Flood : पत्नी को अकेला छोड़ दूसरे राज्यों में कमाने निकल जाते हैं पति, सालों नहीं आते, बाढ़ अलग कर देता है दोनों को

Published by : Amitabh Kumar Updated At : 12 May 2025 11:11 AM

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सांकेतिक तस्वीर

Flood : पुरुषों के कमाई के लिए दूसरे राज्यों में चले जाने के कारण प्राकृतिक आपदा से प्रभावित घरों की मरम्मत का जिम्मा महिलाओं पर आ जाता है. लड़की इकट्ठी करने, मछली पकड़ने और बच्चों व मवेशियों की देखभाल का जिम्मा भी पूरी तरह से महिलाओं पर आ जाता है. कुछ महिलाएं घर खर्च के लिए सिलाई-बुनाई जैसे काम भी करती हैं.

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Flood : “क्या जब हम लौटेंगे, तो हमारा घर अपनी जगह पर होगा?” लखीसखी बारा के कानों में ये सवाल हर रोज गूंजते हैं—सवाल जिनके जवाब उसके पास नहीं हैं. 2023 की असम की भीषण बाढ़ में उसका घर तबाह हो गया. परिवार के पुरुष सदस्य काम की तलाश में चेन्नई चले गए, जबकि लखीसखी अपनी बहू के साथ धेमाजी में शरण लेने को मजबूर हुई. वे सैकड़ों ऐसी महिलाओं में शामिल हैं जिन्हें जलवायु परिवर्तन के कारण आजीविका छिनने पर परिवार के पुरुष छोड़कर रोजगार के लिए बाहर चले गए और वे अकेली रह गईं.

लखीसखी ने न्यूज एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए कहा, “हम खेतों में काम करते थे, लेकिन (जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के कारण) खेती पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं. दिहाड़ी मजदूर का काम भी नियमित रूप से नहीं मिलता. घर चलाना मुश्किल हो गया था. नतीजतन, मेरे पति और हमारा बेटा दो साल पहले चेन्नई चले गए, जबकि मैं अपनी बहू के साथ धेमाजी आ गई। धेमाजी में हमारे परिवार की अन्य महिलाएं रहती हैं और हम जरूरत के समय में एक-दूसरे को सहारा दे सकते हैं.” उसने कहा, “मेरे पति जब भी फोन करते हैं, तो यही सवाल पूछते हैं कि क्या हमारी जमीन भविष्य में खेती के लिए सुरक्षित बचेगी. अगर यह पूरी तरह से बह गई, तो क्या होगा? यही हमारी एकमात्र संपत्ति है.”

धेमाजी सर्वाधिक पिछड़ों जिलों में से एक

धेमाजी देश के 250 सर्वाधिक पिछड़ों जिलों में से एक है. यह बाढ़ के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है. आधिकारिक अनुमान के मुताबिक, असम के 28 जिलों में 23 लाख से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं. ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बती पठार से निकलती है और अरुणाचल प्रदेश व असम में बहती हुई बंगाल की खाड़ी में मिलती है। यह नदी राज्य में अक्सर बाढ़ का कारण बनती है. लखीसखी के गांव के दौरे के दौरान ‘पीटीआई-भाषा’ की संवाददाता को कामकाजी उम्र का कोई पुरुष बमुश्किल ही दिखाई दिया. वहां बचे हुए ज्यादातर पुरुष या तो बुजुर्ग थे या फिर बच्चे.

बांस से बने अस्थायी घर में रहने पर लोग मजबूर

रूपा बरुआ (32) चार साल और छह साल के अपने दो बच्चों के साथ ‘चांग घर’ (बांस से बने अस्थायी घर) में रहती है, जबकि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बना उनका पक्का मकान वीरान पड़ा हुआ है. रूपा का पति बेंगलुरु की एक रबर फैक्टरी में काम करता है और वह पिछले दो साल से असम नहीं आया है. रूपा ने  कहा, “पक्का मकान गांव में दूर-दराज के स्थान पर है. अगर यह बाढ़ के पानी में डूब जाता है, तो मैं बच्चों के साथ अकेले बाहर नहीं निकल सकती. इसलिए मैं यहां अन्य महिलाओं के साथ एक ‘चांग घर’ में रहती हूं. अगर मेरे बच्चे बीमार पड़ते हैं, तो यहां मदद लेना आसान होता है.”

