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CSPOC: अगला सीएसपीओसी सम्मेलन ब्रिटेन में होगा आयोजित

Updated at : 16 Jan 2026 7:34 PM (IST)
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CSPOC: अगला सीएसपीओसी सम्मेलन ब्रिटेन में होगा आयोजित

सीएसपीओसी के 28वें आयोजन से लोकतांत्रिक संवाद की गौरवशाली परंपरा सुदृढ़ हुई है. यह सम्मेलन लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिक जन-केंद्रित बनाने की प्रतिबद्धता के साथ संपन्न संपन्न हुआ और शुक्रवार को लोक सभा अध्यक्ष ने 29वें सीएसपीओसी की अध्यक्षता ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स के अध्यक्ष सर लिंडसे हॉयल को सौंपी.

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CSPOC: राष्ट्रमंडल देश के अध्यक्षों एवं पीठासीन अधिकारियों का 28 वां सम्मेलन (सीएसपीओसी) शुक्रवार को लोकतांत्रिक संस्थाओं को और अधिक जन-केंद्रित बनाने की प्रतिबद्धता के साथ संपन्न हुआ. समापन सत्र के दौरान लोक सभा अध्यक्ष ने 29वें सीएसपीओसी की अध्यक्षता ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स के अध्यक्ष सर लिंडसे हॉयल को सौंपी और लंदन में आयोजित होने वाले अगले सीएसपीओसी की सफलता के लिए शुभकामना दी.

सम्मेलन के दौरान संसदों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जिम्मेदार उपयोग, सोशल मीडिया के प्रभाव, चुनावों से परे नागरिक सहभागिता, सांसदों और संसदीय कर्मचारियों के स्वास्थ्य एवं कल्याण जैसे विषयों पर चर्चा हुई. चर्चा से सामने आया कि संसद को अधिक जन-केंद्रित, जवाबदेह और प्रभावी बनाने पर सामूहिक चिंतन के लिए सीएसपीओसी एक अद्वितीय मंच के तौर पर मौजूदा समय में भी प्रासंगिक है. 

समापन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए लोक सभा अध्यक्ष ने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाएं तभी सशक्त और प्रासंगिक बनी रह सकती हैं जब वे पारदर्शी, समावेशी, उत्तरदायी और जनता के प्रति जवाबदेह हों. पारदर्शिता निर्णय-प्रक्रिया में खुलेपन को सुनिश्चित कर जनता के विश्वास को बढ़ाने का काम करती है. समावेशन यह सुनिश्चित करता है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सभी आवाज खासकर समाज के हाशिये पर खड़े लोगों की सुनी जाए और उसका सम्मान हो. सीएसपीओसी की स्थापना के पिछले 56 वर्ष पूर्व की परिकल्पना को याद करते हुए बिरला ने कहा कि यह सम्मेलन राष्ट्रमंडल की लोकतांत्रिक विधायिकाओं के बीच सतत संवाद सुनिश्चित करने, संसदीय कार्यकुशलता और उत्तरदायित्व को बढ़ाने के नए उपायों की खोज के उद्देश्य से स्थापित किया गया था. 28वें सीएसपीओसी ने इस विरासत को नयी ऊर्जा और सार्थकता के साथ आगे बढ़ाने का काम किया है. 

मौजूदा जरूरत के लिहाज से लोकतांत्रिक संस्थाओं को ढालने की जरूरतसहमति और असहमति लोकतंत्र की विशेषता

लोक सभा अध्यक्ष ने कहा कि सहमति और असहमति लोकतंत्र की विशेषता हैं और यह लोकतांत्रिक मर्यादा के दायरे में होना चाहिए. आधुनिक लोकतंत्र अभूतपूर्व अवसरों के साथ-साथ जटिल, बहुआयामी चुनौतियों का भी सामना कर रहे हैं. ऐसे में पीठासीन अधिकारियों का दायित्व है कि वे समकालीन आवश्यकताओं के अनुसार लोकतांत्रिक संस्थाओं को निरंतर ढालने का काम करें और साथ ही संवैधानिक मूल्यों में दृढ़ता बनाए रखें. संसद की वास्तविक प्रासंगिकता नागरिकों की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं के प्रति उनकी प्रतिक्रिया-क्षमता में निहित है. बहस और विमर्श जन-समस्याओं के सार्थक समाधान तक पहुंचे और उनके अनुसार व्यापक और गहन चर्चा होनी चाहिए. इससे पारदर्शिता, जवाबदेही और विधायिकाओं में सार्वजनिक विश्वास के प्रति लोगों का भरोसा बढ़ता है.

बिरला ने कहा कि संसद जनता की हैं और समाज के सभी वर्गों की आवाज को उचित स्थान देने का काम होना चाहिए. डिजिटल परिवर्तन और सूचना क्रांति के दौर में नागरिकों की बढ़ती अपेक्षाओं को पूरा करना बड़ी चुनौती है. ई-संसद, कागज-रहित कार्यप्रणाली और डिजिटल डाटाबेस जैसी पहल से विधायिका में पारदर्शिता, कार्यकुशलता और उत्तरदायित्व का भाव बढ़ा है. संसद द्वारा पारित कानूनों का नागरिकों के जीवन पर प्रत्यक्ष और दूरगामी प्रभाव पड़ता है. ऐसे में कानून पर व्यापक और सार्थक बहस जरूरी है.

जनप्रतिनिधियों को जनता की चिंताओं को अनुशासित, रचनात्मक और जिम्मेदार तरीके से सदन के समक्ष उठाने का काम करना चाहिए. सम्मेलन का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया. इस कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन, उपसभापति हरिवंश सहित कई गणमान्य व्यक्ति शामिल हुए. 

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Anjani Kumar Singh

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By Anjani Kumar Singh

Anjani Kumar Singh is a contributor at Prabhat Khabar.

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