जयराम रमेश का आरोप: ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट में फॉरेस्ट राइट्स एक्ट का उल्लंघन; आदिवासी समुदाय की सहमति नहीं ली

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कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश. फोटो- एक्स (ANI).

Great Nicobar Project: कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर केंद्र सरकार पर आदिवासी अधिकारों की अनदेखी का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि परियोजना फॉरेस्ट राइट्स एक्ट 2006 का उल्लंघन कर आगे बढ़ाई जा रही है.

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Great Nicobar Project: ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच विवाद एक बार फिर तेज हो गया है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने बुधवार को केंद्र सरकार पर आदिवासी समुदायों के अधिकारों की अनदेखी करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि यह परियोजना फॉरेस्ट राइट्स एक्ट, 2006 का उल्लंघन करते हुए आगे बढ़ाई जा रही है. जयराम रमेश ने केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल ओरांव को पत्र लिखकर परियोजना पर गंभीर सवाल उठाए. 

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कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के तहत शोम्पेन और निकोबारी समुदाय की पारंपरिक जमीन और जंगलों को प्रभावित किया जा रहा है, लेकिन प्रभावित जनजातियों की सहमति नहीं ली गई. उन्होंने दावा किया कि मंत्रालय ने 18 नवंबर 2020 को परियोजना के लिए नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) देते समय साफ कहा था कि फॉरेस्ट राइट्स एक्ट और पर्यावरण मंत्रालय के 3 अगस्त 2009 के आदेश का पालन जरूरी होगा. इसके तहत जंगल की जमीन हस्तांतरित करने से पहले आदिवासी समुदायों की सूचित सहमति लेना अनिवार्य था. जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया.

‘आदिवासी इलाकों को किया जा रहा प्रभावित’

पत्र में जयराम रमेश ने कहा कि अंडमान और निकोबार प्रशासन का यह दावा सही नहीं है कि परियोजना से किसी आदिवासी बस्ती का विस्थापन नहीं होगा. उनके मुताबिक, परियोजना के पहले चरण में करीब 130.75 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र को दूसरी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जाना है. यही क्षेत्र शोम्पेन जनजाति के पारंपरिक आवास और निकोबारी समुदाय के गांवों का हिस्सा है. उन्होंने यह भी कहा कि परियोजना से जुड़े सलाहकार AECOM द्वारा जारी नक्शों में भी ‘शोम्पेन ट्राइब्स की लोकेशन’ परियोजना क्षेत्र के भीतर दिखाई गई है. कुछ निकोबारी गांवों को भी इन नक्शों में दर्शाया गया है.

‘गैर-आदिवासी लोगों से ली गई सहमति’

जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने आदिवासी समुदायों की बजाय गैर-आदिवासी बसने वालों से ‘सहमति’ हासिल की. उन्होंने हितों के टकराव का मुद्दा उठाते हुए कहा कि जिन अधिकारियों पर आदिवासी कल्याण की जिम्मेदारी है, वही परियोजना के क्रियान्वयन की निगरानी भी कर रहे हैं.

मंत्रालय पर लगाए गंभीर आरोप

कांग्रेस नेता ने जनजातीय कार्य मंत्रालय पर स्वतंत्र मूल्यांकन न करने का आरोप भी लगाया. उन्होंने कहा कि मंत्रालय ने अंडमान-निकोबार प्रशासन के दावों को बिना जांचे स्वीकार कर लिया. उन्होंने यह भी कहा कि कलकत्ता हाईकोर्ट में चल रहे मामले में मंत्रालय ने खुद को प्रतिवादी पक्ष से हटाने की मांग की, जो बेहद चौंकाने वाला कदम है. जयराम रमेश ने मंत्रालय से पारदर्शी और सक्रिय भूमिका निभाने की अपील करते हुए कहा कि आदिवासी समुदायों के कानूनी अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए.

केंद्र सरकार ने परियोजना का किया बचाव

इधर, केंद्र सरकार ने हाल ही में ग्रेट निकोबार परियोजना का बचाव करते हुए इसे रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बताया था. सरकार के मुताबिक, इस परियोजना का उद्देश्य ग्रेट निकोबार को बड़ा समुद्री हब बनाना है. यह इलाका पूर्व-पश्चिम शिपिंग रूट से करीब 40 नॉटिकल मील की दूरी पर स्थित है, जिससे भारत विदेशी ट्रांसशिपमेंट पोर्ट्स पर अपनी निर्भरता कम कर सकेगा. सरकार ने यह भी कहा कि परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा जरूरतों के लिहाज से भी अहम है.

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‘सिर्फ 1.82 प्रतिशत वन क्षेत्र प्रभावित होगा’

यह भारत सरकार की लगभग 81,000 करोड़ की महत्वाकांक्षी परियोजना है. केंद्र का दावा है कि परियोजना के कारण द्वीप के कुल वन क्षेत्र का केवल 1.82 प्रतिशत हिस्सा ही प्रभावित होगा. इसके बदले 97.30 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में क्षतिपूरक वनीकरण किया जाएगा. सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि शोम्पेन और निकोबारी समुदायों के विस्थापन का कोई प्रस्ताव नहीं है और परियोजना 2015 की शोम्पेन नीति तथा 2004 की जरावा नीति के अनुरूप तैयार की गई है.

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