भटके युवा या चुके रहनुमा

Updated at : 22 Jun 2015 12:29 PM (IST)
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भटके युवा या चुके रहनुमा

– हरिवंश – एन आर नारायणमूर्ति का एक साहसिक बयान आया है. जिसका भाव या आशय है कि भ्रष्ट और बेईमान लोग भारतीय युवाओं के रोल मॉडल बन रहे हैं. एक किताब के लोकार्पण कार्यक्रम में उन्होंने कहा, वैसे लोगों की संख्या घट रही है, जिन्हें युवा रोल मॉडल मानें. उन्होंने यह भी पूछा कि […]

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– हरिवंश –
एन आर नारायणमूर्ति का एक साहसिक बयान आया है. जिसका भाव या आशय है कि भ्रष्ट और बेईमान लोग भारतीय युवाओं के रोल मॉडल बन रहे हैं. एक किताब के लोकार्पण कार्यक्रम में उन्होंने कहा, वैसे लोगों की संख्या घट रही है, जिन्हें युवा रोल मॉडल मानें. उन्होंने यह भी पूछा कि हमारे सार्वजनिक जीवन में आज कितने लोग हैं, जो अपनी ईमानदारी, साहस, प्रतिबद्धता और कठिन श्रम करने के कारण आत्मगौरव महसूस करते हैं? भ्रष्टाचार के कारण लोग, लोकधर्म का पालन नहीं करते. आज समाज में बेईमानी, धोखेबाजी, धूर्तता और चलता है का रुख और एप्रोच है. ऐसे ही मानस के लोग आज अधिक से अधिक ताकतवर बन रहे हैं. और संपन्न भी.
श्री मूर्ति ने कहा, इस सामाजिक माहौल में हमारे युवा गलत संकेत पा रहे हैं. उनका मानस बन रहा है कि सफल होने का यही रास्ता है. श्री मूर्ति ने स्पष्ट कहा, मैं इसके लिए युवकों को दोष नहीं देता. श्री मूर्ति ने भारत के स्वभाव और सोच पर भी टिप्पणी की. उनके अनुसार भारतीय पूरी दुनिया में पतली चमड़ी के लोग हैं.
वे वहां भी अपमान महसूस करते हैं, जहां अपमान का कोई अंदेशा नहीं है. मामूली बात पर भी बिना वजह असंतुष्ट या चिढ़े. श्री मूर्ति ने यह भी कहा कि भारतीय अपने परिवार के स्वार्थ और हित को समाज से अधिक तरजीह देते हैं, जिसने देश का भारी नुकसान किया है. उनका मानना है कि पश्चिम ने घर, परिवार और समाज के बीच अच्छा संतुलन बनाया है. उन्होंने अपना अनुभव सुनाया कि भागवतगीता से हमें मानसिक शांति मिलती है. यह भी कहा कि भागवतगीता का संबंध किसी धर्म से नहीं. यह हिंदू धर्म की तरह जीवन पद्धति की पुस्तक है.
जो लोग भारत की युवा शक्ति के उदय और आइटी उद्योग के विश्वव्यापी जाल पर फख्र महसूस करते हैं, उन्हें नारायणमूर्ति के विचार को धैर्य से समझने की कोशिश करनी होगी. ये बातें किसी राजनेता को कहनी चाहिए थीं. जो भारत के लिए चितिंत हैं. जिनमें दूरदृष्टि है. राजधर्म है. उन्हें श्री मूर्ति की बातें बिलकुल सही लगेंगी.
भारतीय युवाओं की बौद्धिक प्रतिभा, तेजस्विता, और विश्वव्यापी स्पर्धा में टिकने की क्षमता पर हमें गर्व है. पर यह सच है कि इन युवाओं का जीवन लक्ष्य या आदर्श अस्पष्ट है? क्या सिर्फ पैसा कमाना जीवन का मकसद है? उपभोक्तावाद का सुख भोगना जीवन का दर्शन है?
कुछ अधिक पैसे मिलने पर रोज नौकरी बदलना, जीवन का मर्म है? शराब पीना, देर रात तक पार्टियों में मौज और फिर बिना बंधन या शादी के साथ रहना? क्या ये नयी पीढ़ी के आदर्श हैं? आज देश में कहीं कोई इतिहास बनानेवाली ताकत नहीं दिखती. युवा ही इतिहास बदलने के इंजन होते हैं. पुरानी चीजों को छोड़ दें, तो 60 के दशक में युवाओं ने ही दुनिया में बदलाव का नया सूत्रपात किया. भारत में तो पुराने समय से ही युवा बदलाव के प्रतीक, स्रोत और ताकत रहे हैं. 1974 के छात्र आंदोलन तक. आज छात्र या युवा राजनीति बांझ हो गयी है.
