाय जद (एस) का पारंपरिक समर्थन आधार माना जाता है.
वित्तीय स्थिति का प्रबंधन शिवकुमार के लिए एक अहम चुनौती
राज्य की वित्तीय स्थिति का प्रबंधन भी शिवकुमार के लिए एक अहम चुनौती होगी. लोकलुभावन गारंटी योजनाओं पर बढ़ते खर्च के कारण सरकारी वित्त पर दबाव बढ़ रहा है. वित्त वर्ष 2026-27 में सरकार ने पांच गारंटी योजनाओं के लिए 51,286 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है. शिवकुमार पहले ही इन योजनाओं के लाभार्थियों की सूची की समीक्षा करने की बात कह चुके हैं, क्योंकि इनके दुरुपयोग को लेकर चिंताएं जताई गई हैं. बढ़ते कर्ज और सब्सिडी के बोझ को लेकर चिंता बनी हुई है, जबकि कल्याणकारी योजनाओं में किसी प्रकार की कटौती जन असंतोष को जन्म दे सकती है.
संभावित कृषि संकट को लेकर करना होगा काम
सामान्य से कम मानसून की आशंकाओं के बीच संभावित कृषि संकट, विकास परियोजनाओं की धीमी प्रगति, पिछड़े जिलों की समस्याओं का समाधान तथा लंबित सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करना भी प्रमुख चुनौतियों में शामिल है. मेकेदातु, कालसा-बंडूरी (महादयी) और अपर कृष्णा जैसी अंतरराज्यीय नदी परियोजनाओं के लिए केंद्र से आवश्यक मंजूरी प्राप्त करना और अन्य राज्यों की आपत्तियों का समाधान करना भी सरकार के सामने महत्वपूर्ण कार्य होगा. मानसून के आगमन के साथ बेंगलुरु की शहरी अवसंरचना से जुड़ी समस्याएं एक बार फिर चर्चा में आ सकती हैं. सिद्धरमैया सरकार में बेंगलुरु विकास विभाग का दायित्व संभाल चुके शिवकुमार को इन मुद्दों के लिए सीधे तौर पर जवाबदेह ठहराया जा सकता है.
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By अमिताभ कुमार
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