उसने कहा, “मेरे पति पैसे भेजते हैं. वह पूछते हैं कि क्या हम कभी अपने घर में साथ रह पाएंगे. बच्चों को अपने पिता की याद आती है, लेकिन जब यहां आमदनी का कोई जरिया नहीं है, तो हम क्या कर सकते हैं? अगर हम भी पलायन कर गए, तो वहां रहना काफी महंगा पड़ेगा और हम अपना घर हमेशा के लिए गंवा सकते हैं.”

घर में रहने वाले अधिकतर पुरुष या तो बुजुर्ग हैं या दिव्यांग

कामकाजी उम्र का बोकुल केरल की एक फैक्टरी में हुए हादसे में अपना हाथ गंवाने के बाद चार महीने पहले धेमाजी लौट आया. अब वह परिवार की महिलाओं के साथ रहता है. बोकुल (26) ने कहा, “ज्यादातर पुरुष रोजी-रोटी कमाने के लिए गांव छोड़ दूसरे राज्यों का रुख कर चुके हैं. यहां रहने वाले अधिकतर पुरुष या तो बुजुर्ग हैं या मेरे जैसे दिव्यांग, जो कमाने के लिए बाहर नहीं जा सकते. मैं अपनी पत्नी और अपने भाई की पत्नी की मदद करता हूं, जो यहां अपने तीन साल के बेटे के साथ रहती है. कोई भी पलायन नहीं करना चाहता, लेकिन कोई दूसरा रास्ता भी नहीं है.”

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लेखक के बारे में

By Amitabh Kumar

अमिताभ कुमार झारखंड की राजधानी रांची के रहने वाले हैं और पिछले कई वर्षों से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हैं. डिजिटल न्यूज में अच्छी पकड़ है और तेजी के साथ सटीक व भरोसेमंद खबरें लिखने के लिए जाने जाते हैं. वर्तमान में अमिताभ प्रभात खबर डिजिटल में नेशनल और वर्ल्ड न्यूज पर फोकस करते हैं और तथ्यों पर आधारित खबरों को प्राथमिकता देते हैं. हरे-भरे झारखंड की मिट्टी से जुड़े अमिताभ ने अपनी शुरुआती पढ़ाई जिला स्कूल रांची से पूरी की और फिर Ranchi University से ग्रेजुएशन के साथ पत्रकारिता की पढ़ाई की. पढ़ाई के दौरान ही साल 2011 में रांची में आयोजित नेशनल गेम को कवर करने का मौका मिला, जिसने पत्रकारिता के प्रति जुनून को और मजबूत किया.1 अप्रैल 2011 से प्रभात खबर से जुड़े और शुरुआत से ही डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय रहे. खबरों को आसान, रोचक और आम लोगों की भाषा में पेश करना इनकी खासियत है. डिजिटल के साथ-साथ प्रिंट के लिए भी कई अहम रिपोर्ट कीं. खासकर ‘पंचायतनामा’ के लिए गांवों में जाकर की गई ग्रामीण रिपोर्टिंग करियर का यादगार अनुभव है. प्रभात खबर से जुड़ने के बाद कई बड़े चुनाव कवर करने का अनुभव मिला. 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव के साथ-साथ झारखंड विधानसभा चुनावों (2014, 2019 और 2024) की भी ग्राउंड रिपोर्टिंग की है. चुनावी माहौल, जनता के मुद्दे और राजनीतिक हलचल को करीब से समझना रिपोर्टिंग की खास पहचान रही है.

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