कोवैक्सीन में बछड़े का सीरम मामले में भाजपा का पलटवार, बोली- 'स्वदेशी टीके को लेकर कांग्रेस ने भ्रम फैलाकर किया है महापाप'

वैज्ञानिक समुदाय और स्वास्थ्य मंत्रालय का इस विषय को लेकर स्पष्ट तौर पर कहता है कि कोवैक्सीन में बछड़े या गाय का खून नहीं है. यह पूरी तरह सुरक्षित है. जिस प्रकार एक सांप्रदायिक एंगल देकर इसे अपभ्रंशित करने की कोशिश की जा रही है, ऐसा कोई भी अपभ्रंश नहीं है.
नई दिल्ली : हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक द्वारा निर्मित कोवैक्सीन में नवजात बछड़े का सीरम मामले में बुधवार को भाजपा ने कांग्रेस पर पलटवार किया है. भाजपा के प्रवक्ता संबंधित पात्रा ने बुधवार को समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में कहा कि भारत में निर्मित कोवैक्सीन को लेकर कांग्रेस ने जो भ्रम फैलाया है, वो महापाप है. उन्होंने आरोप लगाया है कि कोवैक्सीन में गाय के बछड़े का सीरम यानी खून होता है. कांग्रेस ये भ्रम फैला रही है कि गाय के बछड़े को मारकर ये वैक्सीन तैयार किया गया है.
उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक समुदाय और स्वास्थ्य मंत्रालय का इस विषय को लेकर स्पष्ट तौर पर कहता है कि कोवैक्सीन में बछड़े या गाय का खून नहीं है. यह पूरी तरह सुरक्षित है. जिस प्रकार एक सांप्रदायिक एंगल देकर इसे अपभ्रंशित करने की कोशिश की जा रही है, ऐसा कोई भी अपभ्रंश नहीं है.
उन्होंने कहा कि भाजपा कांग्रेस पार्टी से एक ही सवाल पूछ रही है कि गांधी परिवार (सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी) ने कब अपना पहला और दूसरा डोज़ लिया? गांधी परिवार वैक्सीनेटेड है या नहीं है? गांधी परिवार कोवैक्सीन पर विश्वास करती है या नहीं करती?
इसके पहले, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने बुधवार को एक बयान जारी कर कहा कि सोशल मीडिया की कुछ पोस्ट में तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर एवं अनुचित ढंग से पेश किया गया है कि स्वदेश निर्मित कोवैक्सीन में नवजात बछड़े का सीरम है. समाचार एजेंसी पीटीआई की खबर के अनुसार, मंत्रालय ने कहा कि नवजात बछड़े के सीरम का इस्तेमाल केवल वेरो कोशिकाएं तैयार करने और उनके विकास के लिए ही किया जाता है.
एजेंसी की खबर के अनुसार, स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि गोवंश तथा अन्य पशुओं से मिलने वाला सीरम एक मानक संवर्धन संघटक है, जिसका इस्तेमाल पूरी दुनिया में वेरो कोशिकाओं के विकास के लिए किया जाता है. वेरो कोशिकाओं का इस्तेमाल ऐसी कोशिकाएं बनाने में किया जाता है, जो टीका उत्पादन में मददगार होती हैं. पोलियो, रैबीज और इन्फ्लुएंजा के टीके बनाने के लिए इस तकनीक का दशकों से इस्तेमाल किया जा रहा है. मंत्रालय ने कहा कि वेरो कोशिकाओं के विकसित होने के बाद उन्हें पानी और रसायनों से अच्छी तरह से अनेक बार साफ किया जाता है, जिससे कि ये नवजात बछड़े के सीरम से मुक्त हो जाते हैं.
मंत्रालय ने कहा कि इसके बाद वेरो कोशिकाओं को कोरोना वायरस से संक्रमित किया जाता है, ताकि वायरस विकसित हो सके. इस प्रक्रिया में वेरो कोशिकाएं पूरी तरह से नष्ट हो जाती हैं. इसके बाद विकसित वायरस को भी नष्ट (निष्प्रभावी) और साफ किया जाता है. नष्ट या निष्प्रभावी किए गए वायरस का इस्तेमाल सबसे आखिर में टीका बनाने के लिए किया जाता है.
मंत्रालय के बयान के अनुसार, अंतिम रूप से टीका बनाने के लिए बछड़े के सीरम का बिलकुल भी इस्तेमाल नहीं किया जाता. उसने कहा कि इसलिए अंतिम रूप से जो टीका (कोवैक्सीन) बनता है, उसमें नवजात बछड़े का सीरम कतई नहीं होता और यह अंतिम टीका उत्पाद के संघटकों में शामिल नहीं है.
Posted by : Vishwat Sen
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