नचिकेता का किस्सा आज भी लोगों को मालूम है. बालक के रूप में, मृत्यु को ढ़ूंढ़ने का साहस करनेवाला नाम. मृत्यु का वर्णन करने वाला. यमराज के पास जानेवाला और संसार के लिए अनमोल अनुभव छोड़ कर जानेवाला बालक. ध्रुव का संकल्प आज किसे याद है? विवेकानंद तो हाल के हैं.
उनके पहले शंकर हुए , मामूली उम्र में अकल्पित परिवर्तन के सूत्रधार. भारत की एकता के जनक. भारतीय स्वतंत्रता अंदोलन में चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह इन्होंने जब नया इतिहास बनाया, तब सब कम उम्र के युवा थे. बुजुर्ग या वयस्क नहीं. भारतीय परंपरा में माना जाता है कि लीक छोड़ कर युवा ही चलते हैं. जो लीक छोड़ता है, वही इतिहास बनाता है. आज लीक छोड़ना या रिबेल (बागी) बनना या डिसेंट (असहमति) या धारा के खिलाफ चलना कितने लोग करते हैं? घर, परिवार और समाज किशोरों और युवाओं में क्या यह ताकत भर रहा है?
अब्राहम लिंकन ने एक स्कूल मास्टर को चिट्टी लिखी थी (ऐतिहासिक दस्तावेज), जहां उनका बेटा पढ़ता था. उस पत्र में उल्लेख था कि आप ऐसी शिक्षा दें कि यह बालक, जब पूरी दुनिया एक तरफ खड़ी हो, तो इस बालक की अंतरआत्मा कहे कि नहीं, अकेले अपने विचार, मान्यता के अनुसार चलना है, तो वह पूरी दुनिया की भीड़ के सामने अकेले खड़ा हो सके. तन कर. यह शिक्षा आज है कहां? घर में अभिभावक पैसे की दौड़ में शामिल हैं. स्कूलों में अध्यापक ट्यूशन पढ़ा कर अमीर बनना चाहते हैं और शिक्षा, तो उद्योग बन गयी है. इसमें चरित्र का विकास कहां से होगा? नेता, तो धंधेबाज और घोटालेबाज हो गये हैं. अपवाद अलग हैं.
देश के दो बड़े अंगरेजी अखबारों के बीच एक दिलचस्प विज्ञापन युद्ध चल रहा है. पर इसका संबंध हिंदी-अंगरेजी या अन्य भाषाओं के एक-एक पाठक से है. एक अंगरेजी अखबार ने इस आशय का विज्ञापन दिया कि उबाऊ, पुरानी और लंबी चीजों को पढ़ते-पढ़ते आप सो जाते हैं.
फिर उस विज्ञापन के पीछे यह नारा था कि सोइए नहीं, हमारे अखबार के साथ जागिए. दुनिया के ज्ञान के साथ कदमताल करिए. सूचनाओं का संसार आपके साथ है. दूसरे अखबार ने युवाओं से बात की. मामूली सवाल पूछे गये कि भारत के उपराष्ट्रपति कौन हैं? यूपीए का क्या अर्थ है? रतन टाटा का उत्तराधिकारी कौन है? एटीएम का क्या अर्थ है? ऐसे सवाल, जो आदमी के आसपास की जानकारी हैं, जो अपने समाज के प्रति सजगता बताते हैं. ऐसे सवालों के उत्तर अत्यंत पढ़े-लिखे, अच्छी नौकरी करनेवाले युवा नहीं दे पाये. फिर इन्हीं युवाओं से दूसरे किस्म के सवाल पूछे गये कि रितिक रौशन का उपनाम (निक नेम) क्या है?
जीरो साइज किस अभिनेत्री से जुड़ा है? ऐश्वर्या राय को लड़का हुआ है या लड़की? ऐसे अनेक सवालों के जबाव धड़ाधड़ इन युवाओं ने दिये. सही. फिर उस अखबार के विज्ञापन ने यह दर्शाया कि आप कहां खड़ा होना चाहते हैं? उसका टैगलाइन है, स्टे अहेड ऑफ द टाइम (समय से आगे रहने के लिए), यह अखबार पढ़ें. इस विज्ञापन के सवाल बड़े अर्थपूर्ण हैं. यह बताने के लिए कि मीडिया कहां है? और कैसा भविष्य बन रहा है?
यानी आप और हम कैसे युवा बना रहे हैं?
इस विज्ञापन युद्ध में यह मूल सवाल है? क्या इस मुल्क में कहीं इस गंभीर सवाल को लेकर कोई बहस या चर्चा है? राजनीति को इसकी चिंता है कि देश किधर जा रहा है? यह सवाल सबसे अधिक प्रासंगिक राजनीति के लिए है. समाज और हर घर के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है. कहां खड़ा है समाज? कम से कम नारायण मूर्ति ने अपनी बातों से एक घंटी बजायी है. सवाल है कि क्या कोई सुन रहा है?
दिनांक : 05.02.2012
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